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मदारी और मैं   

भीड़ इकट्ठी कर
सड़क पर
मदारी
अशोक बाबू
डमरू बजा रहा
बाँसुरी भी हौले हौले I
मैं भी
भीड़ में
पाँव दबाए
घुस गया,
देख मुझे
मदारी
अचंभित हुआ
मुस्कुराते बोला-
'ओहो ! आप आ गए
आइए जनाब
अभी मैं
मंत्र फूँकता हूँ
आपको गधा बनाता हूँ
यूँ हीं नहीं
बाद में
इंसान भी I '
मैंने धैर्य खोया
चेहरा लाल पीला कर
चिल्लाया-
'मदारी
पहले अपना चेहरा
आइने में देख ले
ऐसा लग रहा
मानो बालू पर
गुड परोस दिया हो
और उस पर
मक्खियाँ भिनभिनाती
आपस में लड़ रही हों I '


यह रचना अशोक बाबू माहौर जी द्वारा लिखी गयी है . आपकी विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी है . आप लेखन की विभिन्न विधाओं में संलग्न हैं . संपर्क सूत्र -ग्राम - कदमन का पुरा, तहसील-अम्बाह ,जिला-मुरैना (म.प्र.)476111 ,  ईमेल-ashokbabu.mahour@gmail.com

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