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तुम्हारी ऋचा
ज़िन्दगी में कभी कभी ऐसे लोग मिलते हैं जो बाकियों से हटके होते हैं पर  जिनका ज़िक्र आते ही होंठों पर हलकी सी मुस्कान तैर आती है। जिनसे एक ऐसा रिश्ता कायम हो जाता है जो कहने को तो गहरी दोस्ती या लगाव के मापदंडों पर खरा उतरने जैसा नहीं होता, पर जो  वक़्त की हर मार को झेलता हुआ जब भी याद आता है एक सुकून सा दे जाता है। और आज सुबह सुबह जब एक इंटरनेशनल नंबर से कॉल आया तो ऐसे एक रिश्ते के  अतीत में बिखरे मोतियों को कलम से पिरोये बिना रहा न गया।
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वो एक अलग सी लड़की थी।  अलग सी माने बाकी सब पुराने ढर्रों पर चल रही लड़कियों को ठेंगा दिखाती खुद अपने पैमाने तय करने वाली।  उसे जितना जानो उतना उसका रहस्य गहराता जाता  था।  ऐसी लड़की न पहले कभी देखी थी न सुनी थी। पर जो थी, जैसी थी, अपनी शर्तों पर थी।  उसके आस पास रहो और उसे नोटिस न करो ऐसा हो नहीं सकता था। ऐसा कोई काम नहीं था जो उसने किया नहीं था, कोई जगह नहीं जो उससे अछूती थी।  किस्से कहानियों का , चटपटी ख़बरों का पिटारा थी। अनेक पहलू थे उसकी ज़िन्दगी के, एक दूसरे से गुंथे हुए। 
और इतना सब होने के बावजूद जो पहली खबर मुझे उसके बारे में मिली वो इन सबसे अलग और थोड़ी  नकारात्मक थी, हालांकि कुछ हद तक सच भी थी !
"एक नंबर की फेंकू है वो। "
"अपने आप को पता नहीं क्या समझती है। "
"कितना स्टाइल मारती है यार !"
ये सब ऐसी बातें थीं जो उन दिनों हवा में रहती थीं।  किसके मुंह से निकलती थीं, किसके कानों के लिए होती थीं,  किन तथ्यों पर आधारित होती  थीं ये किसी को नहीं पता होता था, पर हाँ उसकी खबर कहीं न कहीं से सुनने को
मिल जाती थी। और मेरी  रूममेट्स जो उसी की ब्रांच में पढ़ती थीं वो इन बातों से अछूती नहीं थीं।
अपनी रूममेट्स का ज़िक्र करूँ और वह सिर्फ ज़िक्र तक सीमित रहे ऐसा हो नहीं सकता।  मेरी दो रूममेट्स थीं और दोनों मेरी जान थीं।  हमारा कॉलेज और हॉस्टल दोनों शहर से थोड़ा दूर थे इसलिए सब लडकियाँ  शहर में ही पीजी में रहती थीं। फर्स्ट ईयर में आते ही सबने आनन फानन अच्छे लोकेशंस में कमरे बुक कर लिए थे।  जब तक हम लोग पहुँचते सब 'प्राइम लोकेशंस' हथिया ली गयी थीं। तो हालात हम तीनों को करीब लायी और हालात ने हमको एक दूरदराज की सोसाइटी में कोठरीनुमा रूम बुक करने को मजबूर किया जिसमें तीन खटियाएँ मुश्किल से घुस पाई थीं। मैं तो नहीं पर बाकी दोनों लडकियां समृद्ध परिवार से थीं और  मुझे उनके इस तरह एडजस्ट करके रहने पर थोड़ा शक था।  पर जैसे ही तीन खटियाएँ घुसीं और हमने एक साथ लम्बी साँस छोड़ी उसी पल  हम तीनों को समझ आ गया कि अब आगे के चार साल साथ में ही गुजरने हैं, चाहे जितनी भी मुश्किलें आएं। और फिर शुरू हुई हमारी छोटी सी गृहस्थी।  रोज शाम कॉलेज से आकर हम स्टोव पर चाय चढ़ाते और फिर शुरू होता गप्पों का सिलसिला। वो अपनी मैकेनिकल की सुनाते मैं अपनी इलेक्ट्रिकल की। फिर डब्बा आता और उसको निपटाके हम वाक पर निकलते। मोबाइल का ज़माना नहीं था तो एसटीडी से अपने अपने घर कॉल करते। फिर लौटकर असाइनमेंट्स वगैरह निपटाते और थक हारकर बिस्तर में घुस जाते जहां नींद आने तक गप्पों का सिलसिला चलता।  