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शिगमोत्सव : गोवा की होली 

शिगमोत्सव
शिगमोत्सव
सम्पूर्ण भारत में रंगो का फाल्गुनी त्योहार होली बसंत ऋतु के आगमन पर वसन्तोत्सव के रूप में मनाया जाता है। देश के अधिकांश प्रांतों में होली का समय खेतों में धान पकने का होता है। फसल की अच्छी उपज की कामना लिए भारतीय किसान बरसों से होली के रंग में सराबोर हो खुशियां मनाते आ रहे हैं। समय और परिस्थितियों के अनुसार त्योहारों को मनाने की रीतियों में भले ही परिवर्तन और परिष्करण होते जाते हैं, लेकिन उनकी मूल अवधारणा, संस्कृति और परम्पराएं कभी भी अपना स्वरुप नहीं खोते हैं। भारत में सभी त्योहारों के जीवंत रुप इस बात के सबसे बड़े प्रमाण हैं, क्योंकि वैज्ञानिकों से लेकर नेताओं और आम लोगों तक त्योहारों की महत्ता और सम्मान आधुनिकता के इस दौड़भाग भरे जीवन में भी उतनी ही अहमियत रखते हैं। 
ठीक ऐसा ही कुछ भारत के पाश्चात्य संस्कृति से सर्वाधिक प्रभावित समझे जाने वाले प्रदेश गोवा में भी देखने को मिलता है। गोवा में वसंत आगमन पर जो शिगमोत्सव मनाया जाता है, वास्तव में उसे होली का पर्याय या गोमान्तक होली की संज्ञा दी जा सकती है। शिगमोत्सव गोवा का बड़ा ही लोकप्रिय उत्सव है, जो बिल्कुल होली के ही समान होता है। गोवा की कोंकणी भाषा में शिगमो का मतलब होली होता है और शिगमोत्सव यानि होली का उत्सव। शिगमोत्सव दो प्रकार के होते हैं। पहला धाकवो-शिगमो और दूसरा वडलो-शिगमो। धाकवो शिगमो प्रायः गांवों में किसानों, ग्रामीणों और मजदूरों द्वारा मनाया जाता है, जो थोड़े छोटे स्तर पर मनता है, इसलिए इसे धाकवो अर्थात् छोटा शिगमो कहते हैं। जबकि वडलो-शिगमो यानि बड़े स्तर पर मनाया जाने वाला शिगमोत्सव प्रायः शहरों में व्यापक पैमाने पर मनाया जाता है। हालांकि नाच, गाने, मौजमस्ती, रंग गुलाल से खेलना दोनों ही तरह के शिगमोत्सव के अंग हैं। इस तरह शिगमोत्सव गोवा में होली की पहचान है। 
गोवा में भी होली तो हिन्दू केलेण्डर के फाल्गुन मास की पूर्णिमा को ही मनाते हैं। लेकिन शिगमोत्सव की शुरुआत होली के दूसरे दिन से होती है। जैसे इस साल गोवा में शिगमोत्सव 14 से 27 मार्च 2017 के दौरान मनाया जाएगा। यह उत्सव करीब 14 दिनों तक मनाया जाता है। शिगमोत्सव के दौरान गांवों में सभी लोग रंगबिरंगी परम्परागत पोशाकें पहनकर अपने गांव के मंदिर की जात्रा यानि शोभायात्रा निकालते हैं। यहां जात्रा से तात्पर्य मन्दिरों और दैविक स्थलों पर धार्मिक आयोजनों से होता है। ऐसे तो गोवा में जात्रा का आयोजन दीपावली से होली तक होता है, परन्तु शिगमोत्सव के समय की जात्रा का भी अपना विशेष महत्व माना जाता है। जात्रा में मंदिर के देवी या देवता का छत्र लेकर सभी लोग जुलूस के साथ गाते और नाचते निकलते हैं। अलग अलग गांवों में पूरे शिगमोत्सव के दौरान जात्राएं भी अलग अलग दिन निकाली जाती हैं। जात्रा निकलने से पहले गुलाल उड़ाया जाता है और पटाखे फोड़े जाते हैं। लोग मंदिर से देवी या देवता की मूर्ति को पालकी