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शरणागत वृंदावनलाल वर्मा
Sharnagat Vrindavan lal Verma

शरणागत कहानी का सारांश sharnagat summary in hindi - शरणागत वृंदावनलाल वर्मा जी एक महत्वपूर्ण एवं शिक्षाप्रद कहानी है।इस कहानी का प्रमुख पात्र रज्जब अपना व्यवसाय करके अपने गाँव ललितपुर लौट रहा था। उसके साथ उसकी बीमार पत्नी थी। रास्ता बीहड़ सुनसान था।  दिन समाप्त हो रहा था और गाँव अभी दूर था।  इस कारण वह अपनी पत्नी के साथ भड़पुरा गाँव में रूककर रात बिताना चाहता था।  रज्जब कई दरवाज़ों पर शरण के लिए गया परन्तु उसकी जाती और व्यवसाय को जानकार किसी ने भी उसे शरण नहीं दी। अंत में वह शरण की आशा से एक ठाकुर साहब के द्वार पर जाकर सलाम करके बोलै कि वह दूर से आ रहा है। उसकी पत्नी बीमार है। अतः रात भर के लिए कहीं शरण ले दीजिये।  उसकी जाति सुनकर प्रारम्भ में ठाकुर साहब शरण देना अस्वीकार कर देते हैं। परन्तु उसकी दीनता सुनकर अंत में शरण दे देते हैं।  रज्जब अपनी पत्नी के साथ रात्रि में विश्राम करता है और प्रातः अन्धकार में ही चले जाने की बात कहता है।
रज्जब के सो जाने के बाद कुछ आते हैं हैं। उनकी बात -चीत से लगता है कि ये राहजनी करने वाले गिरोह के सदस्य हैं।  वे रज्जब का पीछा कर रहे हैं परन्तु सफल नहीं हो सके थे।
सबेरे रज्जब न जा सके क्योंकि उसकी पत्नी ठीक न हो सकीय।  विवश होकर उसने एक गाड़ी किराये पर लिया।  बीमार पत्नी के साथ वह ललितपुर के लिए काफी दिन चढ़े चला। गाड़ीवान बड़ी मंद गति से गाडी चला रहा था। इससे रज्जब और गाड़ीवान में बड़ी गरमा गरम बहस हुई।  घर पहुँचने के पूरब पुनः अन्धकार हो गया। बीच रास्ते में ही राहजनी करने वाले का दाल उसे मिला।  इस दल के नेता वही ठाकुर साहब थे जिनके यहाँ रज्जब रात में शरण लिया था। ठाकुर साहब रज्जब को पहचान जाते हैं।  उन्हें शरणागत धर्म की बात याद आती हैं। अपने साथियों द्वारा विरोध करने पर वह रज्जब की रक्षा करते हैं और वह लुटे जाने से बच जाता है।

ठाकुर साहब का चरित्र चित्रण - 

शरणागत ललितपुर का रहने वाला रज्जब नामक कसाई था।  वह अपनी पत्नी को लेकर अपने पेशे का व्वसाय करके वापस लौट रहा था।पत्नी के अचानक तबियत ख़राब हो जाने से सर्वप्रथम जिस समय रज्जब ठाकुर साहब के द्वार पर जाकर शरण की याचना करता  करता है। उस समय एक अपरचित कसाई को अपने यहाँ शरण देना उन्हें अच्छा नहीं लगता था। परन्तु जब वह दीन वाणी में बार -बार गिड़गिड़ाता है तो उनके मन में उसके प्रति दया उत्पन्न होती है। यहाँ कहानीकार ने यह बताना चाहा है कि ठाकुर साहब बड़े आदमी होकर बी एक दयावान और नेक इंसान हैं।  वे बहुत विचार वान व्यक्ति हैं और किसी कार्य को करने से पहले वे काफी आगे - पीछे सोचकर और समय आने पर सही निर्णय लेते हैं।  वह इस शर्त के साथ शरण देते हैं कि प्रातः काल ही वह उनके यहाँ से प्रस्थान कर देगा। इस प्रकार ठाकुर साहब के इस ववशार से उनका शरणागत धर्म भाव झलकता है।  वह अपनी गरिमा तथा इस धर्म की गरिमा से प्रभावित होकर उसके साथ यथोचित व्वहार करते हैं।  रज्जब वहीँ ठाकुर साहब की व्वसथानुसार रात्रि में विश्राम करता हैं।
ठाकुर साहब दूसरे दिन उसे गाड़ी करके चले जाने का प्रस्ताव रखते हैं। इस माध्यम से वह आसानी से घर पहुँच सकता था।  ठाकुर साहब का शरणागत के प्रति अच्छा व्वहार उस समय प्रकट होता है जब ठाकुर साहब के ही दल ने रज्जब को लूटने का बार -बार प्रयास किया। वह रज्जब को पहचान जाते हैं और शरणागत को लूटना वह अधर्म समझकर अपने साथियों के विरोध के वावजूद भी उसकी रक्षा करते हैं क्योंकि वह उनकी शरणागति में रहा है। अतः जिसे शरण का सहारा दिया जाय उसे लूटना ,प्रताड़ित करना और कष्ट पहुँचना उचित ही नहीं बल्कि बहुत बाद पाप और अधर्म हैं। शरणागति की रक्षा के लिए तो लोग अपने प्राण की बाज़ी तक लगा देते हैं।  ठाकुर साहब अपनी गरिमा और शरणागति धर्म की गरिमा को भली प्रकार समझते हैं।  वह निर्भीक प्रकृति के व्यक्ति हैं।  इसी कारण अपने दल के लोगों पर उनका अच्छा रोब है।  इसी रोब और अधिकार से वह रज्जब की रक्षा करने में सफल सिद्ध होते हैं।
अंततः ठाकुर साहब का चरित्र एक ऐसे संत व्यक्ति का चरित्र है जिसमें शरणागत धर्म की रक्षा का बहुत महान गुण है।  शरणागत की रक्षा उनका एक ऐसा महान गुण है जो उनके सभी अवगुणों को ढक कर समाप्त सा कर देता है।

शरणागत कहानी शीर्षक की सार्थकता - 

शरणागत व्यक्ति ललितपुर का रज्जब नामक कसाई था।  वह अपना व्वसाय करके अपनी पत्नी के साथ घर लौट रहा था।  उसकी पत्नी बीमार थी।मार्ग अत्यंत बीहड़ और निर्जन था।ललितपुर अभी बहुत दूर था। रात्रि हो चुकी थी। अतः कहीं शरण लेना उसके लिए आवश्यक हो गया था।वह भड़पुरा गाँव में शरण लेना चाहता था।परन्तु कसाई जाति का जानकार कोई भी उसे शरण देने को तैयार नहीं था।
अतः वह चारो ओर से निराश होकर गाँव के ठाकुर  शरण के पहुँचा। वहाँ पहुँचकर उसने अपनी मज़बूरी का बयान किया। प्रारम्भ में तो ठाकुर साहब ने भी शरण देना स्वीकार नहीं किया परन्तु रज्जब के बार -बार अनुनय - विनय करने पर उन्हें दया आ गयी और उन्होंने रज्जब को शरण दे दी। कहानीमें ठाकुर साहब ऐसे  व्यक्ति का चरित्र है जिसमें शरणागत धर्म की रक्षा का बहुत महान गुण है।  शरणागत की रक्षा उनका एक ऐसा महान गुण है जो उनके सभी अवगुणों को ढक कर समाप्त सा कर देता है।


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