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मनोज सिंह 
मैं आधुनिकता का विरोधी नहीं। मुझे आधुनिक कहलाने में परहेज नहीं, उल्टा अन्य की तरह बनना भी चाहता हूं। यह शब्द सुनकर अच्छा लगता है। मगर आधुनिक होने का सही मतलब क्या है? अब तक समझ नहीं आया। अगर ये समय के पैमाने पर मात्र नवीनतम होने का प्रदर्शन करता है तो फिर एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में ही आधुनिक कब है और कब नहीं? सुनिश्चित करना मुश्किल होगा। एक ही जीवन में पहले पोता, बेटा फिर स्वयं पहले पिता फिर दादा बनते-बनते पीढ़ी का अंतर तो महसूस किया जा सकता है मगर उनके बीच कौन अधिक आधुनिक है कहे जाने पर मतभेद हो सकता है। इस आधुनिक होने के तर्क बड़े हास्यास्पद और हर काल में दिये जाते रहे होंगे। पहले से अलग और नये से नये माल या सेवा का उपभोग करना ही आधुनिकता है तो मुझे इस पर थोड़ी आपत्ति है। कुछ एक लोग विचारों में खुलापन, स्वतंत्रता, नयी सोच आदि को आधुनिकता से जोड़कर देखते हैं। अब इसे थोड़ा विस्तार दें और कल्पना करें कि एक समाज में सभी अगर संस्कारविहीन और बंधनमुक्त जीवनशैली अपनाने लगे तो फिर उनकी अगली पीढ़ी आधुनिकता के नाम पर अलग होने के लिए क्या करेगी? असल में बौद्धिक वर्ग के कुछ एक शब्दों की रचना किसी मायाजाल से कम नहीं, जो पढ़ने-सुनने में तो आकर्षक-रोचक लगती है मगर हकीकत में सब हवा-हवाई। संक्षिप्त में यहां कहूं कि मैं स्वयं को आधुनिक कैसे बनाऊं? कैसे परिभाषित करूं? शायद ठीक-ठीक कहना-करना मुश्किल है। तो कहीं ये सिर्फ मृगतृष्णा, दिवास्वप्न या स्वप्न-जाल तो नहीं? वैसे भी हर काल अपने समय में आधुनिक ही तो होगा। बहरहाल, आज के युग में शायद इस शब्द का प्रचलन अधिक है और साथ जोड़ दिये जाते हैं और कुछ एक शब्द, विकसित-प्रगतिशील आदि-आदि। यहां भी स्थिति बड़ी हास्यास्पद है। अगर कोई विकसित है तो अर्थात वो अपने आपमें संपूर्ण है। अब पूर्णविराम लगने पर वो आगे प्रगतिशील तो नहीं हो सकता? ऐसे में फिर उसकी अगली पीढ़ी आधुनिक होने के लिए क्या करेगी? समाजशास्त्री और साहित्यकार आधुनिक से आगे उत्तर-आधुनिक काल कहकर बचना चाहते हैं। मगर फिर उसके आगे? खैर, इस भ्रम को यहीं छोड़ें और आधुनिक व विकास शब्द पर लौंटे तो इनको आमतौर पर उन्नति, उत्तम, बेहतर होने से जोड़कर देखा-समझा जाता है। और साथ में बड़े-बड़े दावे ठोके जाते हैं। मगर क्या यह सच है? थोड़ी नजर डालनी होगी, चारों ओर।
सर्वप्रथम ज्ञान व साहित्य का क्षेत्र देखते हैं। रामायण और महाभारत का उदाहरण लेते हैं। ये पौराणिक ग्रंथ हैं। मगर आज भी अति लोकप्रिय, संदर्भित एवं समाज से गहरे तक जुड़ी हैं। ये सारगर्भित महान कृतियां किस युग में लिखी गई थीं? यहां न तो खोज का विषय और न ही बहस का। इतना अवश्य है कि इस नये तथाकथित आधुनिक युग से बहुत पहले, उस दौरान लिखी गई थीं जिसे आज की पीढ़ी पिछड़ा और अज्ञानी घोषित करने में परहेज नहीं करेगी। जबकि सच तो यह है कि महाभारत की अद्भुत कथा में आधुनिकता का वो पुट है जिसकी आज भी कल्पना नहीं की जा सकती। इस महाकाव्य का ऐसा कोई पात्र नहीं जो वर्तमान युग में न मिले या आधुनिक युग का कोई भी चरित्र ऐसा नहीं जो महाभारत में न आया हो। इतनी रोचक सधी-कसी हुई कहानी, फिर चाहे हकीकत हो या काल्पनिक, आज के किसी भी कहानीकार द्वारा सोची भी नहीं जा सकती, लिखना तो बहुत दूर की बात है। ये दोनों उस युग में घर-घर, हर एक की जुबान पर थीं, जब संचार का शायद ही कोई माध्यम उपलब्ध था। चलिये थोड़ा आगे बढ़ते हैं। क्या बिहारी के दोहे, सूरदास की कल्पना और रहीम-कबीर का