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जिस रोज से आये हो

दिन कैसे गुजरता था, तन्हा, गुमसुम रह के
हर पल दिल गाने लगा, जिस रोज से आये हो।

बेमकसद कितने थे, आवारा बादल से
ठहराव सा आया है, जिस रोज से आये हो।

जिस रोज से आये होख्वाबों के बगीचे में, अल्हड़ सी विरानी थी
सतरंगी सपने सजे, जिस रोज से आये हो।

वही तपती दोपहरी थी, वही बेरंग आठों पहर
रिमझिम सावन बरसा, जिस रोज से आये हो।

हर मौसम जलते थे, फागुन हो या सावन हो
हैं जेठ में भीगे हुए, जिस रोज से आये हो।

तारे अनगिन थे यहां, कोई चांद ना दिखता था
हर रात पूनम सी हुई, जिस रोज से आये हो।

थे भीड़ में भी तन्हा, सब लगते बेगाने थे
तुम अपने से लगने लगे, जिस रोज से आये हो।

ना पढ़ना आता था, ना लिखना आता था
नवगीत लगे रचने, जिस रोज से आये हो।

 यह रचना तरु श्रीवास्तव जी द्वारा लिखी गयी है . आप कविता, कहानी, व्यंग्य आदि साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन कार्य करती हैं . आप पत्रकारिता के क्षेत्र में वर्ष 2000 से कार्यरत हैं। हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, अमर उजाला, हरिभूमि, कादिम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में बतौर स्वतंत्र पत्रकार विभिन्न विषयों पर कई आलेख प्रकाशित। हरिभूमि में एक कविता प्रकाशित। दैनिक भास्कर की पत्रिका भास्कर लक्ष्य में 5 वर्षों से अधिक समय तक बतौर एडिटोरियल एसोसिएट कार्य किया। तत्पश्चात हरिभूमि में दो से अधिक वर्षों तक उपसंपादक के पद पर कार्य किया। वर्तमान में एक प्रोडक्शन हाऊस में कार्यरत हैं.आकाशवाणी के विज्ञान प्रभाग के लिए कई बार विज्ञान समाचार का वाचन यानी साइंस न्यूज रीडिंग किया।

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