या रथ में सजा कर शोभायात्रा निकालते हैं और देव आराधना में एक सप्ताह से एक पखवाड़े तक उपवास रखते हैं, पूरी रात्रि जागरण होता है और पूजा-अर्चना होती है। जात्रा पूरे गांव से गुजरने के बाद वापस मंदिर आती है, फिर मंदिर के प्रांगण में लोग पारम्परिक कोंकणी नृत्य जैसे रोम्मातामेल और फुगड़ी करते हैं। पूरे गोवा में कई दिनों तक शाम को शिगमोत्सव के जुलूस निकाले जाते हैं और लोग इस त्योहार में गीत-भजनों की स्वरलहरियों, नृत्यों की धूम और आध्यात्मिक जात्राओं के साथ प्रेम, भाईचारा, आनन्द और उल्लास व उमंग में डूबे रहते हैं।  
अप्रतिम नैसर्गिक शोभा के स्वामी गोवा में ऐसा प्रतीत होता है, मानो वसंत के आगमन के साथ रबी की फसल के पकते ही सुनहरी व हरी चादरें ओढ़े खेत और आमों पर फैली आम्रपाली तथा काजू की जटाजूट वृक्षावली से सज्जित रंगबिरंगी प्रकृति यूं भी होली खेल रही हो। इस पर गोवा में प्रतीकरुप में पारम्परिक तौर पर आक्रामकों को खदेड़ने के  दशहरा के समय से गए महान योद्धाओं के विजयी होकर अपने घर वापस आने की खुशी में रंग गुलाल उड़ाता शिगमोत्सव प्रेम, श्रृंगार, आनन्द और प्रफुल्लता का सजीव साक्षात्कार कराता सा प्रतीत होता है। सारे गोवा में होली बड़ी ही शिष्टता के साथ मनाई जाती है। एक समय निर्धारित होता है, प्रायः 9 बजे से दोपहर 1 बजे तक सभी रंग खेलते हैं। उसके बाद कोई रंग नहीं लगाता। स्नान आदि से निवृत्त होकर अपने रिश्तेदारों और मित्रों के साथ मिलकर विभिन्न पकवानों का आनंद लिया जाता है। होली के दूसरे दिन से फिर शिगमोत्सव शुरु हो जाता है।
डॉ. शुभ्रता मिश्रा
डॉ. शुभ्रता मिश्रा
पूरे शिगमोत्सव के दौरान गोवा में एक बड़ा ही उत्सवी माहौल होता है और कई रंगा-रंग कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। हर गांव, कस्बे और शहरों के मोहल्लों में जगह जगह होली और शिगमोत्सव को शुरु करने के लिए फाल्गुनी पूर्णिमा की शाम को विशेषरुप से ताड़ और अन्य दूसरे पेड़ों की लकड़ियों और झाड़-झंखाड़ से होली बनाई जाती हैं। इसके नीचे दो-तीन पत्थर रखे जाते हैं। सभी लोग संजसंवरकर होली के आसपास एकत्रित हो जाते हैं और फिर भट्टजी यानि पंडित पहले होली की पूजा करते हैं और नीचे रखे उन पत्थरों पर नारियल फोड़ा जाता है, इसके बाद होली में आग लगाई जाती है। सभी जलती हुई होली की ज्वालाओं से स्वयं को सेंकते हैं और फिर नारियल फेंकते हैं। इसके बाद जलाई गई लकड़ियों के ढेर जल कर जब अंगारे हो जाते हैं तब श्रद्धालु लोग जलते अंगारों पर पैदल चलते हैं।  इस तरह देखा जाए तो पूरे गोवा में होली का त्योहार शेष भारत के होली उत्सव से थोड़ा भिन्न होता है। 
