तपस्या में अलौकिक आनंद और असीम शांति है - मनोज सिंह

SHARE:

एक ऐतिहासिक लोककथा याद आ रही है। एलग्जेंडर ने भारत प्रवेश के दौरान यहां के लोगों को पेड़ के नीचे आराम से बैठे देखा तो उसे आश्चर्य हुआ था। कहत...

एक ऐतिहासिक लोककथा याद आ रही है। एलग्जेंडर ने भारत प्रवेश के दौरान यहां के लोगों को पेड़ के नीचे आराम से बैठे देखा तो उसे आश्चर्य हुआ था। कहते हैं कि उसके आदेश पर सैनिकों के द्वारा उन साधुओं को डरा-धमकाकर राजा के सम्मुख ले जाने की कोशिश की गई। मगर उन्होंने राजा के दरबार में जाने से साफ मना कर दिया। कहा जाता है कि उन्हें पैसे और सांसारिक सुख का लालच भी दिया गया। कहलवाया गया कि इससे उन्हें बेहतर खाने-पीने-रहने की सुविधा होगी। फकीर ने पूछा, फिर क्या होगा? राजा के प्रतिनिधि ने कहा था, इससे तुम्हें सुख चैन व आराम का जीवन मिलेगा। तो फकीर ने तुरंत जवाब दिया था कि वह तो मुझे अभी भी मिल रहा है, मैं पेड़ के नीचे आराम से बैठा हूं और आनंद में हूं, फिर उसी के लिए तुम्हारे राजा के पास जाने की क्या आवश्यकता?
आनंद सुख की अनुभूति का चमकोत्कर्ष है। यह अलौकिक है। यकीनन यह बाहर नहीं अंदर होता है। सुख-चैन व्यक्ति की मानसिक अवस्था है। उसकी अपनी सोच है। जीवन के प्रति दृष्टिकोण है। एक स्तर तक ही बाह्‌य वातावरण उसके लिए प्रभाव डाल सकते हैं। अंत में स्वयं को स्वयं के अंदर ही ढूंढ़ना पड़ता है। यह परम सत्य है। संतोष में सुख है और निरंतर सुख में आनंद। और आनंद स्थिरता लाता है। असीम शांति प्रदान करता है। अमूमन हम मस्ती को आनंद समझ कर भ्रमित होते हैं। उपरोक्त उदाहरण में किसी को आलस्य दिखाई दे सकता है। राजा व सिपाही क्रियाशील हैं और आज के बाजार के प्रतीक। बात अगर कर्म की आ जाए तो यूं तो पारंपरिक तपस्या की अवस्था में भी कोई शारीरिक कार्य नहीं हो रहा। मगर शरीर को तपाया जा रहा है, साधना के दौरान ध्यान केंद्रित है। क्या ये कर्म नहीं? बिल्कुल है। मन-मस्तिष्क को ध्यानमग्न करके साधनारत रहना भी एक तरह का कार्य है। इसमें भी ऊर्जा का व्यय होता है। उपरोक्त लोककथा में यह पूरी तरह स्वेच्छा से किया जा रहा था। तभी साधु आत्मविश्वास से जवाब दे पाये। किसी भी कार्य करने में, अगर वो पसंद का है तो पहले खुशी और फिर धीरे-धीरे आनंद की प्राप्ति होती है। अर्थात कार्य में सुख नहीं है, सुख हमारी पसंद नपसंद में है। क्योंकि वही काम किसी को अच्छा लगता है और सुख देता है तो किसी को बिल्कुल पसंद नहीं। नापसंद होने पर यही अरुचिकर व नीरस बन जाता है। तकलीफ देता है। व्यक्ति परेशान और अंत में दुखी हो सकता है। हताशा इसका चरम बिंदु है। राजा व सिपाही के लिए साधु का आचरण मूर्खतापूर्ण व अकर्मण्यता का प्रतीक था। जबकि वे तो अपने आनंद में डूबे हुए थे।
