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हिंदी की जय बोलो

जय बोलो जय बोलो,  हिंदी की जय बोलो
जैसे-जैसे कोई बोले, वैसे-वैसे लिखते जाओ
हिंदी का ये ही है रूप, इसे दिल से संवारे जाओ।
जय बोलो जय बोलो, हिंदी की जय  बोलो ।।
गंगा-जमुनी तहज़ीब की धरोहर, संतों के मुख की वाणी
अंग्रेज़ों को दी विदाई, गांधी ने अलख जगाई
हिंदी का ये ही है रूप, इसे दिल से संवारे जाओ।
जय बोलो जय बोलो,  हिंदी की जय बोलो।
सदियों से हिंदी है हमारी, प्राणों से रहेगी ये प्यारी
सबको अपना लिया, नेट हो या मीडिया
राजीव शर्मा “मासूम”

हिंदी का ये ही है रूप, इसे दिल से संवारे जाओ।
जय बोलो जय बोलो,  हिंदी की जय बोलो।
देश की है ये सूरत, एकता की है ये मूरत
भाषाओं का सागर, ये सहज-सरल बंधी है
हिंदी का ये ही है रूप, इसे दिल से संवारे जाओ।
जय बोलो जय बोलो, हिंदी की जय बोलो ।।
हिंदी की जय बोलो,  हिंदी की जय बोलो ।।



यह रचना राजीव शर्मा “मासूम” जी द्वारा लिखी गयी है . आप नई दिल्ली के राजभाषा विभाग में वरिष्ठ अनुवादक के पद पर कार्यरत हैं . संपर्क सूत्र - वरिष्ठ अनुवादक, राजभाषा विभाग, उत्तर रेलवे, प्रधान कार्यालय, बड़ौदा हाउस, नई दिल्ली। मोबाइल - 09810472957  

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  1. राजीव जी,
    कविता पढ़ी. बढ़िया है.
    क्या आपसे ईमेल पर संवाद संभव हो सकेगा?
    laxmirangam@gmail.com

    अयंगर.

    उत्तर देंहटाएं
  2. ' हिन्दी की जय बोलो" ये आपकी रचना बहोत बढ़िया है

    उत्तर देंहटाएं

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