पूजन और अंगारों पर चलने की रस्म के बाद सभी ढ़ोल, ताशा और घुमट बजाते हुए समवेत स्वर में वृन्दगान करते है। विभिन्न नृत्य मण्डलियां गोवा के पारम्परिक नृत्य जैसे तालगड़ी, हानपेट, दीपकनृत्य औेर गोफ करती हैं। तालगड़ी नृत्य कृष्ण भक्ति पर आधारित एक प्रकार का नृत्य है, जिसमें ताशा तथा झांझ की गमक पर लकड़ी के डण्डों को लेकर पुरुष डाण्डिया की तरह नाचते हैं। शिगमोत्सव के दौरान महिलाएं फुगड़ी नृत्य करती हैं। फुगड़ी करते समय महिलाएं ताली बजाते हुए गोल-गोल घेरे में और अलग-अलग पंक्तियों और चक्रों में पौराणिक लोकगीतों को गाते हुए नाचती हैं। महिलाएं शिगमोत्वस में दीपक नृत्य भी करती हैं। इसमें वे अपने सिर पर पीतल के दीवड़-दीपक स्टेण्ड को रखती हैं, फिर उसमें दीप जला कर संतुलन बनाये हुए घूमट, समेल और हारमोनिम वाद्य की धुनों पर नृत्य करती जाती हैं। 
इसके अलावा कहीं कहीं पर तोणियामेल नाच भी किया जाता है, जिसमें लोग सिर पर लाल पट्टा बांधते हैं और मोरपंख लगाते हैं और गले व हाथों में पुष्पमालाएं पहनते हैं तथा पखावज, कासाले और मंजीरों की थाप पर नृत्य करते हुए खूब जोरजोर से गायन और वादन करते हैं। कुछ जगहों पर मूसल खेल नृत्य के रुप में किया जाता है। इस नृत्य में 7-8 फीट के बांस के निचले सिरे पर घुंघरू बंधे होते हैं जिसे हाथ में ले कर प्रायः गांवड़ा जाति के लोग गले में घूमट और ढ़ोलक लेकर नृत्यों की श्रृंखला बनाते हैं और मूसल गिराते जाते हैं। जहां-जहां मूसल गिरता है, साथ में वहां वहां एक महिला झाड़ू लगाती जाती है। शिगमोत्सव में गोफ नृत्य भी कई जगह किया जाता है। गोफ नृत्य में एक ऊंचे स्थान पर कई रंग-बिरंगी रस्सियां लटकाई जाती हैं। इसमें रस्सी का एक-एक सिरा एक एक लड़का पकड़ता है, तथा रस्सियों के सहारे लड़के ऐसे नृत्य करते हैं कि रस्सियां फूलों की बेल की तरह आपस में गुंथ जाती है। इस तरह पारंपरिक वाद्य घुमट, झांझ, सेमल व शहनाई की धुन पर रस्सियों के सहारे गुंथते और फिर विपरीत दिशा में नृत्य करते हुए सुलझते जाते हैं। यह नृत्य भी कृष्ण भक्ति पर आधारित है, जिसमें नर्तक कृष्ण भगवान की वेशभूषा में होते हैं। शिगमोत्सव के दौरान रंगपंचमी के दिन मछुहारे, खेतिहर और ग्रामीण लोग अपने अपने हाथों में लंबे-लंबे ध्वज वाली दांडी लेकर ढ़ोल, ताशा, शहनाई और सूर्त वाद्य वादन करते शोभायात्रा निकालते हैं। होली के नौवें दिन मन्दिरों और केन्द्रीय स्थलों पर कांजा नृत्य किया जाता है। इसमें कलाकार मंच पर पंक्ति में प्रवेश करते हैं तथा नृत्य के दौरान अपनी जोड़ी बना कर ढोल और ताशे के साथ गोल-गोल घूमते हुए कई तरह की अभिव्यंजना करते हैं। 
शिगमोत्सव की परेड या फ्लोट पूरे उत्सव का सबसे आकर्षक कार्यक्रम होता है। गोवा में पणजी, वास्को, मडगांव और फोण्डा जैसे शहरों सहित अलग अलग जगहों में अलग अलग दिन यह धार्मिक फ्लोट या परेड निकाली जाती है। इन जगहों पर किस किस दिन परेड निकाली जाएगी, उसकी तिथि का निर्धारण पहले से एक शिगमोत्सव समिति तय कर देती है। इससे लोग उस दिन वहां जाकर शिगमोत्सव की परेड का आनंद लेते हैं। इन परेडों में अलग अलग मण्डलियों द्वारा अपने कार्यक्रम और झांकियां प्रस्तुत की जाती हैं, जिनमें से निर्णायक मण्डली द्वारा उनका चयन होता है और प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कार भी दिए जाते हैं। सभी जगह परेड के शुरू करने के पहले पूजा की जाती है और फ़िर पटाखे चलाये जाते है। एक विशेष प्रकार की बिगुल ध्वनि से परेड की शुरुआत की जाती है। परेड में बांयी तरफ पुरुष और दाहिनी ओर महिलायें गोवा के पारम्परिक नृत्य करती चलती हैं। 
