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पिता का महत्व


एक व्यक्ति के जीवन में माता-पिता की भूमिका साँप-सीढी के खेल में प्रयुक्त सीढ़ी जैसी होती है जो स्वयं तो वहीं खड़ी रहती है परंतु आपको सफलता की दुनिया में अनेकों पग आगे बढ़ा देती है ।हिन्दू धर्म में भगवान श्री गणेश
पिता
पिता
की प्रार्थना प्रत्येक शुभ व नए कार्य के पहले इसीलिए की जाती है क्योंकि सभी देवी देवताओं में उन्होंने माता- पिता स्वरूपी सृष्टि की परिक्रमा कर अपनी श्रेष्ठता सिध्द की व समस्त वसुंधरा को माता-पिता के महत्व को समझाया।

हमारे जीवन में अपने माता-पिता से अधिक हमारा कोई शुभचिंतक नहीं हो सकता। वे हमारे अंदर अपना प्रतिबिम्ब तो देखना चाहते हैं किंतु स्वयं से भी बेहतर व उत्कृष्ट छवि के रूप में। एक माँ को तो सदैव अपने मातृ गुणों यथा ममता,करुणा,दया आदि के कारण पुत्र से भी और साहित्यिक मंचों/रचनाओं में यथोचित सम्मान मिलता रहा है पर कठोर अनुशासन के माध्यम से भावी जीवन की कठिनाइयों के लिए अपने पुत्र को तैयार करते एक पिता को यथेष्ट मान न देने के कारण साहित्य जगत से मुझे सदैव एक शिकायत सी रही है ।सफल होने पर हम पुत्र उनका योगदान वैसे ही भूल जाते हैं जैसे वट वृक्ष की छाँव की शीतलता में सूर्य के प्रखर ताप को सहते पर्णो की पीड़ा, स्मृत रहता है तो केवल पिता का क्रोध उनकी डॉट डपट।

हमें समझना चाहिए कि पिता-पुत्र का संबंध तीर-कमान जैसा होता है। जब तक कमान में तनाव नहीं होगा शर लक्षित स्थल तक प्रक्षेपित कैसे होगा। क्रोध और कठोर अनुशाशन से  पिता ,माँ के अतिरेक स्नेह और प्यार को संतुलित करने का प्रयास करता है । यदि ऐसा नहीं हो तो अधिकतम प्रायिकता है कि हम अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाएंगे। गीता बबिता भी एक आम नाम होता यदि नेपथ्य में महावीर फौगाट की असाधारण भूमिका नहीं होती। उस पिता के समर्पण और संकल्प को साधु अवश्य ही कहा जाना चाहिए जो अपने पुत्र की सफलता तक उसके प्रति अपने प्रेम का प्रदर्शन नहीं करता, माँ की तरह भावुक नहीं होता ,अपने अंश को चाहकर भी अंक में नहीं ले पाता।

समस्त पितृ-समाज को शतशः नमन।




गोविन्द शर्मा ,
झज्जर, हरियाणा .
मोबाइल नंबर - 8059212483

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