साहित्य आज की तारीख में लिखा जा सकता है? ये सर्वकालीन अतुलनीय है। आज भी इनका अनुसरण किया जाता है। यही क्यों यूरोप में भी जो कुछ लिखा जा चुका वो अब नहीं लिखा जा रहा। महान साहित्यिक कृतियां व क्लासिक का नाम आते ही टालस्टाय, चेखव, दोस्तावस्की, स्टीफन की ओर ही देखना पड़ता है। अंग्रेजी के शेक्सपियर व मिलटन सदियों से प्रकाश-स्तंभ की तरह खड़े हैं। दर्शन में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु से लेकर चाणक्य की सुक्तियों से बाहर निकल पाना मुश्किल है। गीता का सार अब तक पूरी तरह नहीं समझा जा सका। हिन्दुस्तान हो या विश्व का कोई भी छोटा-बड़ा विश्वविद्यालय, जितने शोध इन व्यक्तियों व ग्रंथों पर हो चुके या हो रहे हैं, उतना आज की किसी रचना या रचनाकार के बारे में कल्पना करना भी हास्यास्पद होगा। तो सवाल उठता है कि क्या दुनिया में सर्वश्रेष्ठ साहित्य, ज्ञान, दर्शन व नीतिशास्त्र बहुत पहले ही लिखा जा चुका? और अगर हां तो क्या आधुनिक युग इस मामले में स्वयं को पिछड़ा मानने के लिए तैयार है?
आधुनिक युग के अंध-समर्थक उपरोक्त उदाहरण को साहित्य, ज्ञान, दर्शन का क्षेत्र कहकर पल्ला झाड़ सकते हैं। मगर धर्म के क्षेत्र को देख लें, हजारों वर्ष पूर्व बनाये गये धार्मिक मूल सिद्धांत आज भी समाज में प्रचलित और स्वीकार्य हैं। इनकी ओर लौटकर जाना ही पड़ता है। यहां तक कि बाद के नये धर्मों में भी इन मूल सिद्धांतों की अनदेखी नहीं की गई। जहां तक संस्कृति की बात है, हिन्दुस्तान तो वेदों-उपनिवेषदों पर आज भी निर्भर और पुराणों से प्रेरित होता रहता है। वहां उसकी जड़ें हैं। और कमोबेश यही स्थिति दूसरे प्राचीन सभ्यताओं की भी है। विचारधाराओं के मूल में आज भी वही सब कुछ है जो युगों से चला आ रहा है। तो क्या फिर हम इस क्षेत्र में भी कुछ नया नहीं कर पाये? हां, जीवनशैली, खान-पान व कपड़े-मकान में समयानुसार परिवर्तन हुआ है। मगर इसे कोई विशिष्ट उपलब्धि नहीं कहा जा सकता। और अगर संयुक्त से एकल परिवार फिर एकदम अकेला जीवन ही आधुनिकता की निशानी मान ली जाये तो यह हास्यास्पद होगा क्योंकि कृषि आधारित समाज से पूर्व आदि-मानव अकेला ही विचरण करता था और आवश्यकतानुसार अपना संबंध व परिवार बनाता था।
बाजार की अर्थव्यवस्था पर इतराने वाले आधुनिक मानव के लिए इससे बड़ा झटका और क्या हो सकता है कि उसकी आर्थिक नीतियां कुछ दशकों में ही दम तोड़ने लगती हैं। और उसे हर दूसरे दिन दायें-बायें ताकना-झांकना पड़ता है। जबकि चाणक्य की अर्थनीति शताब्दियों से आज भी व्यावहारिक है तथा व्यावसायिकता से लेकर अकादमिक क्षेत्रों तक में सारी विचारधाराओं की नींव बनी हुई है। आज भी हर एक अर्थशास्त्री इसका संदर्भ लेता है। कमोबेश यही स्थिति नीतिशास्त्र, कूटनीति या फिर सैन्य नीति की भी है। युद्ध, वाहन, अस्त्र-शस्त्र आदि का जैसा वर्णन प्राचीन ग्रंथों में उल्लेखित है, उसे देखकर तो आधुनिक युग आज भी हैरान होता है। अमूमन वो इसे काल्पनिक घोषित कर आज के विज्ञान के विध्वंस पर अपनी छाती फुलाने में लग जाता होगा। जबकि यह दावे से नहीं कहा जा सकता कि उस युग में सब कुछ काल्पनिक ही था। प्राचीन युग में इन सब अद्भुत ज्ञान की जानकारी होने के समर्थन में पहला तर्क तो यही है कि सच्चाई जाने बिना इतना सटीक वर्णन नहीं किया जा सकता। और अगर उस युग में सब कुछ काल्पनिक ही था तो उनकी कल्पनाशक्ति को दाद देनी चाहिए। हम आधुनिक युग में कुछ ऐसी ही नयी कल्पना क्यों नहीं कर पाते? जो नवीन और रोचक हो।