किसी से मैंने कहा, और शायद यह सच भी है, कहा भी जाता है कि लेखन, सरल शब्दों में कहें तो पठन और पाठन, अपने आप में तपस्या है। यह कइयों के लिए बेवकूफी भरा कार्य होगा। आज के वैभवपूर्ण युग में जहां पैसा, पॉवर और लोकप्रियता हर बात का बैरोमीटर है तो उसमें यह बात प्रथम दृष्टि ठीक भी लगती है। तभी मन में कभी-कभी ख्याल आता है कि अगर मैं पढ़ और लिख नहीं रहा होता तो क्या कर रहा होता? यह सवाल अमूमन पूछा भी जाता है। ऐसे बहुत से काम हैं जो मायावी दुनिया में सफल होने के लिए आवश्यक माने जाते हैं। यकीनन उन्हीं में से कुछ कर रहा होता। हो सकता है निष्क्रिय रहता। और यूं ही जीवन गुजार देता। खा-पीकर और सोकर। या फिर शायद आधुनिक प्रतिस्पर्द्धा की मारधाड़ वाली दिनचर्या में ही पगलाया रहता। वैसे क्या सांसारिक वैभव प्राप्त करने वाले कार्यों में मेहनत नहीं है? बिल्कुल है। मुझे तो लगता है कि चुगलखोरी, गुंडागर्दी, नेटवर्किंग यहां तक कि घर-मोहल्ले की छोटी राजनीति में भी ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है। अच्छे और बुरे की बात तो बाद की है। आवश्यक प्राकृतिक कर्म को छोड़ हर दूसरा कार्य अपने आप में लगन और फोकस चाहता है। यह भी सत्य है कि हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना किसी तपस्या से कम नहीं। सिर्फ चित्रकार ही चित्रों में डूबा नहीं रहता, न ही सिर्फ समाजसेवी को सेवा का धुन सवार रहता है। छात्र को अव्वल आने के लिए जान लगा देनी पड़ती है। धनवान को पैसे बटोरने का पागलपन देखने लायक होता है और वह उसी जुगाड़ में लगा रहता है। दिन-रात मेहनत करता है, योजनाएं बनाता रहता है, शारीरिक और मानसिक ऊर्जा लगाता है। और पूरी तरह से अपनी मंजिल को पाने के लिए, एक उद्देश्य के साथ लक्ष्य पर केंद्रित रहता है। तो क्या यह तपस्या नहीं?
कोई भी कार्य पूरी तन्मयता के साथ और ध्यानपूर्वक निरंतर किया जाये, वो अपने आप में एक तपस्या है। और यही कर्म पहले खुशी फिर सुख देने लगता है जब कार्य आपकी पसंद का हो, मनमाफिक हो। आप उसमें पूरी तरह डूब जाते हैं और सुख-दुख इसकी सफलता-असफलता पर निर्भर करने लगता है। ऊपर बताए गए धनवान को, हजारों-लाखों के नोट प्राप्त होने पर, जिस खुशी और सुख की प्राप्ति होती है उसकी व्याख्या यहां नहीं की जा सकती। मगर फिर सवाल उठता है, जब अच्छे और बुरे का ठप्पा लगने लगता है, तो दिमाग भ्रमित होने लगता है। कोई कह सकता है, दूसरे के मत को नकार सकता है, और यह सच भी है। यह अपना-अपना दृष्टिकोण भी हो सकता है। कोई विचारक