दिन गुजरते जाते थे और हमारी दोस्ती प्रगाढ़ होती जाती थी , इतनी कि अब हमारे चर्चे 'प्राइम लोकेशन ' में रह रहे दोस्तों तक होने लगे ।  बात जब उसके कानों तक पहुंची तो वो  अगली ही शाम    अपनी कॉलेज से थकी हारी रूममेट को लेके सीधे हमारे घर धमक गयी।  हमारी चाय चढ़ चुकी थी जिसमें हमने पानी बढ़ा दिया। और इस तरह मेरी उससे पहली  बार करीब  से भेंट हुई। मैं उसे बारीकी से  ओब्सेर्व  कर  रही थी , शायद उसके बारे में उड़ती खबरों की हकीकत जानने। और जाते जाते इसमें सफलता भी मिली। बात लम्बाई की हो रही थी और सब अपनी लम्बाई बता रहे थे। उससे पूछा गया तो उसका जवाब कुछ इस तरह था।  "उम्म, मैंने मेजर नहीं किया पर मैं ऑलमोस्ट अपनी एक फ्रेंड के बराबर हूँ जो फाइव फ़ीट सिक्स है सो आई गेस मैं भी उतनी ही होउंगी। "
मेरी रूममेट्स उसकी फेंकने की आदत से परिचित थीं तो उनमें से एक ने उसे खड़ा करके अपने साथ उसकी लम्बाई नपवायी।  वो उसके बराबर यानी फाइव फ़ीट फोर निकली। उसकी फेंकने की कला का पहला नमूना मुझे दिख गया।  उसके जाने के बाद काफी देर  तक हम रूम में हँसते रहे।
उसके बाद मे उससे अधिक भेंट नहीं हुई, बस रूममेट्स से उसके किस्से पता चलते रहे।  सारे प्रोफेसर्स को इम्प्रेस कर दिया था उसने।  शब्दों को घुमा फिराके  कान्वेंट वाली अंग्रेजी में कुछ कह जाती तो सामने वाला मुँह खोलके देखता रहता कि क्या बोल गयी।  एक्साम्स में एक दिन पहले  पढ़ना शुरू करती,  हमारे रूम में धमकती, इन लोगों से इम्पोर्टेन्ट टॉपिक्स समझ लेती और जाकर घुमा फिराकर जाने क्या लिख आती कि टॉप भी वही कर जाती! डांस से लेके स्पोर्ट्स, पेंटिंग से लेके कुकिंग , क्या नहीं करती थी वो। शायद इसलिए लोगों की आँखों में खटकती भी थी क्योंकि उसके रहते किसी और पर ध्यान जाता नहीं था।
पर पता  नहीं क्यों, जब भी हम मिलते, एक अच्छी केमिस्ट्री बन जाती हमारी।  मुझे उसके किस्से सुनना पसंद था क्योंकि भले ही वो ५० प्रतिशत झूठ होते, पर होते रोमांचक थे।  उसके स्कूल के पुराने दोस्त, उसकी दीदी का  फ्रेंड सर्किल सब कुछ इतना हैपनिंग था    , नए नए काण्ड करता रहता था।  मुझे अपनी सीमित दायरे में बंधी ज़िन्दगी से उड़ान लेने का मन करता था।  लगता था कि हर पल नए नए काम करूँ , नए दोस्त  बनाऊँ और नयी नयी बातें सीखूं। उसने मेरे अंदर के बंजारे को जगाया था।  अपने में सिमटी रहने वाली मैं उसके किस्से कहानियों में ज़िन्दगी जी लेती थी। लगता था जैसे कोई पर्दा हट गया है और मैं खुली हवा में साँस ले रही हूँ, बादलों के साथ उड़ रही हूँ।
पर ऐसा सिर्फ मेरे साथ होता था। बाकी लोग उसकी गप्पबाजियों में झूठ और सच को अलग करने की धुन में वो नहीं देख पाते थे जो मुझे दीखता था।  हाँ कुछ सीनियर्स और बैचमेट्स थे जो उससे बातें करके उनमें उलझ जाते थे और तब जाके छूटते थे जब वो छोड़ती थी।  एक बार उसने उँगलियों में गिनके बताया था कि वर्तमान में कॉलेज के पाँच लड़के  एक साथ उसके पीछे पड़े हैं ! और वो पूरी  भी गलत नहीं थी , दो तीन लड़के तो मेरी आँखों के सामने उसके दीवाने हुऐ थे। और वो भी बाकायदा सबके लिए वक़्त निकालती थी, सबको तवज्जो देती थी।  बाकी लडकियाँ ये सब सुनके नाक भों सिकोड़ लेती थीं, उसको घमंडी, मगरूर और न जाने क्या क्या कहती थीं, पर मुझे ये बड़ा दिलचस्प लगता था।
