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किस्से हमारे जीवन के अटूट हिस्से

संसार, वैसे तो कहा जाता है अणुओं से बनी एक संरचना है। पर, मैं मानती हूँ यह अणुओं से नहीं बल्कि किस्सों से बनता है। हर घर, हर व्यक्ति तथा हर जीवन से जुड़ा हुआ कोई न कोई किस्सा जरूर होता है। तो लीजिये प्रस्तुत है मेरे जीवन से जुड़ा एक किस्सा।
मेरे पिता जी रेलवे से रिटायर्ड ऑफिसर हैं। बचपन से रेलगाड़ी ने ही हमें हमेशा हमारी मंजिल तक पहुंचाया है। ऑफिसर होने कारण हमें रेलगाड़ी किसी स्वर्ण रथ से कभी कम नहीं लगी। हर प्रकार की सुख सुविधाओं से परिपूर्ण। घर से लेकर मंजिल तक हमें बड़े ही सम्मान सहित पहुंचाया जाता रहा है। मेरे बच्चों को भी अपने नाना जी से हमेशा रेल के किस्से, उनके अनुभव सुनने में बड़ा मज़ा आता है। मेरी माता जी की एक इच्छा के अनुसार, हम पिछले वर्ष अक्टूबर माह में इलाहाबाद संगम स्नान लिए रवाना हो गए। सारा इंतज़ाम मेरे पिता जी ने ही करवाया। चंडीगढ़ का रेलवे स्टेशन तो मुझे अपने घर जैसा ही लगता है। स्टेशन पहुंचते ही जैसे फिर से बचपन याद आ गया। मैं अपने बचपन की यादों में गुम थी कि पिता जी बोले, " गाडी आ गयी"।स्टेशन के कुछ अधिकारियों ने बड़े प्यार और सम्मान से हमें गाडी में बिठाया। बच्चे बहुत खुश थे। सफर बहुत आनंदमयी रहा। इलाहाबाद स्टेशन पर हमारे स्वागत के लिए स्वयं स्टेशन के प्रमुख अधिकारी आये। हमारा रहने, खाने पीने तथा हमें घुमाने का सब इंतज़ाम पहले ही किया गया था। मेरा बेटा, जोकि सातवीं कक्षा में पढ़ता है, कह रहा था, "मम्मा मैं भी नानू जैसे रेलवे में ही ऑफिसर बनूंगा।" इलाहाबाद पुराना शहर है, कई जगह हमें घुमाया गया। बहुत अच्छा लगा। अब वापसी का दिन आ गया। हमें पहले ही की तरह विदा करने स्टेशन के प्रमुख अधिकारी आये। गाडी आ चुकी थी। हमारा सामान डिब्बे में पहुंचा दिया गया। बच्चों ने खिड़की वाली सीट पकड़ ली। बहुत खुश थे बच्चे! हम सब इलाहाबाद के बारे में चर्चा कर ही रहे थे कि तभी एक सज्जन आये और बोले, "ये सीट तो हमारी है"। मेरे पिता जी बोले, " भाई हमारा रिज़र्वेशन है"। पिता जी ने झट से टिकट्स निकाल कर दिखा दिए। उस व्यक्ति ने टिकट देखा और बोला, "आप सही कह रहे हैं कि ये सीट्स आपकी हैं पर आप इन पर बैठकर दो महीने बाद सफ़र कीजियेगा"। बात कुछ समझ में नहीं आई। 
पिता जी ने टिकट्स देखे तो "उफ्फ्फ्फ़!!!!!" ये क्या टिकट्स तो दिसम्बर महीने के थे और अभी तो अक्टूबर चल रहा था। इतनी बड़ी गलती कैसे हो गयी। गाडी चलने में सिर्फ दस मिनट बचे थे। फटाफट सामान नीचे उतारा। बच्चे कुछ समझ नहीं पाए। मेरे पिता जी भाग कर स्टेशन सुपरिटेंडेंट के पास गए। और नयीं टिकट्स बनवा लाये। पर किस डिब्बे की टिकट्स थीं ये? हमेशा से ही आरक्षित ए. सी. डिब्बे में सफ़र किया था। पिता जी ने बोला सामान चढ़ाओ जल्दी। मेरा सिर चकरा गया। जैसे आसमान से धड़ाम ज़मीन पर आ गिरी। भीड़ से खचाखच भरा, पसीने की बदबू से जैसे हवा ही बदल गयी थी। यहाँ वहाँ पान के छींटे। पैर तक रखने की जगह
बबिता 'कोकिल'
बबिता 'कोकिल'
