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 रिज़ल्ट 


सुबह-सुबह पता चला कि आज 10वीं का रिज़ल्ट अमर उजाला में आएगा। उस समय आज के जैसी कंप्यूटर और इंटरनेट की दुनिया नहीं थी। उत्तीर्ण होने वाले लड़कों के रोल नंबर अखबार में छप जाया करते थे। बस इसी तरह से लड़के अपने पास-फेल की जानकारी प्राप्त करते थे। हमेशा की तरह जैन साहब मैनपुरी शहर से अखबार गांव की कपड़े की दुकान पर लाते थे और वहीं पर रिज़ल्ट देखा जाता था। 
 रिज़ल्ट
जैन साहब की कपड़े की दुकान पूरे बाजार में सबसे बड़ी थी, बड़े रईश थे। दुकान में दूधिया बल्व लगे थे। शाम के समय जब बिजली होती थी दुकान में सफेदी बिखर जाती थी, उस समय दूधिया रोशनी में नहाए लोग बड़ी किस्मत वाले लगते थे। वहां संभ्रांत और देश-दुनिया की समझ रखने वाले लोग भी समय बिताने के लिए बैठे रहते थे। आज उस दुकान पर रिज़ल्ट देखा जाएगा यह सोचकर ही मन में सिहरन जाता था।
गांव में हमारी क्लास के बहुत से साथी अपने-अपने पिताजी को साथ लेकर बाजार में आनंद जैन की दुकान पर जा रहे थे। पिताजी को साथ ले जाने का एक कारण यह भी था कि वहां रोल नंबर चैक करने के लिए एक रुपया लिया जाता था। पास होने पर रुपया वापिस नहीं दिया जाता था और यदि फेल है तो रुपया वापस कर दिया जाता था। पिता जी हमें ढूंढते हुए आए और बोले -- 
--"लोग कह रहे हैं कि रिज़ल्ट आ गया है! सभी लोग देखने जा रहे हैं तुम भी अपना रिज़ल्ट चलकर देख लो।"
मैं पिता जी के साथ चल दिया। शाम के समय बड़ी गर्मी थी बिजली भी गायब थी। जैन साहब की दुकान पर बहुत भारी भीड़ लगी थी। पंचलाइट (पैट्रोमैक्स) जलाई गई थी। सभी लोग दुकान में घुसे जा रहे थे। कोई फेल हो जाता था तो मुंह लटकाए सबसे मुंह छिपाए एकांत ढूंढता था। या फिर जबरदस्ती की हंसी हंस देता था। या कोई यह कहकर मन हलका करने की कोशिश करता था -- 
--"हमें तो पहले ही पता था। हमारा गणित का पेपर खराब हो गया था।"
कोई नकल न करने देने पर किसी टीचर को कोसता था। कुछ मार पीट से बचने के लिए पिताजी पर ही दोषारोपण करते थे -- 
"पढ़ाई के टाइम पर हमें  खेतीबाड़ी कामों में उलझाए रखा, अब मैं क्या करूं?"
कोई मन ही मन सोच रहा था कि उस दिन अगर डीडीआर (नकल पकड़ने वाला दल) न आया होता तो मैं अवश्य ही पास हो जाता। 
ताराराम का हाथ पकड़े उसके पिता जी भीड़ में से बोलते हुए निकले-- 
"यह तो पास हो गया।"
निज़ामुद्दीन फर्स्ट डिवीजन पास हो गया था। उसके अब्बू के मुख पर खुशी के साथ गर्व भी था। वे हंसते-हंसाते घर को जा रहे थे रास्ते में पिता जी मिल गए तो पास होने की घटना वीरगाथा की तरह बखान करते नहीं थक रहे थे। 
महिपाल
महिपाल
मैं पिताजी के साथ जैन साहब की दुकान पर पहुंच गया। हिम्मत करके मैं पिताजी के साथ आगे बढ़ा। मन ही मन सोच रहा था कि हो सकता है कि मास्साब ने पास ही कर दिया हो। इस बीच पिताजी आगे बढ़ते हुए जुगल किशोर के पास पहुंच गए। जुगल किशोर पंचलाइट की रोशनी में अखबार पर झुके हुए आंखें गड़ाए थे और लड़कों के नंबर ढूंढ रहे थे और रुपया जैन साहब के पास जमा हो रहा था। पिता जी ने अपनी कसी हुई मुट्ठी से चार चवन्नियां जैन साहब की ओर बढ़ा दीं। और मैंने डरते-डराते जुगल किशोर को अपना रोल नंबर बता दिया। उन्होंने पहले फर्स्ट डिवीजन की लाइन में नंबर चैक किया, नहीं मिला तब उसने सेकेंड फिर थर्ड में देखा कहीं नहीं मिला। डबल चैक भी किया लेकिन रोल नंबर नहीं मिला। फिर उसने हलकी आवाज में बोला-- 
"यह तो फेल है।"
पिता जी उसके मुंह की ओर एकटक देखे जा रहे थे। आश्वस्त होने पर उसने तेज आवाज में बोला-- "इसका नंबर इसमें नहीं है, यह फेल है।"
तभी जैन साहब ने अनमने भाव से वह चार चवन्नियां पिता जी की ओर बढ़ाईं। और बोले--
"यह चवन्नियां वापस ले-लो राम प्रसाद।" 
जैन साहब चवन्नियां हाथ में लेकर पिता जी की ओर बढ़ा रहे थे, लेकिन पिता जी उन्हें वापस लेने के लिए हाथ आगे नहीं कर रहे थे। जैन साहब ने पिता जी की तरफ नजर उठाकर देखा तो वे जुगल किशोर की ओर अपलक देखे जा रहे थे कि उससे कहीं असावधानी में भूल हो गयी हो। मुझे लगा कि गिर पड़ेंगे। 
मैं सिर झुकाए खड़ा था। सभी की निगाहें मेरे ऊपर गड़ी हुई थीं, कुछ में धिक्कार थी, तो कुछ में नसीहत  व सहानुभूति थी, और कुछ में हंसी थी। मुझमें किसी से भी आंखें मिलाने का साहस नहीं था। पता नहीं पिता जी ने अपने आपको कैसे संयत किया। मेरे लिए वहां ज्यादा देर रुकना कठिन हो गया था। 
मैं भीड़ से बाहर निकल आया खेतों की ओर चला गया। दो-चार दिन किसी काम में जी नहीं लग रहा था एक बेचैनी बार-बार मन को कचोट रही थी। पिता जी का जुगल किशोर को अपलक देखता चेहरा और चवन्नियां वापस लेने के लिए हाथ आगे न करना बार-बार मेरी आंखों के सामने आ जाता था। और हर बार अव्यक्त संकल्पों को दृढ़ता प्रदान करता था।


लेखक के बारे में
महिपाल - उ.प्र. में मैंनपुरी जनपद के छोटे से गांव में जन्म। भोगांव तहसील न्यायालय परिसर में पांच साल तक टाइपिस्ट के रूप में निजी कार्य किया। प्रारंभ से साहित्य में रुचि रही। 1985 से अमेरिकी दूतावास के हिन्दी विभाग में लेखन व अनुवाद में कार्यरत। प्रथम बुक्स द्वारा एक बाल कहानी ‘‘सारस’’ हिन्दी सहित छह भारतीय भाषाओं में प्रकाशित। अनुवाद में इग्नू से स्नातकोत्तर डिप्लोमा।

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