एक साल बाद हमको भी ' प्राइम लोकेशन' में कमरा मिल गया और हम वहीं शिफ्ट हो गए।  फिर तो चाय के लिए केटली (चाय का स्टाल) जाना होता था जहाँ अक्सर ये लोग मिल जाते थे।  चाय पे चाय चलती थी और गप्पें लगती थीं। वहाँ उसको और करीब से जानने का मौका मिला। उसे हम तीनों की बॉन्डिंग बहुत पसंद थी। हमारी स्टोव वाली चाय अब गैस में बनने लगी थी, साथ में नाश्ता और मस्ती बदस्तूर चलती थी। वो अपनी रूममेट से त्रस्त रहती थी जो बिस्तर से हिलने का  नाम नहीं लेती थी, उछलना कूदना तो दूर। ऐसे में वो अक्सर हमारे  साथ वक़्त गुजारती थी।
हम दोनों के बीच एक बात कॉमन थी, दोनों पहाड़ी थे।  उसके नैन नक्श तीखे और सुन्दर थे , रंग फिरंगियों वाला गोरा था।  कद काठी एथलेटिक थी पर थोड़ी मोटी थी। अपने बारे में इतनी सकारात्मक थी कि सर के बाल से लेके पैर की उंगलियों तक सबकी तारीफ़ उसके मुँह से निकल चुकी थी। बस कमर जो कमरा थी उसे उसने उसी वास्तिवकता के साथ स्वीकार कर लिया था। कभी कभी मुझे उसकी खुद की तारीफ़ करने की आदत पर हँसी आती थी, फिर लगता था ठीक ही है उसमें तारीफ़ वाली   बातें थी भी तो। जो जिसमें खुश रहता है रहे।
और इस दौरान मैं अपने भीतर कुछ सवालों के जवाब, अपनी ज़िन्दगी के मायने तलाश रही थी।  मेरे अंदर एक  ऐसा वजूद था जो सिर्फ मुझे दीखता था , और जो उसमें अपना होना तलाशता था।  जो अपने नियम खुद बनाकर अपने सबक खुद सीखना चाहता था।  जो 'ऑब्वियस' और 'लॉजिकल' से परे कुछ नया करना चाहता था। मेरा ये अक्स उसमें अपना वजूद तलाशता था, मुक्ति पाता था।  मैं, जिसे बचपन से लिखने का शौक था, रफ़ नोटबुक के आखिरी पन्नों में अपने दिल की बातें, मन की उड़ानें लिखा करती थी , सेमेस्टर ख़त्म होने पर पन्ने  फाड़कर अपने सूटकेस में दबा देती थी। ये बात मेरी रूममेट्स को पता थी, पर उन्हें वो बातें अधिक समझ  नहीं आती थीं। जितनी आती  थीं उतनी की तारीफ़ वो ज़रूर कर देती थीं।
और ऐसे ही एक दिन मैं कुछ लिखकर बिस्तर पर बैठी थी। नोटबुक पास में पड़ी थी। रूममेट्स के साथ गप्पबाजी चल  रही थी। इतने में वो आई और मेरे पास में बैठकर गप्पों में शामिल हो गई। बातों बातों में उसने वो नोटबुक उठायी और उसकी नज़र आखिरी पन्ने  पर पड़ी। उसने मुझसे पढ़ने की इजाज़त मांगी और धीरे धीरे पढ़ने लगी। कान्वेंट एडुकेटेड थी , हिंदी ज़रा कमजोर थी , पर इत्मीनान से उसने  पूरी  कविता पढ़ी, और फिर उसकी प्रतिक्रिया देखने लायक थी।
पूरे गाँव में आग की तरह ये खबर फैला दी उसने।  हर कोई मुझसे आके पूछता "तुम लिखती हो?" हर कोई मेरी कविताएं पढ़ना चाहता।  मैं, जो एक कोने में पड़ी अनजान शख्स हुआ करती  थी, अब पहचाने जाने लगी थी। और ये काम उसने किया था, मेरी तारीफों के पुल बाँध बाँध कर।  पहली बार उसका वो रूप नज़र आया था जिसमें वो खुद की नहीं किसी और की खुलकर तारीफ़ कर रही थी। मैं खुश भी थी और हैरान भी, पर सच तो यही था कि मेरे अंदर छुपे उस अब तक अनजान पहलू  में रूचि दिखाने की उम्मीद  भी किसी उसके जैसे शख्स से ही की जा सकती थी।वो खुद भी लिखती थी , शायद यही एक डोर थी जो मुझ जैसी अंतर्मुखी और उसके जैसी चुलबुली लड़की को एक दूसरे में अपना अक्स ढूंढने को विवश कर देती थी।  शायद इसीलिए मैं  उन तमाम हवा में उड़ती अफवाहों को दरकिनार कर उसमें सकारात्मक छवि देख पाती थी। बात आई गई हो गई, पर मुझे अपने सवाल का जवाब मिल चुका था।
