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परिंदा 



कुछ लिखूं ना लिखूं अपने हालात लिखूगीं
किसी से ना कह सकी वो हर बात लिखूगीं ।
जयति जैन "नूतन"
जयति जैन "नूतन"

तुम्हें पाने के लिए गुनाह किये हैं बार बार
गुनाहों में दबी तुम्हें पाने की इबादत लिखूगीं ।

तुमसे बार बार मिलने की कोशिशें जारी रखीं
तुमसे ना मिल पाने के वो ख्यालात लिखूगीं ।

रोये बहुत थे एक तेरे रूठ के जाने से उस रोज
इंतेजार में गुजारे एक एक दिन रात लिखूगीं ।

पलकें नम भले हों पर लिख लेती हूं अल्फाज़
दिल की गहराइयों में उतरे वो जज्बात लिखूगीं ।

हमसे ना पूछों कब चांद मिलता है चांदनी से
मैं जल मर जाने वाले पतंगे की बात लिखूगीं ।

तुम देख सको तो देखो उसे मेरी निगाह से
यादों का उफनता समुंदर है मैं याद लिखूगीं ।

कोई कुछ भी कहता रहे मुझे फर्क नहीं पड़ता
वो उड़ चुका परिंदा है उसे मैं आजाद लिखूगीं ।



- जयति जैन "नूतन"

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