नहीं थी। पिता जी मुझे और मैं उन्हें देख रही थी। "क्यों नहीं चेक किये टिकट्स" मन में बारबार कोस रही थी। ऐसा सफ़र कभी सपने में भी नहीं सोचा था। जैसे तैसे घुसे थे हम डिब्बे में। ये असली जिंदगी की तस्वीर लगीं मुझे। तीन लोगों के बैठने की जगह पर आठ लोग बैठे थे। पिता जी ने कहा, "जहाँ जगह मिले बैठ जाओ फौरन वरना खड़े होकर जाना होगा"। बच्चे परेशान हो गए। आराम की जिंदगी की आदत है ना हमें। बैठ तो गए पर आँखों में चुभ रहा था वो नज़ारा। मेरा बेटा, पति, सामान सब ऊपर वाली सीट पर थे। और अब उनके वहां से हिलने और नीचे उतरने की कोई गुंजाइश नहीं थी। मैं, मेरी बेटी, माँ और पिता जी नीचे वाली सीट पर थे। सिर्फ हम चार ही नहीं हमारे इलावा और चार लोग भी थे उस सीट पर। सामने वाली सीट पर एक मजदूर परिवार बैठा था। मेरी माता जी के घुटनों में तकलीफ़ है, उन्होंने अपनी टाँगें उनकी सीट पर जमा दी।शरीर अकड़ने लगा था।हिलजुल नहीं पा रहे थे। रात का सफर था। दोपहर का खाना खाकर निकले थे।जो खाना हम साथ लाये थे वो भी खराब हो गया। भूख के मारे बच्चे परेशान हो गए। हिल नहीं सकते थे अपनी जगह से। इतनी जगह भी नहीं थी कि उठकर शौचालय भी जा सकें। अचानक बेटी की तबियत बिगड़ गयी। उसे उल्टियां और दस्त शुरू हो गए। इतनी भीड़ में अपनी सीट छोड़ना मतलब अपनी ज़मीन छोड़ने के बराबर था। डायपर में ही दस्त और वहीं उल्टियां किये जा रही थी। जमीन पर भी लोग लेटे हुए थे। जिसे हम वेल एडुकेटेड उच्चकालीन वर्ग कहते हैं, वे लोग ऐसे में नाक भौं सिकोड़ते हैं। किन्तु ये लोग, उन्होंने जितनी मदद की, उनकी उस भावना ने मेरे अंतर्मन को झकझोड़ दिया।
 हम अपने आप को जात पात, धर्म, अमीर गरीब कहकर श्रेणियों में विभाजित करते हैं, पर इंसान नाम को भूल जाते हैं। उस मजदूर व्यक्ति ने मुझे उस "इंसान" से मिलाया। मेरी बच्ची की उल्टी साफ़ की। कोई रिश्ता नहीं था हमारा, पर एक रिश्ता था, " इंसान का"। वह भलीभांति समझ रहा था हमारी दशा। वह जानता था कि इस माहौल की आदत नहीं है हमें। हमारे में कोई समानता नहीं थी। पर अक्सर हम अपनी तुलना वस्तुओं से सुसज्जित इंसान से करते हैं, सिर्फ 'इंसान' से नहीं। मुझमें और उस मजदूर में वही समानता थी। हम दोनों ही इंसान थे। यही रिश्ता था मेरा उस मजदूर से, " इंसान का"। बताइए है कोई रिश्ता इस से ऊपर। भूख क्या होती है, प्यास क्या होती है, असुविधा क्या होती है, तंगी क्या होती है, बच्चा बीमार हो और दवा ना मिले तो उस माँ पर क्या बीतती है, इन सब का अहसास मुझे उस सफ़र ने करवा दिया।
 वो सफ़र बडा था पर उससे भी बड़ा तजुर्बा देकर गया। सिर्फ खून का रिश्ता ही रिश्ता नही है। कुछ रिश्ते हमें जिंदगी भी दे जाती है।और एक बात, जिंदगी हमेशा सुहाना सफ़र ही नहीं है। हम सुख सुविधाओं से घिरे हुए सुरक्षित महसूस करते हैं और उसे ही असल समझते हैं। लेकिन असली जिंदगी तो अनुभवों और किस्सों से ही बनती है। इसलिए स्वयं को तथा अपने बच्चों को हर परिस्थिति के लिए तैयार करना चाहिए। और सभी का सम्मान करना चाहिए।जब भी बच्चे कहते हैं, "ये सब्जी हम नहीं खाएंगे"। तो मैं यही कहती हूँ, सोचो हम इलाहाबाद से वापिस आ रहे हैं और बहुत भूख लगी है, सो जो मिला इससे बेहतर तो कुछ और मिल ही नहीं सकता। बात छोटी सी है पर मेरे बच्चों और हम सब को वह अनुभव बहुत कुछ सीखा गया।

यह रचना बबिता "कोकिल " जी द्वारा लिखी गयी है . आपकी अधिकतर रचनाएं पंजाबी भाषा में हैं। पंजाब से प्रकाशित होने वाली पुस्तिका 'वक्त दे बोल' में आपकी  लिखी कविताएं एवम् ग़ज़लें प्रकाशित होती रहती हैं।आपके  कहे गए शेर, 'हिंदवी' नामक उर्दू वेबसाइट पर प्रकाशित होते रहते हैं।इसके इलावा चंडीगढ़ में 'रीडर्स एंड राइटर्स सोसाइटी ऑफ़ इंडिया' एवं 'अभिव्यक्ति' नामक साहित्यिक संस्थाओं से आप  जुडी हुई हैं  तथा इनके द्वारा आयोजित गोष्ठियों में निरन्तर हिस्सा लेती हैं। 'शिरोमणि पंजाबी लिखारी सभा पंजाब (रजिस्टर्ड)' द्वारा प्रकाशित काव्य संग्रह में आपकी ग़ज़लें भी प्रकाशित हो रही हैं।

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