और मेरे अगले जन्मदिन पर मेरे रूममेट्स ने बहुत प्यारा सरप्राइज रखा था। मुझे रूम से खदेड़ दिया  गया एक पार्टीवेअर सूट पकड़ाके।  एक बंदी को मेरी पहरेदारी पर बिठा दिया गया ताकि मैं ताकाझाँकी न कर सकूँ। और जब मुझे वापस बुलाया गया तो दरवाजा खुलते ही पूरे रूम में अँधेरा था, सिर्फ चारों ओर मोमबत्तियों की रौशनी थी और एक प्यारा सा गाना बज रहा था। फिर लाइट  जली और मेरे सब दोस्त केक के साथ तैयार थे मेरा स्वागत करने को। इतना प्यारा सरप्राइज मुझे अब तक नहीं मिला था और मैं बहुत खुश थी।  मेरी रूममेट्स जो मेरे लिए परिवार की  तरह थीं,  मुझे खुश रखने का कोई मौका नहीं छोड़ती थीं। और फिर मुझे कुछ वो गिफ्ट्स मिले जिनमें से एक उसका भी था।  उसने बच्चों सी जिद करके अपना गिफ्ट खोलने को कहा। मैंने हँसते हुए उसका गिफ्ट खोला तो उसमें एक प्यारी सी जिल्द चढ़ी स्पाइरल नोटबुक थी।  उसके समझाने से पहले मैं समझ चुकी थी कि ये मेरी उन बेतरतीब पन्नों में बिखरी कविताओं को सहेजने के लिए दी गई  थी। मुझे असल ख़ुशी इस बात की हो रही थी कि किसी ने उन उपेक्षित पड़े  पन्नों को इस तरह सहेजने की ज़रुरत समझी। मैंने उसकी ये ख्वाहिश पूरी की। अब मेरे सूटकेस में बिखरे हुए पन्ने नहीं, एक सलीके से रखी नोटबुक रहने लगी थी।
चार साल बीते, और हम सब अलग हो गए।  वो तय प्लान के अनुरूप विदेश चली गई। ढर्रे से हटकर वो अब भी जीती थी , पर  फिर एक  दिन उसे सच में प्यार हुआ, फिर शादी, और फिर बच्चा। मुझे हैरत भी हुई और ख़ुशी भी। सही समय पर सही फैसले लेने की काबिलियत थी उसमें। 
अब भी जब उसका नाम आता है तो साथ में याद आती है वो ढेर सारी बकबक जो उसने तबियत से करी और मैंने शिद्दत से सुनी।  याद आती हैं वो उड़ानें जो उसके पंख उधार लेके मैंने कीं।  और फिर याद आती है  वो जिल्द चढ़ी स्पाइरल नोटबुक में पहले पन्ने पर उसकी लिखावट।
"हर वो ख्वाहिश, हर वो तमन्ना जो दिल में हो, हर सोच, हर तजुर्बा इन पन्नों पे उतार दो,  और मेरी इन यादों को अपना एक हिस्सा बना लो।
'तुम्हारी ऋचा। "


यह रचना वर्षा ठाकुर जी द्वारा लिखी गयी है . आप साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन कार्य करती हैं . आप ब्लॉग निम्न है -  www.varsha-proudtobeindian.blogspot.in

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  1. वर्षा जी,
    बहुत खूब.

    तमसो मा जोतिर्गमयः में ही आपको पढ़ता था. पहली बार आपकी रचना हिंदी कुंज पर देखी.

    बहुत अच्छा लगा.
    आपने अपने संस्मरण बखूबी पेश किया है.
    हिंदी कुंज में ही (दाएं तरफ) "राजभाषा हिंदी" पर एक शृंखला देखी जा सकती है.
    आपने अपने नाम के साथ सरनेम पहली बार लिखा है.
    सादर,
    अयंगर.

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    1. शुक्रिया अयंगर जी, ब्लॉग में तो आप उत्साहवर्धन करते आये हैं और यहाँ पर भी आपकी टिप्पणी पढ़के बहुत अच्छा लगा।

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