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शमशेर बहादुर सिंह
वही उम्र का एक पल कोई लाए
तडपती हुई-सी गजल कोई लाए

हकीकत को लाए तखैयुल से बाहर
मेरी मुश्किलों का जो हल कोई लाए

कहीं सर्द खूँ में तड़पती है बिजली
जमाने का रद्दो-बदल कोई लाए

उसी कम-निगाही को फिर सौंपता हूँ
मेरी जान का क्या बदल कोई लाए

दुबारा हमें होश आए न आए
इशारों का मौका-महल कोई लाए

नजर तेरी दस्तूरे-फिरदौस लायी
मेरी जिंदगी में अमल कोई लाए




शमशेर बहादुर सिंह (1911- 1993) हिन्दी के सर्वाधिक प्रयोगशील कवि है. शमशेर बहादुर सिंह, प्रगतिशील और प्रयोगशील कवि है. बौद्विक स्तर पर वे मार्क्स के द्वंदात्मक भौतिकवाद से प्रभावित है तथा अनुभवों में वे रूमानी एवं व्यक्तिवादी जान पड़ते है. उनकी काव्यदृष्टि सुदीर्घ एवं बहुआयामी है, किंतु उनमे एक तरह का अंतद्वंद विद्धमान है, इसीलिए उनका काव्य जगत बहुत ही अमुखर और शांत है. विजयदेव नारायण शाही ने शमशेर की काव्य -कला का विश्लेषण करते हुए लिखा है -.. "तात्विक दृष्टि से शमशेर की काव्यनुभूति सौन्दर्य की ही अनुभूति है शमशेर की प्रवृति सदा की वस्तुपरकता को उसके शुद्ध और मार्मिक रूप में ग्रहण करने में रही है वे वस्तुपरकता का आत्म-परकता में और आत्म-परकता का वस्तुपरकता में अविष्कार करने वाले कवि है. जिनकी काव्यानुभूति बिम्ब की नही बिम्बलोक की है. "
रचना कर्म: -
काव्य: - कुछ कवितायें, इतने पास अपने, उदिता, चुका भी हूँ नही मै.
डायरी - शमशेर की डायरी


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  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 25-9-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1747 में दिया गया है
    आभार

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  2. सुरमई क़लम की पुरशोख़ ग़ज़ल की..,
    नक़ल तो हम ख़ुद हैं असल कोई लाए.....

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  3. वाह क्या बात है सर जी ...बेहतरीन और उम्दा गजलकार से मिलाने का आभार

    Rohitas Ghorela: पासबां-ए-जिन्दगी: हिन्दी

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  4. एक बढिया फनकार से मिलवाने का शुक्रिया।

    उत्तर देंहटाएं

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