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ज़िंदगी            

बिजली के तारों पर
ऊंचे अटकी, फड़फड़ाती
फटी पतंग होती है
ज़िंदगी
शीत,घाम ,मेह सहती
खत्म हो जाती है ।
2
ज़िंदगी
चक्रवर्ती गणित का
सबसे कठिन सवाल
होती है ज़िंदगी
हल करने में ही
निकल जाती है
पूरी ज़िंदगी ।
3
आकाश में
घर बनाने की कोशिश
ही तो है यह ज़िंदगी
मुर्दा सम्बन्धों की ईंटों को
ढोकर
वहाँ तक पहुँचाना
आसान भी तो नहीं ?
4
बिना दीवारों वाला घर
नफरत की आँधी में
भूल न जाए अपनी चौहद्दी
तो इसे
ज़िंदगी समझ लीजिए ।
5
हवा को सोखने की ताकत
बादल को पी जाने का जज्बा
बिजली को मुट्ठी में बंद करने की कूबत
पछाड़ सकती है
ज़िंदगी के दैत्य को ।
6
टूटी पड़ी है ज़िंदगी
खंडहर के किसी कोने में
कौन इसे उठाएगा ?
श्मशान पहुँचाएगा ?
7
ज़िंदगी की कहानी से
कविता निकल गई देखो ,
आलोचक खड़ा है पास
लुकाठी लेकर
तुम भी चढ़ाओ शूल पाठकगण
इसकी मज़ार पर !
8
मिटाना होता आसान ,
मिटा देता
रबर से
पेंसिल के निशान की तरह
ज़िंदगी !
9
शायद किसी मोड़ पर
मिल जाए
मेरी खोई हुई ज़िंदगी
चिपका हूँ इसीलिए
तुमसे ,
ऐ ! ज़िंदगी ।
10
कुत्ते की दुम होती है
ज़िंदगी
सीधी नहीं होती
हिलती –डुलती रहती है
फिर भी ।
11
एक नाव
अचानक
फँस गई हो दलदल में
कह सकते हैं इसे परिभाषा
ज़िंदगी की !
12
जुआ है ज़िंदगी
खेलना नहीं आया जिसे
हार जाएगा
युधिष्ठिर की तरह !



रचनाकार परिचय संजीव ठाकुर
जन्म  : 29 जनवरी,1967 मुंगेर (बिहार)
शिक्षा  : एम.ए,एम.फिल.,पी–एच.डी (दिल्ली विश्वविद्यालय)
प्रकाशन : नौटंकी जा रही है, फ्रीलांस ज़िंदगी ,अब आप अली अनवर से… ,प्रेम सम्बन्धों की कहानियाँ (कहानी –संग्रह) झौआ बैहार (लघु उपन्यास) इस साज पर गाया नहीं जाता (कविता –संग्रह) संगीत के पाँच सितारे (जीवनी) मैं भी गीत लिखूंगा, नभ में आया इन्द्रधनुष ,बड़ों का बचपन ,कबूतरी आंटी ,यहाँ ऐसा वहाँ वैसा, चुन्नू-मुन्नू का स्कूल आदि (बाल- साहित्य)
संप्रति :  स्वतंत्र लेखन एवं पत्रकारिता
संपर्क : एस एफ 22,सिद्ध विनायक अपार्टमेंट, अभय खंड – 3 ,इंदिरापुरम ,गाजियाबाद ,उ. प्र .
फोन नं. : 0120-4116718
ई मेल  : skthakur67@gmail.com

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  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व रक्तदान दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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