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पछतावा


अंगद, जल्दी उठ जा बेटा ! 10 बजने को है । रात जल्दी सोना और जल्दी उठना सिख ले ।" शिवानी जी ने अपने बेटे को उठाते हुए कहा ।
अरे हाँ माँ, उठ रहा हूँ न, आपको नहीं पता कितना काम रहता है मुझे ।" चिढ़ते हुए अंगद ने कहा ।

शिवानी और तरुण का लाडला और इकलौता बेटा है अंगद इसीलिए उसे ज्यादा कोई कुछ नहीं कहता । कहने भी जाये तो उसकी दादी टोकने लगती है ।
सुबह सब साथ में बैठ कर नाश्ता करने के लिए अंगद का इंतज़ार कर रहे थे
नाश्ता करके कॉलेज के लिए निकला तभी पीछे से जया जी ने (अंगद की दादी जी ने) पीछे से रोकते हुए कहा, "अरे, अपने लिए कुछ ले कर तो जा । कॉलेज में आते ही कुछ नहीं खाता ना ही साथ में कुछ लेकर जाता है ।"
"अरे दादी, मुझे कुछ भी खाना होगा तो में कैंटीन से ही कुछ ले लूँगा, कॉलेज में कोई टिफ़िन ले जाता है क्या ?" फिर से चिढ़ते हुए कहने लगा ।
हर छोटी सी बात पर अपने बड़ो से चिढ कर बात करना, उनसे बात न करना, बड़ो का सम्मान करना मानो भूल ही गया था अंगद ।
मोबाइल 
कि इतने में अंगद नीचे आया और साथ में मोबाइल जिसमे अपने सोशल मीडिया पर बने नए दोस्तों से बाते करने लगा । सब साथ में बैठे थे फिर भी अंगद अकेला ही था । उसका रोज़ का यही काम था, जब देखो अपने मोबाइल लैपटॉप में ही लगा रहता था । सोशल अकाउंट में समय समय पर कुछ न कुछ डालते रहना, नए दोस्त बनाना और उनसे बाते करते रहना बस इसके सिवा और कुछ नहीं करना चाहता था ।
कॉलेज से आने के बाद सीधे अपने कमरे में जाकर  मोबाइल देखने लगा और दोस्तों से बाते करने लगा । अपने दोस्तों, सोशल मीडिया में इतना मगन रहता की अपना खाना पीना तक भूल जाता । रोज़ अपनी माँ से फटकार सुन ने के बाद भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ता ।
सबसे बाते करना तो दूर वो किसी के पास आकर भी नहीं बैठता । नाश्ता, खाने के वक़्त भी अपने हाथ में मोबाइल रखना नहीं भूलता ।
अपने दोस्तों के साथ बाहर गए हुए अंगद के पास अचानक ही शिवानी जी का फ़ोन आया, कह रही थी "अंगद, तुम्हारी दादी की तबियत अचानक ही ख़राब हो गयी है, जल्दी से घर आ जा बेटा ।"
यह सुनते ही अंगद 'जिसकी दुनिया सिर्फ और सिर्फ मोबाइल, लैपटॉप थी' के आगे अपनी दादी का चेहरा घूमने लग गया । वो दादी जिनकी बात-बात पर गुस्सा करता रहता, उनकी किसी भी बात को टालमटोल करता रहता था ।
अपनी दादी को देखने के लिए जल्दी ही हॉस्पिटल आया और अपनी दादी से मिलने को पूछता रहता । अपनी दादी से बात करने के लिए उसका मन मचल सा गया ।
थोड़े ही दिनों में डॉक्टर्स ने तरुण जी से माफ़ी मांग ली । अंगद जो की अपनी
दीपिका सोनी
दादी से बात करने को बेचैन हो रहा था, जब उसे पता चला कि उसकी दादी जो उसे अपनी माँ की फटकार से, पिता की डाँट से बचाती थी, वो अब उस से कभी बात नहीं कर पाएंगी तो उसे अपनी दादी की पुकार सुनाई देने लगी, याद आने लगी थी ।
अब अंगद को अपनी दादी की बातें याद आने लगी, जब वो कहती, "अंगद, कभी तो मुझसे बात किया कर, मेरे पास आकर बैठ जाया कर ।"
उनकी बातों को याद करके बस सिर्फ रो सकता था अंगद और कुछ नहीं ।
असल में भी यही होता है ।आज बहुत से लोग अंगद जैसे है जो सिर्फ नए दोस्त बनाने के चक्कर मैं अपनी ज़िम्मेदारियां भूले बैठे है, जिनकी दुनिया सोशल मीडिया के ही इर्द-गिर्द है, जो इसके चक्कर में अपने परिवार को छोड़ दूर बैठे लोगों से रिश्ता जोड़ने में लगे है । मेरा कहना ये नहीं है कि अपनी ज़िन्दगी में कोई नए दोस्त न बनाये या फिर सोशल मीडिया पर न रहे । नए रिश्ते बनाना अच्छी बात है लेकिन नए लोगों के बीच रहने के साथ ही साथ अपनों से भी जुड़े रहना चाहिए । अपने परिवार के लिए ज़रूर वक़्त निकालें, अपनों के पास बैठे, उनसे ख़ूब सारी बातें करें ।
नहीं तो कहीं ऐसा न हो की बाद में पछतावे में अपना जीवन बिताना पड़े ।




- दीपिका सोनी
बीकानेर, राजस्थान ।
साहित्यिक परिचय - कई ब्लॉग्स के लिए लेखन, नवोदित लेखिका ।

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  1. बहुत बढ़िया और वास्तविकता से भरी कहानी हैं दीपिका जी, आज काल हर कोई अंगद जैसा ही होता चला जा रहा हैं, इस tenchology से हमारे बहुत से friends तो बन रहे हैं लेकिन जो हमारे पास के लोग हैं उनसे हम धीरे धीरे दूर होते जा रहे हैं.

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