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मनोज सिंह 

रास्ते पर अंधेरा पसरने लगा था। कार सामान्य गति से चल रही थी। तभी ड्राइवर के अचानक तेजी से ब्रेक मारने के कारण पीछे की सीट पर मुझे भी जोर का झटका लगा था। मेरी निगाह आगे की ओर गयी तो पाया एक नवयुवती तभी-तभी सड़क के बायें से दायें अपने स्कूटर पर अचानक मुड़ी थी। अगले ही पल पीछे आ रही मोटर-गाड़ियों के तेजी से रुकने और चक्के के सड़क पर घिसने की तीखी आवाज कानों तक पहुंची थी। मैंने तुरंत पीछे मुड़कर देखा। गाड़ियों की लंबी कतार लग चुकी थी। बहरहाल, कोई बड़ा हादसा होते-होते बचा था। आगे चैराहे की लालबत्ती पर उस युवती ने रुककर एक नजर चारों ओर डाली थी। मैंने पाया कि वो काले रंग का धूप का चश्मा पहनी हुई थी। उसके देखने के अंदाज मात्र से ही दूर से पता चल रहा था कि वो उसके कारण होने वाली किसी दुर्घटना से पूरी तरह अनजान है। उसके हावभाव से लग रहा था कि जैसे मानो कुछ हुआ ही न हो। ठीक भी तो है, उसे दिखाई और सुनाई कहां देता, आंखों पर काला चश्मा और कान पर मोबाइल का ईयरफोन जो लगा हुआ था। शायद किसी से बात भी कर रही थी। एक मिनट के लिए मुझे गुस्सा आया था, मन किया कि गाड़ी से उतरकर उसे फटकार या और कुछ नहीं तो समझाऊं, कम से कम कुछ तो अवश्य कहना चाहिए। आखिरकार यह दुर्घटना उसके लिए भी तो घातक हो सकती थी। मगर मैंने अपने आपको रोका था। सिर्फ यह सोचकर कि, आज के युग में किसी अनजान युवा को कुछ भी कहना, फिर चाहे वो उसके हित में समझाया क्यों न जा रहा हो, आसान नहीं। और फिर यहां तो मामला नवयुवती का था। बात उलटी भी पड़ सकती थी। और मैं अपने आक्रोश को दबाते हुए पीछे की सीट पर टिक कर, सिर रखकर, सोचने लगा कि अगर ड्राइवर ने तुरंत ब्रेक न मारा होता और कार आगे स्कूटर से टकरा जाती तो क्या हो सकता था? और फिर ड्राइवर की आने-जाने वाले लोग क्या दुर्गति करते? सोचकर ही मैं कांप उठा था। दुर्घटनाग्रस्त वाहन अगर छोटा है, और नवयुवती का है तो फिर सड़क पर जमा भीड़ अमूमन कुछ सुनने और समझने को तैयार नहीं होती। भगवान न करे, मगर अगर बड़े वाहन से कोई बड़ा हादसा हो जाये तो कोर्ट-कचहरी के चक्कर अलग लगाओ, चाहे फिर आपकी कोई गलती न भी हो।
उपरोक्त घटनाक्रम से चिंता का उभरना स्वाभाविक था। आधुनिक पीढ़ी जिस तरह के जीवनशैली को अपना रही है, समाज जिस तरह से इसे प्रोत्साहित कर रहा है, स्वतंत्रता के नाम पर उच्छृंखलता पनपती जा रही है, यह अत्यंत चिंतनीय है। असल में ज्ञान, शिक्षा, सूचना का विस्तार तो हुआ है और युवा पीढ़ी अधिक शिक्षित और आधुनिक हुई है, मगर इसका उपयोग नहीं उपभोग हो रहा है। यह सब देखने-समझने में तो बड़ी सामान्य-सी बातें लगती हैं मगर इसके प्रभाव और परिणाम को देखने पर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए चिंतित होना स्वाभाविक है। यूं तो हर काल हर युग में हर समाज में नयी पीढ़ी परिवर्तन का प्रतीक रही है। जीवनशैली ही नहीं, संस्कार और व्यवस्थाएं समय के अनुसार बदलती रही हैं। सभ्यता का विकास इस बात का प्रमाण है। मगर यह परिवर्तन कभी भी अति तीव्र और आत्मघाती नहीं रहा, जितना पिछले कुछ दशकों के दौरान देखा जा सकता है। यह यकीनन फास्ड-फूड की परिभाषा में स्वयं को सही ढंग से फिट कर देता है। तुरत-फुरत सब कुछ। मगर सवाल उठता है कि हम इस तेज रफ्तार और अनियंत्रित दिशा से कहां जाना चाह रहे हैं? क्या पाना चाह रहे हैं? हमें इन छोटे से दो बिंदुओं पर भी सोचने का वक्त नहीं। और जब किसी दुर्घटना का समय या काल आता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। 
