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महाभारत की एक सांझ

महाभारत की एक सांझ का संदेश / उद्देश्य Mahabharat ki ek saanjh uddeshya

महाभारत की एक साँझ ,भारत भूषण अग्रवाल जी द्वारा लिखित प्रसिद्ध एकांकी है . यह पौराणिक पृष्ठभूमि पर आधारित एकांकी है .यह कौरवों और पांडवों के बीच हुए युध्य पर आधारित है .धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे . उनके सौ पुत्र तथा एक पुत्री थे .उनके छोटे भाई का नाम पांडु था .जन्मांध होने के कारण वह राजा नहीं बन सकते है इसलिए पांडु राजा बने .उनके पाँच पुत्र थे ,जो की युधिष्ठिर,भीम,अर्जुन,नकुल और सहदेव थे . कुछ समय बाद पांडु धृतराष्ट्र को राज्य सौंप कर वन चले गए और वहां उनकी मृत्यु हो गयी है . कालांतर में जब युधिष्ठिर ने राज्य पर अपना अधिकार माँगा तो दुर्योधन बौखला गया .सदाचारी पांडव पाँच ग्राम लेकर संतुष्ट थे ,पर दुर्योधन उन्हें सुई की नोक के बराबर भूमि देने के लिए तैयार नहीं हुआ .इसी बात पर महाभारत का विनाशकारी युध्य हुआ . युध्य के अंत में कौरवों की हार हुई और पांडवो की जीत हुई .
इस प्रकार अन्याय पर न्याय की ,असत्य पर सत्य की ,दुराचरण पर अच्छे आचरण की जीत हुई . मनुष्य को हमेशा अच्छे मूल्यों के साथ जीना चाहिए तथा सद्कर्म ,परोपकार की भावना रखनी चाहिए .इसी महत्व को प्रस्तुत एकांकी में एकांकीकार ने समझाया है .

महाभारत की एक सांझ शीर्षक की सार्थकता shirshak ki sarthakta

महाभारत की एक साँझ एकांकी में एकांकीकार भारत भूषण अग्रवाल जी द्वारा एक पौराणिक कथा -वस्तु को एक नवीन रूप दिया गया है . लेखक ने यह भी समझाने का प्रयास किया है की महाभारत के विनाशकारी युध्य के लिए केवल दुर्योधन ही जिम्मेदार नहीं था ,बल्कि पांडव की महत्वकांक्षी प्रवृति भी किसी न किसी रूप में जिम्मेदार थी .
एकांकी में महाभारत का युध्य समाप्त हो चुका था .कौरव पक्ष की ओर से अकेला जीवित दुर्योधन द्द्वैतवन के एक सरोवर में छिपा हुआ था . पांडवों के ललकारने पर वह विबस होकर बाहर आया .भीम के साथ गदा युध्य हुआ .दोनों महारथी भिड़े हुए थे कि तभी श्रीकृष्ण ने भीम को संकेत किया कि वह दुर्योधन की जंघा पर प्रकार करे .भीम के ऐसा करने पर दुर्योधन चीत्कार करता हुआ बुरी तरह आहत होकर गिर पड़ा और पांडव जयघोष करते हुए चले गए .
सब्ध्य के समय जब युधिष्ठिर उसे सांत्वना देने आये तो दुर्योधन ने उन्हें ही विनाशकारी युध्य के लिए दोषी ठहराया .उसने यह भी कहा इस युध्य के लिए पांडवों की महत्वाकांक्षा की पूरी तरह से जिम्मेदार है .इसी प्रकार संध्या के समय ही प्रलाल करते करते दुर्योधन ने अपने प्राण त्याग दिए .
महाभारत की एक साँझ पाठकों को झकझोर देती है तथा कुछ अलग हट कर सोचने के लिए मजबूर कर देती है ,की क्या युध्य के लिए कौरव ही जिम्मदार थे ,पांडव नहीं .इसी प्रकार एकांकी का शीर्षक सार्थक एवं उचित है .

Mahabharat ki ek saanjh charitra chitran

दुर्योधन का चरित्र चित्रण 
महाभारत की एक साँझ एकांकी में दुर्योधन एक प्रमुख पात्र बन कर उभरता है . वह धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों में सबसे बड़ा था .उसका मूल नाम सुयोधन था पर अपने दुराचरण के कारन दुर्योधन के रूप में जाना जाने लगा . वह अत्यंत वीर ,पराक्रमी तथा युध्य विद्या में कुशल था . वह सोचता था की यदि उसके पिता अंधे नहीं होते तो वही हस्तिनापुर का राजा बनता . उसके पिता धृतराष्ट्र ने उसके पुत्र मोह में अंधे होकर उसे निरंकुश और स्वेच्छाचारी बना दिया . वह पांडवों को सुई की नोक के बराबर भी भूमि देने के लिए तैयार नहीं था .इसी जिद के कारण महाभारत का युध्य हुआ .लेकिन कौरवों के सभी पक्षकार मारे गए .घायल होकर दुर्योधन स्वयं भी एक सरोवर में जा छिपा ,लेकिन पांडवों ने उसे वहाँ भी नहीं छोड़ा .भीम के साथ दुर्योधन का भीषण गदा युध्य हुआ .श्रीकृष्ण के कहने पर भीम ने उसकी जंघा पर प्रहार किया जिससे उसकी मृत्यु हो गयी .
दुर्योधन ने अंत समय में भी महाभारत के युद्ध के लिए पांडवों को दोषी ठहराया .उसे इस बात का दुःख था कि उसके पिता यदि अंधे न होते तो वह इस प्रकार न मारा जाता ,वह आज हस्तिनापुर का राजा होता .