कह सकता है कि जिस कार्य करने में स्वयं के हित के अतिरिक्त अन्य अर्थात समाज, राष्ट्र व मनुष्य जाति का अहित होता हो उसे तपस्या शब्द से अलंकृत करना उचित नहीं। सच है। मगर एक अर्थ में यह हमारी दृष्टि को सामाजिक व मानवीय पक्ष के द्वारा सीमित करता है। अन्यथा मेहनत तो मेहनत है। आदिकाल में भी तपस्या तो स्वकेंद्रित ही होती थी। अब इसे क्या कहेंगे? जैसे किसी को शारीरिक प्रेम में अत्यधिक सुख की प्राप्ति होती है और वो सदैव इसी में डूबा रहता है। वह सदैव शारीरिक संबंध बनाने के चक्कर में घूमता रहता है। उसके लिए यह किसी अच्छे और बुरे की परिभाषा में शामिल नहीं किया जा सकता। यहां भी सम्भोग से समाधि तक की बात की जाती है। यहां परेशानी तब होती है जब वह दूसरों पर जोर-जबरदस्ती करता है, परेशान करता है या फिर जब उसका शरीर साथ नहीं देता और मन भटकने लगता है। भटकी हुई आत्मा सुख नहीं देती। क्रोधित रहती है। बेचैनी लगती है। प्यासा आदमी संतुष्ट नहीं हो सकता है। और बिना संतोष के शांति नहीं मिल सकती। ऐसे में सम्भोग से समाधि छोड़ सामान्य जीवन भी नसीब नहीं होता। ठीक इसी तरह से बाकी सांसारिक कर्मों में भी एक स्तर के सुख के बाद, एक समय के पश्चात, विरक्ति आने लगती हैं। सांसारिक सुख न स्थायी है न निरंतर। और यही से शुरू होने लगता है भ्रमित होना, एक नये रास्ते की तालाश। असल में यह सुख आनंद की सीमा तक पहुंच ही नहीं पाता।
कर्म, जो बाहर की ओर न जाते हुए अंदर की ओर जाते हैं, वो कभी भी भ्रमित नहीं करते। उनकी राहें कभी धूमिल नहीं होती। उनका केंद्र, स्व के भीतर बैठा उस व्यक्ति विशेष की आत्मा है जहां पहुंचने पर फिर बाकी सब कुछ महत्वहीन और अस्तित्वहीन हो जाता है। दुःख और सुख भी। सृजन में ऐसा ही कुछ है। रचना प्रक्रिया पहले अंदर से बाहर और बाहर से अंदर होती रहती हैं। लेखन से विचार की उत्पति होती है और विचार से लेखन समृद्ध होता है। इनके माध्यम से सृजनकर्ता अपनी भावनाओं को काबू करके पहले तो बाहरी दुनिया के बारे में सोचता है। लेकिन फिर वह सोचते-सोचते बाहर से भीतर की ओर जाने लगता है। ध्यानमग्न। सदैव केंद्रित। आम जीवन से कटा हुआ। शब्दों से खेलता हुआ। अपनी दुनिया में मग्न। यह तपस्या ही तो है। इस तपस्या में तथाकथित सांसारिक मस्ती का तो सवाल ही नहीं, बहुत हद तक शारीरिक सुख भी नहीं, मगर आनंद है। परमआनंद। इसमें कोई वैभव नहीं नैसर्गिक सौंदर्य है। कोई भौतिक स्वीकृति नहीं है। एक शराबी को शराब से जितना नशा मिल सकता है उससे अधिक नशा है। यहां आंखें बंद करके आदमी कई बार विचारों में इधर-उधर भ्रमण तो कर सकता है मगर सृजन की सीमाओं में वह पूरी तरह से आत्मकेंद्रित