इन शिगमोत्सव परेडों में गोवा की पारंपरिक और धार्मिक झलक देखने को मिलती है। पूरी परेड में विष्णु भगवान के नृसिंह, राम और कृष्ण अवतार के रुप दिखाये जाते है। साथ ही साथ अन्य भगवान जैसे हनुमान, दुर्गा, काली के रुप भी फ्लोट में देखने को मिलते है। यह शिगमोत्सव परेड शाम को लगभग 6 बजे शुरु होती है और रात के लगभग 11 बजे जाकर समाप्त होती है। परेड में लोक संगीत और लोक नृत्यों के माध्यम से महाभारत और रामायण के अलग-अलग प्रसंगों का भी प्रदर्शन किया जाता है। शिगमोत्सव का एक और आकर्षण घोड़ेमोडनी नृत्य होता है, जो एक तरह का शौर्य नृत्य कहा जा सकता है। इसमें कलाकार योद्धा बनकर मराठी वेशभूषा में अपने हाथ में खड्ग लिए राजस्थान के कच्छी घोड़ी की तरह घोड़ों पर सवार ढोल, ताशा और तूताड़ी वाद्य के साथ नृत्यरत्त होड्डर-होड्डर की आवाजें करते दिखलाई पड़ते हैं। परेड की समाप्ति के साथ शिगमोत्सव समाप्त हो जाता है।
शिगमोत्सव के दौरान गोवा में कहीं कहीं होली का एक रुप ‘धूलवाड़’ के नाम से भी  दिखाई देता है। इसमें लोग आपस में एक दूसरे के चेहरे और सिर पर गुलाल और नील लगाते हैं। हांलाकि धूलवाड़ में महिलाएं भाग नहीं लेती हैं। पूरे शिगमोत्सव के दौरान हिन्दू लोग मांसाहार त्याग देते हैं। सभी दिन विभिन्न तरहों के व्यंजन पकवान बनते हैं। गोवा में शिगमोत्सव के रुप में भले ही होली अलग तरह से मनाई जाती है, परन्तु इसमें भी उसी भारतीय सांस्कृतिक गरिमा के दर्शन होते हैं, जो समग्र राष्ट्र की होली में दिखाई देते हैं।


डॉ. शुभ्रता मिश्रा वर्तमान में गोवा में हिन्दी के क्षेत्र में सक्रिय लेखन कार्य कर रही हैं । उनकी पुस्तक "भारतीय अंटार्कटिक संभारतंत्र" को राजभाषा विभाग के "राजीव गाँधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार-2012" से सम्मानित किया गया है । उनकी पुस्तक "धारा 370 मुक्त कश्मीर यथार्थ से स्वप्न की ओर" देश के प्रतिष्ठित वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है । इसके अलावा जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा प्रकाशक एवं संपादक राघवेन्द्र ठाकुर के संपादन में प्रकाशनाधीन महिला रचनाकारों की महत्वपूर्ण पुस्तक "भारत की प्रतिभाशाली कवयित्रियाँ" और काव्य संग्रह "प्रेम काव्य सागर" में भी डॉ. शुभ्रता की कविताओं को शामिल किया गया है । मध्यप्रदेश हिन्दी प्रचार प्रसार परिषद् और जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा संयुक्तरुप से डॉ. शुभ्रता मिश्रा के साहित्यिक योगदान के लिए उनको नारी गौरव सम्मान प्रदान किया गया है।
          संपर्क सूत्र -  डॉ. शुभ्रता मिश्रा ,स्वतंत्र लेखिका, वास्को-द-गामा, गोवा, मोबाइलः :08975245042,
          ईमेलः shubhrataravi@gmail.com

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