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बाघ

                                                                      ( एक )

                उस दिन वे दोनों एक मीटिंग के सिलसिले में देर शाम तक दफ़्तर में बैठे रहे थे । मीटिंग के बाद बाक़ी सहकर्मी तो चले गए पर वह सूरज के साथ बैठ कर बातें करती रही । उसका ' वर्किंग वीमेन्स हॉस्टल ' पास में ही था । दफ़्तर के बाद सूरज अक्सर उसे अपनी बाइक पर वहाँ छोड़ देता था ।
               तभी लाइट चली गई थी । और बहुत पास ही से -- जहाँ सूरज बैठा हुआ था , वहाँ से -- किसी बाघ के गरजने की भयावह आवाज़ आई । वह डर कर ज़ोर से चीखी थी । लेकिन अगले ही पल लाइट वापस आ गई थी । सूरज अपनी जगह पर बैठा हुआ था । कहीं कोई बाघ नहीं था । वह आवाज़ क्या उसका भ्रम थी ?
               " क्या हुआ , निशी ? "  सूरज ने पूछा था ।
               " वह कैसी आवाज़ थी ? " उसके स्वर में घबराहट थी ।
               " कौन-सी आवाज़ ? "  सूरज ने उलझन भरी निगाहों से उसे देखा था ।
               " तुम्हारे पास से ही किसी बाघ के गरजने की डरावनी आवाज़ आई
थी । " उसने कहा ।
               सूरज ने अपने कंधे उचकाए थे , जैसे वह कुछ भी समझ नहीं पाया हो ।
                यक़ीनन वह किसी बाघ की ही आवाज़ थी -- निशी ने सोचा । वह रणथंभोर बाघ अभयारण्य में घूम कर बाघों को क़रीब से देख चुकी थी । उनके गरजने की आवाज़ से वह परिचित थी । दफ़्तर में बाघ की आवाज़ कैसे आई -- उसने सोचा ।
               उस शाम की घटना के बाद भी एक-दो बार उसने अँधेरे में बाघ के गरजने की आवाज़ सुनी थी -- और हर बार वह सूरज के साथ थी । एक बार देर शाम के समय वे दोनों दफ़्तर के गलियारे में साथ चल रहे थे ।
तभी बत्ती चले जाने की वजह से वहाँ अँधेरा हो गया था और जहाँ सूरज खड़ा था , ठीक वहीं से किसी बाघ के गरजने की भयावह आवाज़ ने उसे भीतर तक हिला दिया था । जब लाइट वापस आई तो उसने खुद को डर के मारे काँपता हुआ पाया था । लेकिन उसके बगल में कोई बाघ नहीं था । सूरज वहाँ सकपकाया-सा खड़ा था । उसने फिर सूरज से बाघ की आवाज़ के बारे में पूछा । जवाब में सूरज ने अस्पष्ट-सा कुछ कहा था जिसका भाव सम्भवत: यह था कि शायद निशी ने कोई काल्पनिक आवाज़ सुनी होगी । किंतु अब उसके मन में यह संदेह सुदृढ़ होता जा रहा था कि ज़रूर सूरज का बाघ की आवाज़ के साथ कुछ लेना-देना है । वह आवाज़ रोंगटे खड़े कर देने वाली थी और उसके साथ यह दूसरी-तीसरी बार हुआ था ।
                निशी अब अँधेरे से डरने लगी थी -- ख़ास करके जब वह सूरज के साथ होती तब । वह अपने पर्स में एक तेज रोशनी वाला टॉर्च रखने लगी थी । दरअसल वह सूरज को चाहती थी । सूरज भी उसे चाहता था । पर बीच में न जाने कहाँ से बाघ का यह बवाल आ गया था ।
                क्या सूरज के बारे में उसका शक सही था या यह उसका वहम मात्र था । क्या वह काल्पनिक आवाज़ें सुनती थी ? इसके जवाब में उसने हिम्मत करके खुद कई बार एक परीक्षण किया । जब कभी वह शाम के समय सूरज के साथ होती तो वह जान-बूझ कर किसी बहाने से कमरे की बत्ती बंद करके देखती । हर बार उसे सूरज के पास से किसी बाघ के गरजने की आवाज़ सुनाई देती । अब उसका शक यक़ीन में बदल गया था । कल मैं सूरज से इस रहस्य के बारे में दोटूक बात करूँगी
-- उसने तय किया ।

                                       ( दो )