आधुनिकता के साथ आमतौर पर स्वतंत्रता की बात जोड़ दी जाती है। मगर क्या कालीदास को पढ़ने के बाद कोई यह कह सकता है कि उस युग में पुरुष और महिलाएं संकोची व अज्ञानी थे? प्राचीन भारतीय कामशास्त्र को पढ़कर यह कहना हास्यास्पद होगा कि व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन में पहले के नर-नारी स्वतंत्र रूप से विचरण नहीं करते थे। खजुराहो व उड़ीसा के मंदिरों में प्रेम के सौंदर्य का भव्य प्रदर्शन मूर्तियों के माध्यम से किया गया है, जिसकी कल्पना आधुनिक युग की नवदंपति भी नहीं कर सकते। दर्शाये गये विभिन्न आसन और उनका नख-शिख वर्णन आज के नवविवाहित के लिए भी उत्सुकता का विषय होता है। और युवाओं को सदियों से कामसुख के लिए प्रेरित करता है। क्या हम निर्जीव पत्थरों में सजीव भावसुख का पुनर्निर्माण कर सकते हैं? आज हम उस पर शोध तो कर सकते हैं, अनुपालन किया जा सकता है, सीखा जा सकता है, मगर आधुनिक युग उससे आगे बढ़ पाये, प्रतीत नहीं होता। उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि इन क्षेत्रों में भी अब तक का सर्वश्रेष्ठ हम दे चुके। यही क्यों, अन्य क्षेत्र को भी देखें तो भारतीय सिनेमा का स्वर्णिम युग, लगता है मानों बीत चुका। क्लासिक्स फिल्मों की सूची में आज भी अधिकांश पुराने नाम ही आते हैं। जबरन एक-दो नयी फिल्मों के नाम डाल भी दिये जायें तो उन पर आम सहमति नहीं बन पाती। और असहमति क्यूं न हो, उनमें कहीं न कहीं कोई न कोई कमी महसूस जरूर होती है। संगीत के क्षेत्र में तो आज बनाये गाने कल सुनने लायक नहीं होते। जबकि दशकों पुरानी धुनों को आज भी तीसरी-चैथी पीढ़ी गुनगुनाती है। 
व्यक्तित्व में भी हम बुद्ध और विवेकानंद से लेकर तमाम धर्मगुरुओं व ऋषि-मुनियों को ही आदर्श रूप में स्वीकार कर पाते हैं। राणा प्रताप और शिवाजी संघर्ष व वीरता के लिए प्रेरित करते हैं। चंद्रगुप्त व अशोक महान से लेकर विक्रमादित्य से बेहतर सम्राट और शासन व्यवस्था की कल्पना आज के प्रजातंत्र में क्या की जा सकती है? यही नहीं, क्या अमेरिका का कोई भी राष्ट्रपति, एलेक्जेंडर से अधिक शक्तिशाली व सक्षम हो सकता है। प्राचीन युग में भौतिक सुविधाएं कम हो सकती हैं मगर भुखमरी, हत्या, अपराध, आत्महत्या, बलात्कार पहले की तुलना में आज अधिक हैं। तो सवाल उठता है कि हमारा आधुनिक युग किस बात में पहले से बेहतर हुआ? विकास की कौन-सी परिभाषा इसे स्थापित व प्रमाणित करती है? उपरोक्त सभी उदाहरण तो विपरीत दिशा दर्शाते हैं और विरोध में खड़े नजर आते हैं। और फिर सच भी तो है, यथार्थ को झुठलाया कैसे जा सकता है। तो फिर कहीं आधुनिक युग ने स्वयं को एक आकर्षक नाम का चोला पहनाकर, अन्य से बेहतर साबित करने के लिए अपनी पीढ़ी को भ्रमित तो नहीं कर रखा? उसके अपने समकालीन लोग उससे प्रश्न न कर सकें, उसने सबको कहीं अति व्यस्त तो नहीं कर दिया? वो जानता है कि वह उथला है, जबकि श्रेष्ठता प्राप्त करने के लिए, विशिष्ट होने में, गहराई व गुण चाहिए, ठहराव चाहिए, चिंतन चाहिए। कहीं इसीलिए तो उसने अवाम के सोचने और समझने की शक्ति को छीन तो नहीं लिया? उसने अपने मायाजाल में फंसाकर लोगों को अपना गुलाम बनाये रखने का सफल प्रयोग किया है जहां कुछ भी नया और श्रेष्ठ की कल्पना नहीं की जा सकती। ऐसे कई और भी सवाल पैदा होते हैं जिसका उत्तर देने के लिए आधुनिक पीढ़ी के पास वक्त नहीं।
 

यह लेख मनोज सिंह द्वारा लिखा गया है.आप ,कवि ,कहानीकार ,उपन्यासकार एवं स्तंभकार के रूप में प्रसिद्ध हैआपकी  'चंद्रिकोत्त्सव’ ,बंधन ,कशमकश और 'व्यक्तित्व का प्रभावआदि पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है .

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