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मदार पर 

पत्तियाँ मदार कीं
 मदार ओढने लगीं 
धूप
खिलखिलाकर हँसने लगीं 
खूब 
जैसे पहन लिए 
कपडे 
नए नवेले I 

शाम 
मदार पर 
रोज 
छोड़ जाती 
बूँदें 
मानो पहना जाती 
हार मोतियों का 
किन्तु रवि 
रोज उतार लेता 
चुन चुन कर 
शायद अपने लिए,
उफ़ ! हाय कहती 
ठहर जातीं
कलियाँ उसी मदार कीं I 

रचनाकार परिचय नाम-  अशोक बाबू माहौर
जन्म -10 /01 /1985
साहित्य लेखन -हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में संलग्न
प्रकाशित साहित्य-विभिन्न पत्रिकाओं जैसे -स्वर्गविभा ,अनहदकृति ,सहित्यकुंज ,हिंदीकुंज ,साहित्य शिल्पी ,पुरवाई ,रचनाकार ,पूर्वाभास,वेबदुनिया आदि पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित I
साहित्य सम्मान -इ पत्रिका अनहदकृति की ओर से विशेष मान्यता सम्मान २०१४-१५ से अलंकृति I
अभिरुचि -साहित्य लेखन ,किताबें पढ़ना
संपर्क-ग्राम-कदमन का पुरा, तहसील-अम्बाह ,जिला-मुरैना (म.प्र.)476111
ईमेल-ashokbabu.mahour@gmail.com9584414669 ,8802706980 

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