               रात ढाई बजे का समय था । कमरे में सोई युवती की नींद किसी आवाज़ की वजह से खुल गई । कमरे की बत्ती बंद थी पर उसे लगा जैसे कमरे में कोई चल रहा था । और तब उसके बहुत पास से बाघ के गरजने की डरावनी आवाज़ आई ।
वह डर कर ज़ोर से चिल्लाई । उसने किसी के भागने और खुली खिड़की से बाहर छलाँग लगाने की आवाज़ सुनी । उठ कर उसने कमरे की बत्ती जलाई और खिड़की के बाहर झाँका । दूर कहीं एक युवक की धुँधली आकृति भागी चली जा रही थी ।
              इस घटना से उपजे कुछ प्रश्न ये हैं :
              ( क ) क्या यह वही युवती है जो पिछली कहानी में मौजूद थी ?
              ( ख ) क्या यह वही युवक है जिसके साथ बाघ का रहस्य जुड़ा हुआ था ?
               उत्तर ( क ) : जी हाँ , यह वही युवती है जो पिछली कथा में मौजूद थी । सुबह के दस बजते ही वह एक अस्पताल में कान के डॉक्टर के पास अपने कान दिखाने जाती है । डॉक्टर उसके कानों की पूरी जाँच करता है कई प्रकार के परीक्षण करने के बाद वह युवती को बताता है कि उसके दोनों कान बिल्कुल ठीक हैं ।
           
सुशांत सुप्रिय
सुशांत सुप्रिय
  उत्तर ( ख ) : हाँ , यह वही युवक है जिसके साथ बाघ का रहस्य जुड़ा हुआ था । वह जानता है कि अँधेरा होते ही वह बाघ की तरह गरजने लगता है । दरअसल वह यानी सूरज , उस युवती यानी निशी से प्यार करता है । उसे खोना नहीं चाहता 
है । पिछली रात वह निशी के पी.जी. हॉस्टल में भी उससे इसी समस्या के बारे में बात करके उसे समझाने के लिए गया था । पर अँधेरे में निशी की चीख़ सुनकर वह घबरा कर भाग खड़ा हुआ । अगले दिन वह हिम्मत करके एक मनोचिकित्सक से मिलने जाता है । बहुत सारे सवाल करने और कुछ परीक्षण करने के बाद डॉक्टर उसे बताता है कि उसके भीतर एक बाघ रहता है ! यानी वह ' स्प्लिट  - पर्सनालिटी ' या ' मल्टिप्ल पर्सनालिटी डिसऑर्डर ' रोग से ग्रस्त है । रोशनी में इंसान और अँधेरे में बाघ ...
              युवक सूरज अब भी कहानी के पहले भाग वाली युवती निशी के साथ उसी संस्था में नौकरी करता है । वह अब मनोचिकित्सक की दी हुई गोलियाँ खा रहा है । दोनों ने इस समस्या के बारे में आपस में दोटूक बात की है । फिलहाल वे केवल दिन में ही साथ रहते हैं । रात होते ही वे एक-दूसरे के साथ होने से बचते हैं । हालाँकि एक-दूसरे के प्रति उनकी चाहत और बढ़ गई है । हाल ही में एक छुट्टी वाले दिन की रोशनी में दोनों ने एक-दूसरे के साथ कई अंतरंग घंटे बिताए ।
              इस कहानी के कई अंत हो सकते हैं :
              ( क ) दफ़्तर में सब को उस युवक सूरज की इस अजीब समस्या के बारे में
पता चल जाता है । अंत में अन्य सहकर्मियों के दबाव की वजह से प्रबंधक उसे 'फ़्रीक' मानकर दफ़्तर से निकाल देते हैं । वह कहीं और चला जाता है , और युवती निशी उसे भूलकर अपने जीवन में व्यस्त हो जाती है ।
              ( ख ) वे दोनों ब्याह कर लेते हैं । लेकिन अँधेरा होने से पहले दोनों अलग-अलग हो जाते हैं । और रात में अलग कमरों में सोते हैं ।
               ( ग ) मनोचिकित्सक की दी गई दवाइयों की वजह से सूरज की मानसिक स्थिति ख़राब हो जाती है । अंत में वह पूरा पागल हो कर पागलखाने पहुँच जाता है , और युवती उसे तलाक़ दे कर उससे अलग हो जाती है ।
               ( घ ) युवक सूरज बौद्ध धर्म अपना लेता है ताकि उसके भीतर का बाघ अहिंसक हो जाए , जिससे युवती निशी को कभी कोई ख़तरा न हो ।
                ( ड. ) मनोचिकित्सक की दी गई दवाइयों की वजह से युवक सूरज बिल्कुल ठीक हो जाता है । वह उस युवती निशी के साथ सुखमय जीवन व्यतीत करने लगता है ...
               प्रिय पाठको , आपको इन में से कहानी का जो अंत पसंद हो , चुन लें ।

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प्रेषक : सुशांत सुप्रिय

            A-5001 ,
            गौड़ ग्रीन सिटी ,
            वैभव खंड ,
            इंदिरापुरम ,
            ग़ाज़ियाबाद - 201014
            ( उ. प्र. )
मो : 8512070086
ई-मेल : sushant1968@gmail.com



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