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प्रिय मित्रों , आज बाल दिवस(१४ नवम्बर ) के उपलक्ष्य में हिंदीकुंज में बच्चों व उनकी शिक्षा प्रणाली एवं उनकी वर्तमान दशा के संबध में इतिश्री सिंह द्वारा विशेष लेख प्रस्तुत किया जा रहा है।  इन लेखों का उदेश्य भारत के गरीब बच्चों को बाल -मजदूरी जैसे अभिशाप से मुक्त करा के उन्हें सामान्य धारा में लाकर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की ओर प्रेरित करना है।  इन लेखों के सम्बन्ध में हमें सुझाओं की अपेक्षा है।  
बालकों के जीवनपर्यंत स्वयं को शिक्षित करते रहने में सक्षम बनाना ही शिक्षा का ध्येय है- रोबर्ट एम हचिन्स की यह कहावत सत्य तो है लेकिन भूख व गरीबी की मार से जूझ रहे बच्चे के लिए क्या यह संभव है कि वह खुद को शिक्षित बना सके.  उस पर देश में सरकारी शिक्षा व्यवस्था की बदहाली ने उन्हें जैसे निराशा की तरफ ढकेल दिया हो. देश के विभिन्न हिस्सों 6 से 14 साल की उम्र के करोड़ों बच्चे बाल श्रम, सड़कों, ढाबों, खानों-खदानों, में काम करते या सड़कों पर भीख मांगते देखे जा सकते हैं. देश के दूर-दराज अशांत क्षेत्रों में स्कूल नियमित रूप से चल ही नहीं पा रहे हैं. इन इलाकों में शिक्षा पाने की अभिलाषा रखने वाले बच्चे शिक्षा के जर्जर ढांचे की वजह से शिक्षा पाने के अधिकार से वंचित हैं.
कई स्कूलों में पेय जल की सुविधा तक नहीं
 अकेले  बिहार में ही 13,000 स्कूलों में पीने का पानी तक उपलब्ध नहीं है. 2010-11 के आंकड़े के अनुसार देश में अभी भी दस में से एक स्कूल में पीने के पानी का अभाव है जबकि पांच में से मात्र दो स्कूलों में ही  शौचालय है जो कि लड़के व लड़कियों के लिए संयुक्त है. पांच में से महज दो स्कूलों में ही लड़कियों के  लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था है. कक्षा की व्यवस्था तथा छात्रों व अध्यापकों के अनुपात की हालत तो और भी दयनीय है. 40 प्रतिशत प्राइमरी स्कूलों में एक कक्षा में तीस से ज्यादा बच्चे बैठते हैं.
अध्यापकों की कमी
पूरे देश में अभी भी कानून के मानक को पूरा करने के लिए 12 लाख अध्यापकों की जरूरत है. कानून ने प्राइमरी के लिए 30 बच्चों पर एक और अपर प्राइमरी में 35 बच्चों पर एक अध्यापक उपलब्ध कराने का लक्ष्य तय किया है जो चीन ;17 बच्चों पर एक अध्यापक, रूस 18 छात्रा पर एक , ब्राजील 22 छात्रा पर एक अध्यापक हैं. देश में एकल अध्यापक वाले विद्यालय अभी भी हजारों की तादाद में मौजूद हैं. योग्य व प्रशिक्षित अध्यापकों तथा बच्चों व शिक्षकों के अनुपात को दुरुस्त किए बगैर शिक्षा की गुणवत्ता की बात करना बेमानी है. शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाने से शिक्षा की गरिमा और उसका महत्व भी लगातार कम होता जा रहा है तथा नागरिक समाज की ओर से इसका विरोध होता रहा है. सरकार भी समय-समय पर अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए खराब शिक्षा के लिए अध्यापकों को जिम्मेदार ठहराती रही है और कहीं-कहीं शिक्षकों ने भी अपने दायित्व को ठीक से निर्वहन नहीं किया है. बच्चों के बढ़ते नामांकन के  सरकारी दावों पर भी विभिन्न हलकों में सवाल उठते रहे हैं.  जमीनी सच्चाई और सरकारी आकड़ों में जमीन और आसमान का फर्क दिखता है. नागरिक समाज ने प्री-प्राइमरी से सेकेंडरी तक शिक्षा को कानूनी अधिकार बनाए जाने की जोरदार आवाज उठाई थी और संविधान संशोधन के दौरान रह गई कमी को कानून के द्वारा दुरुस्त करने की मांग भी उठाई थी लेकिन इसे इच्छाधीन बना दिया गया.
