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नंदू को चाहिए रोटी


अपनी लोक चेतना का
चिंतन
सचेत होकर जब झांकता है
तो बाहर का
रोटी
अग्निमय स्पर्श
झुलसाता है अंतर्मन को।
हर तरफ धुँआ है,
एक तरफ खाई है
एक तरफ कुँआ है।
विकास है
एक बंदर है
कुछ मदारी हैं
चारों ओर भीड़ है
सब मदारी मिल कर
स्वतंत्रता की जंजीर से कसे
उस बंदर को
राष्ट्रभक्ति, असहिष्णुता
साम्प्रदायिकता, धर्म निरपेक्षता
और न जाने किन किन
कठिन शब्दों का नृत्य
उस बंदर के चारों ओर
लगे हैं कुछ पिंजरे
जिन पर लिखा है
गांधीवाद, समाजवाद
मार्क्सवाद, राष्ट्रवाद
स्वतंत्रता, जनतंत्र
शांति सुरक्षा,रोजगार
बारी बारी से उस बंदर को
उन पिंजरों में घुसा कर
फिर निकाला जाता है।
फिर इन्ही नामों की कुछ
केंचुलिया पहने वो मदारी
सड़कों पर चिल्लाते है
देखो मेरी कमीज इससे सफेद है।
उस भीड़ से कोई दाना मांझी
निकलता है अपनी पत्नी का शव लेकर।
उसके पीछे बिलखती उसकी नन्ही बेटी।
तब कोई वाद की तलवार मुझे
चीरती निकल जाती है।
जब भूख से मरे हुए नेमचंद
की माँ को उसकी लाश के पास
स्तब्ध बैठा देखता हूँ तो खुद को
सड़क पर नंगा दौड़ता पाता हूँ।

मेट्रो के सामने भूख से बिलखते
बच्चे के पेट में समाजवाद तलाशता हूँ।
वृद्धाश्रम में बूढ़ी थरथराती टांगे
गांधीवाद को खोजती हैं।
पातालकोट के निरीह आदिवासी
उस मार्क्सवाद से पूछते हैं कई सवाल।
इस जनतांत्रिक जंगल में
हर शेर एक निरीह शिकार की खोज में है।
देखते ही फाड़ देता है निरीह अस्तित्व को।
हर टीवी चैनल चीखता है
भूख से मरे आदमी को बेचकर
खूब पैसा पीटता है।
रेत से भरे डंफरों की गड़गड़ाहट में।
लुटती नदियां सिसक रही हैं
किसी बलात्कार सहने वाली अबला सी।
इस जनतंत्र के वहशी जंगलों में
हर पेड़ पर सत्ता की आरी है।
घास की रोटी खाने वाले
उन आदिवासियों को नही पता
कि
उनका भारत अब इंडिया बन गया है।
ई वी एम मशीनों पर उनकी
उनकी उंगलियां वैसे ही लगवाई जाती हैं।
जैसे उनके दादाओं से साहूकार अंगूठे लगवाते थे।
हर भीड़ अपने हाथों में तलवार लेकर।
सत्ता से सड़क तक उन्मत्त है
सत्ता के गलियारों में बदलती टोपियां।
एक चेहरा उतार कर दूसरा चेहरा पहने।
बंदर को लुभाते जुमले
संसद के गलियारों में ठहाके है गाली गलौज है।
बंदरों के पैसों की मौज है।

गांव के नंदू को
न समाजवाद से कुछ लेना देना है
न जनतंत्र उसका बिछोना है।
उसे तो हर हाल में
कुछ रोटी,कुछ प्याज, नमक
अपनी बेटी की शादी
एक घड़ा पानी और घासफूस की छत चाहिए।
उसे ये दे दो
फिर नए नए चेहरों से
समाजवाद, राष्ट्रवाद, गांधीवाद, जनतंत्र आदि उगलते रहना
लड़ते रहना और भोंकते रहना।



- सुशील शर्मा 

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