है। एक सीमा के बाद वह दूसरों के लिए नहीं लिखता, वह स्वयं के साथ जुड़ जाता है। यह स्वयं, उसका 'मैं' नहीं, वो चरित्र बन जाता है जिसके लिए वो उस पल जी रहा है। अपने से परे यहां 'मैं' परिवर्तनशील हूं, इसलिए निःस्वार्थ हूं। वह स्वार्थ के लिए सोच ही नहीं सकता। धीरे-धीरे शब्द नहीं, भावार्थ महत्वपूर्ण होते चले जाते हैं। इतने कि फिर इसकी कोई भी कीमत नहीं लगाई जा सकती। और वह गहराई में डूबता जाता है। अर्थ गहरे बनते चले जाते हैं और संदर्भ विशाल। आदमी बाहर से अंदर और फिर अंदर से पूरे विश्व से जुड़ने लगता है। आत्मा से परमात्मा की ओर। यह एक तरह की तपस्या ही तो है। मगर फिर इस प्रक्रिया में भी जैसे ही लोकप्रियता, पद-पैसा और पॉवर जुड़ने लगता है तो यही तपस्या फिर प्रतिस्पर्द्धा में परिवर्तित हो जाती है और लेखक तपस्वी न होकर बेस्ट सेलर कहलाने के मोह में फंसता जाता है। तुलसीदास ने किसी महत्वाकांक्षा व लोभ में आकर रामायण की रचना नहीं की थी, न ही महान व लोकप्रिय लेखक कहलाने की इच्छा रही होगी और न ही ध्येय रहा होगा, शायद तभी उनकी रचना-प्रक्रिया तपस्या का उदाहरण है जहां उन्हें भगवान राम के दर्शन हुए।
मैं सृजन के दौरान, इस तपस्या से मिलने वाले परम आनंद की कुछ-कुछ अनुभूति ले रहा हूं। अगर आपको भी इस अमर रस का स्वाद चखना है तो ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं, सिर्फ सृष्टि की किसी भी रचना में डूब जाइये। यह आपकी बनाई रचना भी हो सकती है। मगर ध्येय और ध्यान निःस्वार्थ हो और उसमें भौतिकता न हो। चूंकि ऐसे में वो रचना नहीं उपभोग बन जाती है और आप रचनाकार नहीं उपभोक्ता हो जाते हैं। बहरहाल, इसी विश्वास के माध्यम से आप अपने ईष्ट तक पहुंचते हैं। ध्यानमग्न हो जाते हैं। ये अलौकिक रचनाएं आपको कुछ और सोचने के लिए मौका ही नहीं देती। आपको असीम शांति के सागर में ले जाती हैं। यहां तर्क नहीं चलते, संपूर्ण समर्पण होता है और आपकी आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती है।

COMMENTS

LEAVE A REPLY: 1
आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

Advertisements

आपको ये भी रोचक लगेगा

नाम

अंग्रेज़ी हिन्दी शब्दकोश,3,अकबर इलाहाबादी,11,अकबर बीरबल के किस्से,58,अज्ञेय,27,अटल बिहारी वाजपेयी,1,अदम गोंडवी,3,अनंतमूर्ति,3,अनौपचारिक पत्र,16,अन्तोन चेख़व,2,अमीर खुसरो,6,अमृत राय,1,अमृतलाल नागर,1,अमृता प्रीतम,5,अयोध्यासिंह उपाध्याय "हरिऔध",4,अली सरदार जाफ़री,3,अष्टछाप,3,असगर वज़ाहत,11,आनंदमठ,4,आरती,11,आर्थिक लेख,5,आषाढ़ का एक दिन,10,इक़बाल,2,इब्ने इंशा,27,इस्मत चुगताई,3,उपेन्द्रनाथ अश्क,1,उर्दू