शिक्षा का बाजारीकरण
समग्र शिक्षा सुधार के  लिए गठित कोठारी कमिशन ने सन 1968 में सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने का सुझाव दिया था मगर सरकार ने पैसे का अभाव बताकर कन्नी काट ली. यदि सरकार ने यह सलाह मान भी होती तो आज यह दुर्दिन देखने नहीं पड़ते. अभी भी हम मात्रा 3.4 प्रतिशत पर ही अटक हैं हालांकि यह कानून अपनी कमियों और सीमाओं के  लिए विख्यात है. फिर भी देश के अधिकांश लोगों ने बड़ी उम्मीद के  साथ इसका स्वागत किया ताकि स्कूली शिक्षा की जर्जर हालत में सुधार लाया जा सके और शिक्षा के बढ़ते निजीकरण व बाजारीकरण के खतरे को रोका जा सके.
गुणवत्ता पूर्ण अध्यापकों की जरूरत
इतिश्री सिंह
निजीकरण के पैरोकार सरकार पर लगातार दबाव बढ़ा रहे हैं कि वह उच्च शिक्षा की तरह स्कूली शिक्षा को भी निजी क्षेत्रों के हवाले कर दे. इसके लिए वाउचर सिस्टम, कम बजट वाले स्कूल अथवा सार्वजनिक-निजी साझेदारी ;पीपीपी जैसी व्यवस्था लागू करने का भी विकल्प सुझाया जा रहा है. स्कूली शिक्षा को निजी क्षेत्रों के  हवाले करने का कोई भी निर्णय देश के  लिए घातक हो सकता है और स्कूली शिक्षा को भी खरीद-फरोख्त के लिए बाजारके हवाले कर दी जा सकती है. अब सवाल उठता है कि सरकार अगर केंद्रीय विद्यालय व नवोदय विद्यालय अच्छे तरीके से चला सकती है और उनेक नतीजे किसी भी प्राईवेट स्कूल के नतीजों से बेहतर आते हैं, तो फिर देश के सारे स्कूल क्यों नहीं गुणवत्ता पूर्ण स्कूलों में बदले जा सकते हैं? बिडंबना  है कि केंद्रीय विद्यालय में सरकार प्रति बच्चा सालाना बीस हशार रुपये खर्च करती है और गांव के सरकारी स्कूलों में मात्र चार से पांच हजार रुपये खर्च करती है.  सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा देने के  लिए गुणवत्ता पूर्ण अध्यापकों की जरूरत है और उनका लगातार संस्थागत प्रशिक्षण जरूरी है. फिर बाल शिक्षा तो किसी भी समाज की जीवन ज्योति है जो समाज को एक दशा और दिशा देने में मदद करती है. बाल विकास के बिना देश का विकास संभव ही नहीं.

यह लेख इतिश्री सिंह राठौर जी द्वारा लिखी गयी है . वर्तमान में आप हिंदी दैनिक नवभारत के साथ जुड़ी हुई हैं. दैनिक हिंदी देशबंधु के लिए कईं लेख लिखे , इसके अलावा इतिश्री जी ने 50 भारतीय प्रख्यात व्यंग्य चित्रकर के तहत 50 कार्टूनिस्टों जीवनी पर लिखे लेखों का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद किया. इतिश्री अमीर खुसरों तथा मंटों की रचनाओं के काफी प्रभावित हैं.

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  1. बहुत ही सार्थक लेख लिखा आपने , धन्यवाद

    संदीप शर्मा . नयी दिल्ली

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