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नज़रिया

मेरे मित्र का जन्मदिन था. हम दोनों  बाइक पर मन्दिर से वापस आ रहे थे. मेरे मित्र का उसके घर में कुछ कहा-
सुनी हो गई थी इसलिए वह गुस्से में था. कह रहा था- " मुझे जिन्दगी में शान्ति ही नही   है, ये जीना भी क्या जीना है..!!".
आते वक्त रास्ते में हमें एक वृद्ध व्यक्ति दिखे. वह बीच सड़क खड़े अपने डण्डे से कुछ खोज  रहे थे. मेरा मित्र वैसे ही गुस्से में था अतः ध्यान न देते हुए हम आगे बढ़ गए. पर अचानक मेरे मित्र ने कहा कि चलो देख के आते हैं. हम वहां वापस गए तो चौंक गए. वह अन्धे थे. हमने पुछा -" बाबा, क्या बात है?". उन्होने कहा-" बेटा, मेरा घर चौक  से लगभग इतनी ही कदमों पर था, लेकिन अभी मिल नही रहा. उनकी विवशता देख हमें दया आ गई क्योंकि बस 15-20 कदमों पर ही उनकी टुटी-फुटी झोपड़ी थी. हम उनको उनके घर तक ले गए. आश्चर्य की बात ये कि झोपड़ी में हर चीज़ व्यवस्थित तरीके से थी. मरम्मत किया हुआ एक खाट,बगल में पानी की मटकी...कोने में रखे 2-4 बर्तन  और एक जोड़े कपड़े.  हमनें पुछा कि बाबा इसमें और कौन रहता है?. कोई नही , सिर्फ मैं अकेला...उन्होने कहा. पर ये झोपड़ी..??,हमने उत्सुकता से पुछा.. चौक के बच्चों ने मेरे लिए बनाया है ये' कहते हुए उन्होने अपना डण्डा बिस्तर के बगल में रखा और वहीं बैठ गए.
उस समय हम दोनों के मन में बस एक ही बात आघात कर रही थी कि इन दिव्यान्ग को अपने जीवन से कोई शिकायत नही और अगर है भी तो इन्होने जिन्दगी जीना छोड़ा नही. शायद इसे ईश्वर का तोहफा कहें या सीख, पर इस घटना ने हम दोंनो को जिन्दगी जीने का एक नज़रिया ज़रुर दे दिया. जाते वक्त हमनें उनको खाने के लिए कुछ पैसे दिए. उन्होने कहा-" खुशी रहो बेटा" .




सागर सिंह कुशवाहा
स्नातक- भूगोल (प्रतिष्ठित)
जिला- झारसुगुड़ा (ओडिशा)
ई-मेल-   imsagar14@rediffmail.com


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  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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