साहित्‍य,177,उर्दू हिंदी शब्दकोश,1,उषा प्रियंवदा,1,एकांकी संचय,7,औपचारिक पत्र,31,कबीर के दोहे,19,कबीर के पद,1,कबीरदास,10,कमलेश्वर,5,कविता,675,कहानी सुनो,2,काका हाथरसी,4,कामायनी,5,काव्य मंजरी,11,काव्यशास्त्र,4,काशीनाथ सिंह,1,कुंज वीथि,12,कुँवर नारायण,1,कुबेरनाथ राय,1,कुर्रतुल-ऐन-हैदर,1,कृष्णा सोबती,1,केदारनाथ अग्रवाल,1,केशवदास,1,कैफ़ी आज़मी,4,क्षेत्रपाल शर्मा,34,खलील जिब्रान,3,ग़ज़ल,84,गजानन माधव "मुक्तिबोध",10,गीतांजलि,1,गोदान,6,गोपाल सिंह नेपाली,1,गोपालदास नीरज,8,गोरख पाण्डेय,2,गोरा,2,घनानंद,1,चन्द्रधर शर्मा गुलेरी,2,चित्र शृंखला,1,चुटकुले जोक्स,15,छायावाद,6,जगदीश्वर चतुर्वेदी,9,जयशंकर प्रसाद,20,जातक कथाएँ,10,जीवन परिचय,18,ज़ेन कहानियाँ,2,जैनेन्द्र कुमार,1,जोश मलीहाबादी,2,ज़ौक़,4,तुलसीदास,5,तेलानीराम के किस्से,7,त्रिलोचन,1,दाग़ देहलवी,5,दादी माँ की कहानियाँ,1,दुष्यंत कुमार,7,देव,1,देवी नागरानी,23,धर्मवीर भारती,2,नज़ीर अकबराबादी,3,नव कहानी,2,नवगीत,1,नागार्जुन,16,नाटक,1,निराला,27,निर्मल वर्मा,1,निर्मला,26,नेत्रा देशपाण्डेय,3,पंचतंत्र की कहानियां,42,पत्र लेखन,132,परशुराम की प्रतीक्षा,3,पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र',3,पाण्डेय बेचन शर्मा,1,पुस्तक समीक्षा,65,प्रेमचंद,22,प्रेमचंद की कहानियाँ,89,प्रेरक कहानी,15,फणीश्वर नाथ रेणु,1,फ़िराक़ गोरखपुरी,9,फ़ैज़ अहमद फ़ैज़,24,बच्चों की कहानियां,74,बदीउज़्ज़माँ,1,बहादुर शाह ज़फ़र,6,बाल कहानियाँ,14,बाल दिवस,3,बालकृष्ण शर्मा 'नवीन',1,बिहारी,1,बैताल पचीसी,2,भक्ति साहित्य,111,भगवतीचरण वर्मा,5,भवानीप्रसाद मिश्र,3,भारतीय कहानियाँ,59,भारतीय व्यंग्य चित्रकार,7,भारतीय शिक्षा का इतिहास,3,भारतेन्दु हरिश्चन्द्र,6,भीष्म साहनी,5,भैरव प्रसाद गुप्त,2,मंगल ज्ञानानुभाव,22,मजरूह सुल्तानपुरी,1,मधुशाला,7,मनोज सिंह,16,मन्नू भंडारी,3,मलिक मुहम्मद जायसी,2,महादेवी वर्मा,12,महावीरप्रसाद द्विवेदी,1,महीप सिंह,1,महेंद्र भटनागर,73,माखनलाल चतुर्वेदी,3,मिर्ज़ा गालिब,39,मीर तक़ी 'मीर',20,मीरा बाई के पद,22,मुल्ला नसरुद्दीन,6,मुहावरे,4,मैथिलीशरण गुप्त,8,मोहन राकेश,9,यशपाल,9,रंगराज अयंगर,42,रघुवीर सहाय,5,रणजीत कुमार,29,रवीन्द्रनाथ ठाकुर,21,रसखान,11,रांगेय राघव,2,राजकमल चौधरी,1,राजनीतिक लेख,11,राजभाषा हिंदी,47,राजिन्दर सिंह बेदी,1,राजीव कुमार थेपड़ा,4,रामचंद्र शुक्ल,1,रामधारी सिंह दिनकर,18,रामप्रसाद 'बिस्मिल',1,रामविलास शर्मा,8,राही मासूम रजा,8,राहुल सांकृत्यायन,1,रीतिकाल,3,रैदास,2,लघु कथा,72,लोकगीत,1,वरदान,11,विचार मंथन,60,विज्ञान,1,विदेशी कहानियाँ,21,विद्यापति,4,विविध