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कश्मीर हमारा है 



कश्मीर हमारा है 'कश्मीर मांगे आज़ादी ",हिन्दुस्तानियों कश्मीर छोड़ो " और न जाने कितने नारे लगते हुए असलम बट्ट सैनिकों पर पत्थर बरसा रहा था। उसके साथी उसे प्रेरित कर रहे थे।
तभी पीछे से आवाज़ आई "जो जितने सैनिकों को घायल करेगा उसको उतने ज्यादा पैसे मिलेंगे "
असलम ने पीछे मुड़कर देखा एक अजनबी पांच पांच सौ के नोटों की गड्डिया उनको दिखा रहा था ,उन नोटों को
कश्मीर हमारा है
कश्मीर हमारा है
देखते ही भीड़ के युवाओं में दुगना जोश आ गया और जोर जोर से नारे लगा कर पत्थर फेंकने लगे।
असलम को ये अच्छा नहीं लग रहा था किन्तु वो मजबूर और डरा हुआ था ,बेरोजगार तो था ही साथ में ये डर भी था कि अगर उनकी बात न मानी तो काफिर करार दिया जायेगा और मार दिया जायेगा।
असलम को स्कूल में पढ़ाया गया था कि कश्मीर भारत की एक अभिन्न अंग हैं ,उसे राष्ट्रगान भी अच्छा लगता था ,उसे भारतीय संस्कृति से भी बहुत प्यार था किन्तु वो मजबूर था।
असलम घर पहुंचा उसने पाँच सो का नोट अपनी माँ को दिया बड़े अनमने भाव से बोला "अम्मी मुझे ये ठीक नहीं लगता हम अपने देश के सैनिकों पर क्यों पत्थर बरसाते हैं जबकि वो तो हमारी हिफाज़त करते हैं। "
जोर से मत बोल वर्ना मारा जायेगा "उसकी अम्मी ने डरते हुए कहा।

धीरे धीरे असलम को पाक परस्त लोगों से सख्त नफरत थी किन्तु वो कुछ कर नहीं सकता था उसकी इच्छा के विरूद्ध उसे सैनिकों पर पत्थर फेंकने जाना पड़ता था।जबकि उसका केवल एक ही ख्वाब था कि उसका कश्मीर पाकिस्तान पोषित आतंकवाद से आज़ाद हो, वहाँ शांति और खुशहाली हो। इसके लिए उसने खुद आतंकवाद से लड़ने की ठानी और आतंक के सफाए में सुरक्षाबलों का साथ दिया। इस राह में पल-पल मौत का ख़तरा था लेकिन धीरे धीरे उसने आतंकियों में अपनी पैठ बना ली और उनकी सारी सूचनाएं वो आर्मी को उपलब्ध करने लगा। धीरे-धीरे विश्वास जीतने के बाद असलम  इन आतंकियो के लिए ओवर-द -ग्राउंड-वर्कर के तौर पर काम करते हुए ज़रूरी सामान सप्लाई करता था । साथ ही आतंकियों का संदेश दूसरे ओवर-ग्राउंड-वर्कर तक पहुंचाने का काम भी करता था । इसलिए आतंकियों की लोकेशन की खबरअसलम के पास होती थी।
एक के बाद एक उसकी सूचनाओं पर सेना आतंकियों के सफाये करने लगी और आतंकियों के सबसे बड़े संघटन के सरगना को भी सेना ने मार गिराया।
एक दिन हिज़्बुल के चीफ का संदेशा आया कि एक ऑपरेशन की तैयारी करनी है इसमें उसकी मदद चाहिए।
असलम बेखौफ एक अनजानी जगह पर चला गया कुछ सूचनाओं के साथ जब वह वापिस आया तो उसने सेना को इसकी खबर करदी सेना ने जब वहाँ छापा मारा तो कुछ नहीं पाया।
अब हिज़्बुल के चीफ को पक्का सबूत मिल चूका था कि असलम ही उनकी मुखबरी कर हिज़्बुल को समाप्त करवा रहा है। 
आखिर उसको पकड़ कर जंगल में एक अनजान जगह ले जाया गया। 
'ये मुखबिरी तू कब से कर रहा है काफिर "हिज़्बुल चीफ़ चिल्लाया। 
असलम चुप रहा। 
"अपनी कौम अपने मुल्क  गद्दारी करता है नामाकूल " एक आतंकी ने जोर से असलम के गाल पर चाँटा मारा। 
"न ही मैं अपनी कौम से न ही अपने देश से गद्दारी कर रहा हूँ ,ये तो आप लोग हैं जो इस्लाम मजहब को बदनाम कर रहें हैं और मेरे मुल्क में हैवानियत फैला रहे हैं "असलम ने निर्भीक होकर कहा। 
'चुप रह गद्दार हमें सिखाएगा तू ,मुर्तजा इस हरामखोर को ऐसी मौत दे कि कश्मीर का कोई बंदा हिंदुस्तान की बात भी न करे "हिज़्बुल चीफ़ गरजा। 
जी जनाब "मुर्तजा की आँखें हैवानियत से लाल हो गईं। 
"तुम सभी सुनलो हरामजादो न तुममे और न ही पाकिस्तानी कुत्तों में इतनी ताकत है कि तुम कश्मीर को हिन्दुस्तान से अलग कर सको ,कश्मीर हमारा था ,हमारा है और हमारा रहेगा "असलम समझ गया की देश पर कुर्बान होने का समय आ गया। 
"अगले पल असलम का सर धड़ से अलग होकर जमीन पर पड़ा था ,हिज़्बुल का चीफ ठहाका मार कर हँस रहा था। 
कश्मीर का शेर कश्मीर पर कुर्बान हो चुका था।




-सुशील शर्मा 

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