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ज़िन्दगी और तुम

मै हर बार सोचती हूँ 
बस 
अब यहीं तक 
और हर बार नयी बात हो जाती है 
सोचती हूँ अभी बहुत उजाला है 
तो रात हो जाती हैं 
साधना सिंह
साधना सिंह
जब हार कर अँधेरा स्वीकार कर लेता हूँ 
तो सितारों से रौशनी की 
बरसात हो जाती हैं 
यानी 
कुछ भी निश्चित नहीं है 
कुछ भी अनिश्चत नही है 
देखो ना, 
ये जिन्दगी और तुम 
बिल्कुल एक जैसे हो 
तुम भी तो निश्चित नही हो 
पल मे फुहार 
तो पल मे बौछार 
तो पल मे अदृश्य 
और मै 
मौसम की तरह 
अनुमान लगाती रहती हूँ 
लगाती ही रहती हूँ 
जब भी सोचती हूं तुम चले गये 
......तभी तुम दस्तक देते हो 
और मै सारी शिकायतें भुल 
अपने हथियार डाल देती हूँ 
एक नये अनुमान के लिये..

साधना सिंह
 गोरखपुर 

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