महाभारत की एक साँझ समरी (mahabharat ki ek saanjh summary)

महाभारत की एक साँझ ,एकांकी एकांकीकार भारत भूषण अग्रवाल जी द्वारा लिखी गयी है . प्रस्तुत एकांकी में महाभारत के युध्य की एक विशेष संध्या का सजीव चिर्त्रण किया गया है . महाभारत का युध्य कौरव और पांडवों के मध्य हुआ था .न्याय और अन्याय के पक्ष को लेकर इस पौराणिक युध्य में कौरवों की हार हुई और पांडव विजयी हुए . इस युध्य में कौरव पक्ष के सभी प्रमुख सैनिक मारे गए परन्तु पक्ष के प्रमुख सुयोधन बच गया था .वह अपनी जान बचाने के लिए द्वैत वन के सरोवर के जल स्तम्भ में चिप गया परन्तु न जाने पांडवों को कैसे इसकी खबर लग गयी . वे सरोवर के पास गए .पांडवों ने दुर्योधन को ललकारा . दुर्योधन ने अंततः गदा लेकर युध्य करने का निश्चय किया . पांडवों की ओर भीम गदा लेकर उतरे .दोनों में भयकर युध्य हुआ तभी श्रीकृष्ण के ईशारे पर भीम ने उसकी जंघा पर गदा प्रहार किया और दुर्योधन चीत्कार कर गिर पड़ा .पांडव जयघोष करते हुए चले गए. संध्या समय सबसे पहले अश्वत्थामा आया और पांडवों से बदला लेने की बात कहकर चला गया . इसके बाद युधिष्ठिर आये .उनके बीच आरोप -प्रत्यारोप चलता रहा .अंत में दुर्योधन ने कहा कि उसे युध्य के लिए कोई ग्लानी नहीं है .केवल एक ही दुःख उसके साथ जाएगा .वह यह की उसके पिता अंधे क्यों हुए ? नहीं तो वह ही राजा बनता ....
इस प्रकार एकांकी का अंत होता है .



प्रश्न उत्तर 


प्र.१.  धृतराष्ट्र कौन है ?

उ. धृतराष्ट्र महाभारत काल में हस्तिनापुर के राजा थे . वे  जन्मांध  थे .उनके सौ पुत्र थे . उनमे पुत्र दुर्योधन अत्याचारी ,निरंकुश और कुशल योध्या था .उनकी पत्नी का नाम गांधारी था .उनके पुत्र मोह के कारण ही दुर्योधन पर अंकुश नहीं लगा सके और जो युध्य का कारण बना .

प्र.२.  दुर्योधन कौन था ,वह कहाँ छिपा बैठा था ?

उ. दुर्योधन ,धृतराष्ट्र का पुत्र था .महाभारत के युध्य में हार के बाद वह अपनी आत्म रक्षा के लिए द्वैत वन के सरोबर में जल स्तम्भ में छिप कर बैठा था .

प्र.३.  जब भीम दुर्योधन को ललकारता है तो युधिष्ठिर भीम से क्या कहते हैं ?

उ. भीम जब दुर्योधन को ललकारते हैं कि तू अपने आप को बचाता फिर रहा है तेरे सारे सहयोगी मारे जा चुके हैं तब युधिष्ठिर भीम से कहते हैं कि दुर्योधन से लज्जा की कामना नहीं करनी चाहिए क्योंकि वह बड़ा ही पापी है .

प्र.४. दुर्योधन की सामान्य इच्छा क्या है ? उसे किस बात की ग्लानी थी ?

उ. दुर्योधन की सामान्य इच्छा थी कि वह अब शान्ति और मेल से रहे और सामान्य जीवन यापन करे. उसे इस बात की ग्लानी हो रही थी कि वह युध्य में पांडवों को पराजित नहीं कर सका ,जीवन भर का संघर्ष व्यर्थ ही गया .

प्र.५.  पांडव किस प्रकार दुर्योधन को पराजित कर पाए ?

उ. किसी प्रकार से प्राण न बचते देख दुर्योधन ने गदा युध्य करने की माँग की . पांडवों की ओर से भीम गदा लेकर उतरे . दोनों में भयकर युध्य हुआ ,तभी श्री कृष्ण के इशारे पर भीम ने उसकी जंघा पर प्रहार कर हरा दिया और दुर्योधन गिर पड़ा. पांडव जयघोष करते चले गए.

प्र.६.  युधिष्ठिर, अंत समय में दुर्योधन के पास क्यों गए थे ?

उ. युधिष्ठिर दुर्योधन को अंतिम समय में सांत्वना देने आये थे . वह यह चाहते थे कि यदि दुर्योधन अंत समय में  पश्चाताप कर रहा होगा तो वह दुर्योधन को आत्म बल देंगे.

प्र.७.  दुर्योधन ने युधिष्ठिर पर क्या - क्या आरोप लागाये ?

उ. अंत समय में दुर्योधन ने युधिष्ठिर पर पर महाभारत के युध्य में हुए जनसंहार के लिए ठहराया . मरते समय भी उसे एक ही बात का दुःख था कि यदि उसके पिता अंधे न होते तो उसे यूँ न मरना पड़ता .वह हस्तिनापुर का राजा होता और उसे पांडवों से किसी तरह का विरोध का सामना न करना पड़ता .



वीडियो के रूप में देखें -



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  1. Prastut ekanki ke antargat pratyek patra kaa charitra chitran apekhit Hai,board ke drishtikon seesabhi matavpurna hain

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