जानकारी,1,विष्णु प्रभाकर,1,वृंदावनलाल वर्मा,1,वैज्ञानिक लेख,4,शमशेर बहादुर सिंह,5,शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय,1,शरद जोशी,3,शिवमंगल सिंह सुमन,5,शुभकामना,1,शैक्षणिक लेख,11,शैलेश मटियानी,2,श्यामसुन्दर दास,1,श्रीकांत वर्मा,1,श्रीलाल शुक्ल,1,संयुक्त राष्ट्र संघ,1,संस्मरण,9,सआदत हसन मंटो,9,सतरंगी बातें,33,सन्देश,18,समीक्षा,1,सर्वेश्वरदयाल सक्सेना,16,सारा आकाश,13,साहित्य सागर,21,साहित्यिक लेख,17,साहिर लुधियानवी,5,सिंह और सियार,1,सुदर्शन,1,सुदामा पाण्डेय "धूमिल",6,सुभद्राकुमारी चौहान,6,सुमित्रानंदन पन्त,16,सूरदास,4,सूरदास के पद,21,स्त्री विमर्श,9,हजारी प्रसाद द्विवेदी,1,हरिवंशराय बच्चन,26,हरिशंकर परसाई,21,हिंदी कथाकार,12,हिंदी निबंध,162,हिंदी लेख,305,हिंदी समाचार,67,हिंदीकुंज सहयोग,1,हिन्दी,5,हिन्दी टूल,4,हिन्दी आलोचक,7,हिन्दी कहानी,31,हिन्दी गद्यकार,4,हिन्दी दिवस,50,हिन्दी वर्णमाला,3,हिन्दी व्याकरण,43,हिन्दी संख्याएँ,1,हिन्दी साहित्य,8,हिन्दी साहित्य का इतिहास,22,हिन्दीकुंज विडियो,11,aaroh bhag 2,13,astrology,1,Attaullah Khan,1,baccho ke liye hindi kavita,57,Beauty Tips Hindi,3,English Grammar in Hindi,3,hindi ebooks,5,Hindi Ekanki,9,hindi essay,154,hindi grammar,50,Hindi Sahitya Ka Itihas,50,hindi stories,455,ICSE Hindi Gadya Sankalan,11,Kshitij Bhag 2,10,mb,72,motivational books,10,naya raasta icse,8,NCERT Vasant Bhag 3 For Class 8,12,Notifications,5,question paper,8,quizzes,8,Shayari In Hindi,12,sponsored news,2,Syllabus,7,Vasant Bhag - 2 Textbook In Hindi For Class - 7,11,VITAN BHAG-2,5,vocabulary,15,
ltr
item
हिन्दीकुंज,Hindi Website/Literary Web Patrika: तपस्या में अलौकिक आनंद और असीम शांति है - मनोज सिंह
तपस्या में अलौकिक आनंद और असीम शांति है - मनोज सिंह
http://1.bp.blogspot.com/_lxzqs1Yxoss/TEl5pKpggpI/AAAAAAAADQU/oPdkuvLXTfM/s200/manoj+photo.JPG
http://1.bp.blogspot.com/_lxzqs1Yxoss/TEl5pKpggpI/AAAAAAAADQU/oPdkuvLXTfM/s72-c/manoj+photo.JPG
हिन्दीकुंज,Hindi Website/Literary Web Patrika
https://www.hindikunj.com/2010/08/tapsya-main-alaukik-anand-aur-asheem.html
https://www.hindikunj.com/
https://www.hindikunj.com/
https://www.hindikunj.com/2010/08/tapsya-main-alaukik-anand-aur-asheem.html
true
6755820785026826471
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All आपको ये भी रोचक लगेगा LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content