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बिटिया

मैं माँ बाबा की बिटिया
पर बिटिया कम इज्जत का सामान ज्यादा
मुझको पाठ पढ़ाये बचपन से जाते
तुझको ये करना वो न करना
क्योंकि तु है हमारी बिटिया
बिटिया होती घर की इज्जत
वो पहने लज्जा का गहना
मुझको कहते घर की लक्ष्मी
तृष्णा सागर
तृष्णा सागर
इसीलिए ना जाने देते अपने दामन से बाहर
रक्खा मुझको बड़ा संभाल कर
इसलिए नहीं की मैं उनकी बिटिया
इसलिए क्योंकि मैं हूँ उनकी इज्जत
पर क्या मिला मुझको
इस इज्जत के ताज को पहन कर
ना आजादी ना वो जीवन जो मेरे पिता और भाई ने जिया
फिर क्यों पहने हूँ मैं इस इज्जत के ताज को
आज उतारा मैंने ये ताज
पहले मुझको समझाया मेरी माँ ने
फिर बाबा ने फिर भैया ने
पर मुझको ना आया समझ
 कि मैं ही क्यों पहनूँ ये ताज
क्यों ना पहना इसको कभी बाबा ने
क्यों ना पहना कभी भैया ने
क्या इतना भारी दायित्व सिर्फ मेरे ही सर
एक सुनाती तुमको किस्सा
एक बार थी मेरे स्कूल की परीक्षा
माँ ने कहा
देख कभी असफल हुई तो कुछ ऐसा वेसा न करना
तूने कुछ किया तो होगी हमारी खूब बदनामी
लड़का कुछ करे तो न कहता कुछ समाज
पर लड़की को कहता ये समाज कहीं गयी वो भाग
उस दिन मेरे अंदर कुछ टूटा आवाज आई
तु नहीं इनकी बिटिया तु केवल है इज्जत का सामान
सवाल उठा ये समाज है किस से
मेरे घर जैसे अनेको घर से ही तो
ठान लिया मैंने आज बदलूंगी ये समाज
सबसे पहले अपना घर
पर इस बदलने की श्रृंखला में बदल गया
मेरा सब कुछ मेरी माँ मेरे बाबा
जो रखते थे मुझको बड़े लाढ़ से
छोड़ा उन्होंने मेरा साथ हुए मेरे खिलाफ
आज जब मैंने जिना चाहा
तब मुझको किया घोषित आवारा
समझ ना आया क्यों हुई ये घोषणा
गयी सुबह 10 बजे आई वापस शाम 5 बजे
भाई जाता सुबह 10 बजे आता रात 12 बजे
फिर वो क्यों कहलाये राजा बेटा और मैं आवारा
क्योंकि मैं नही इनकी बिटिया मैं हूँ केवल इज्जत का समान


दिल्ली वाली

सुन ओ दिल्ली वाली
छैल छबीली दिल्ली वाली
कहाँ चली तु इठलाती।
सुन रे भैया न रोको मेरा रास्ता
मैं भी तेरी बहना
क्या हुआ अगर हूँ दिल्ली वाली।।
चल री ज्यादा ना रोब बना
तु कैसी सब पता
रोज जाती डिस्को-क्लब
सीधी बनती अब।
अरे जारे मर्द
ना तु मेरा भैया
न मैं तेरी बहना
अगर मैं गयी हूँ क्लब
तो क्या हो गयी तेरे लिए उपलब्ध
ये बतला तु मुझको गर तु करता रात भर पार्टी
तो क्या तेरी बहन कहती तुझको पापी
मेरा भी है पूरा अधिकार
मैं भी जाऊँ सुरक्षित हर पार
चल माना मैंने पहने छोटे कपड़े
पर तुझको किसने दिया अधिकार करने को मेरे टुकड़े
क्या अम्मा नही पहनती ब्लाउज़
उसमे ना दिखता उनका तन
या फिर नहीं छोड़ता उसको भी तेरा भूखा मन
तु नोचेग मुझको दिल्ली की आढ़ में
ऐसा ना करने दूंगी मैं इस अत्याचार की बाढ़ में।।
                                      - तृष्णा सागर

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