माना कि जीवन सपनों के बिना निरर्थक है। जिस युवापीढ़ी के पास सपने नहीं वो समाज मृत समान है। कल्पनाओं से ही मानवीय विकास संभव हो पाया है। परंतु जीवन को ही सपना बना देना किस हद तक सही हो सकता है। हकीकत की जिंदगी में यह कहीं भी सामान्य ढंग से स्वीकार नहीं किया जा सकता। मगर आधुनिक युग में सपनों और हकीकत के बीच की दूरियों को न केवल समाप्त किया गया है बल्कि इनके आपसी सामंजस्य को भी कम किया है। सपनों का प्रभुत्व अब हकीकत के ऊपर है। युवापीढ़ी को अब सपनों में जीना सिखाया जाता है। जबकि जीवन की हकीकत कुछ और है। असल में जीवन के मूल तो कभी भी परिवर्तित नहीं होते, व्यावहारिक रूप में उसका बाह्य स्वरूप ही बदलता है, कह सकते हैं कि ऊपरी आवरण बदल जाया करते हैं। मगर वस्त्र बदल जाने से व्यक्ति के शारीरिक रचना में तो कोई फर्क नहीं आता। हजारों साल पूर्व से चली आ रही सामाजिक संरचना आज भी मूल में है। हां, भौतिकता ने ऊपरी परिवेश जरूर बदल दिया है। मगर यह पूर्व में भी बदलता रहा है। सच तो यह है कि जीवन के मूल तथ्यों में कोई परिवर्तन नहीं आता। मगर हम पैकेज के जमाने में जी रहे हैं। जहां हररोज नये आकर्षक कवर पहनाये और चढ़ाये जाते हैं। पुरानी शराब को नयी बोतल में डालकर नयी कीमत वसूलते हुए नयी पीढ़ी को भ्रमित किया जाता है। मनोरंजन और मस्ती जीवन के प्रमुख अवयव हो सकते हैं मगर जीवन नहीं। और फिर सड़क यातायात के लिए बनाई गयी है मगर इसे भी मस्ती में भिगोने पर आधुनिक युग पूरी तरह सक्रिय है। परिणाम हमारे सामने है, दुर्घटनाओं के नाम पर। दुःख इस बात का है कि नयी पीढ़ी इस बात से अनजान है। और उससे अधिक चिंतनीय स्थिति तब हो जाती है जब जिन्हें समझाना और बोलने की जिम्मेवारी समाज ने दी है वो स्वयं नयी पीढ़ी को और गुमराह करने का कार्य करते देखे जा सकते हैं। 
उपरोक्त नवयुवती को क्या उसके घर के बड़े-बुजुर्गों ने यह नहीं समझाया होगा कि आधुनिकता का मतलब यह कदापि नहीं कि देर शाम में भी धूप का चश्मा पहना जाये? पढ़ी-लिखी युवापीढ़ी क्या इस बात से अनजान है कि रास्ते में ईयरफोन लगाकर मोबाइल से गाने सुनना या बातें करना दुर्घटना को न्योता देने के समान है? बहरहाल, क्या किसी अनजान युवा को समाज का कोई भी बुजुर्ग समझाने की हैसियत रखता है? पूर्व में हर घर के हर बच्चे को समझाने के लिए बड़े-बुजुर्गों की एक फौज हुआ करती थी। घर से लेकर मोहल्ले, समाज से लेकर स्कूल कालेज के प्रांगण तक में अनुभव साझा करने वालों की कमी नहीं थी। बाजार, विकास, ज्ञान-विज्ञान सभी हर युग में अपनी-अपनी स्थिति को मजबूत करते रहे हैं। मगर आधुनिक युग ने जिस एकल संस्कृति को अपनाया है वहां सिर्फ उपभोग के अलावा कुछ नहीं। और इस उपभोग में ‘मैं’ के अतिरिक्त कुछ नहीं। चिंता इस बात की है कि नयी पीढ़ी आधुनिकता का चश्मा लगाकर उस जीवनपथ पर तेजी से दौड़ रही है जहां पहले ही बड़े-बड़े गड्ढे विद्यमान हैं।


यह लेख मनोज सिंह जी द्वारा लिखा गया है . आप कहानीकार ,स्तंभकार तथा कवि के रूप में प्रसिद्ध है . आपकी 'बंधन',व्यक्तित्व का प्रभाव ,कशमकश' आदि पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है .




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