3
Advertisement
छोटी सी मिनी बिटिया स्कूल से दौड़ती घर पहुँची तो सीधे नानी के पास गई और बोली, ‘नानी, देखो मैं दौड़ में पहला नंबर आयी हूँ। मुझे ये कप मिला है।’
नानी ने अपना चष्मा लगाया और कप अपने हाथ में लेकर देखा और बोली, ’शाबाश बिटिया, ये तो बहुत प्यारा कप है।
  अच्छा बताओ, इस बात पर तुम्हें मेरे पास से क्या मिलेगा?’
‘एक रुपया,’ मिनी ने खुषी से उचकते हुए कहा।
‘कैसे जाना कि मैं तुम्हें एक रुपया दूँगी,’ नानी ने प्रष्न किया।
‘वाह, नानी भूल गये। इसके पहले जब भी मैं परीक्षा में पहला नंबर आयी आपने मुझे एक रुपया ही तो दिया था,’ मिनी बोली।
‘तो उन रुपयों का तुमने क्या किया?’ नानी पूछा।
‘वो सारे मैंने गुल्लक में डाल दिये,’ मिनी ने जवाब दिया।
‘देखो, अब जो मैं तुमको रुपया दूँ तो उसे गुल्लक में मत डालना। उसे जो तुम्हारे मन में भाये उसमें खर्च करना। ठीक है।’ यह कह नानी ने मिनी को एक रुपया दिया और कहा, ‘जा, इससे कुछ खरीद ले।’
बाजार मिनी के घर के पास था। मिनी रुपया लेकर बाजार तरफ दौड़ पड़ी। वहाँ उसने सड़क पर खूब भीड़ देखी। सड़क पर वर्दी पहने सैनिक धुन बजाते मार्च कर रहे थे और सड़क के दोनों ओर लोग कतारबद्ध खड़े थे। मिनी ने देखा कि भीड़ में प्रायः सभी लोगों के हाथ में पुष्पगुच्छ थे। उसने सोचा कि शायद सड़क पर से किसी परी की सवारी जा रही होगी और उसको फूल भेंट करने लोग जमा हैं। फिर उसने सोचा कि हो सकता है कि कोई राजकुमार जिसकी कहानी नानी बताती थी वही जा रहा हो। इस तरह के अनेक विचार उसके मन में उठे। वह वहाँ से दौड़ पड़ी और फूलवाले के पास के पास जाकर उसने नानी का दिया रुपया दिखाकर कहा, ‘ क्या वह उसे एक रुपये में फूल का गुच्छा दे सकेगा?’
भूपेन्द्र कुमार दवे
फूलवाले ने मुस्कुराकर कहा, ‘बेटा, इस एक रुपये में तो मैं एक गुलाब का फूल ही दे सकूँगा।’
मिनी ने कहा, ‘ठीक है,’ और वह एक गुलाब का फूल लेकर भीड़ की तरफ दौड़ी। परन्तु भीड़ में उसे अंदर जाने नहीं मिल रहा था। तभी एक जवान सैनिक की नजर उस पर पड़ी। वह दूसरी तरफ से भीड़ चीरता मिनी के पास आया और मिनी को गोद में उठाकर अपने साथ ले वहाँ ले चला जहाँ सैनिकों मार्च करते बढ़ रहे थे और उनके पीछे एक फूलों से ढकी तोपगाड़ी जा रही थी। वह सैनिक उसे तोपगाड़ी के पास ले गया। अचानक बैंड़ की धुन बंद हो गई और मार्च करते सैनिक रुक गये।  जवान ने गोदी से उतारकर मिनी को तोपगाड़ी के पायदान पर खड़ा कर दिया। मिनी ने तुरंत उस तोपगाड़ी के फूलों के ढ़ेर पर अपना गुलाब का फूल रख दिया। सब सैनिकों ने मिनी को सलाम किया और उनकी देखा-सीखी में मिनी ने भी तोपगाड़ी के पायदान पर ही खड़े रहकर अपना नन्हा-सा हाथ उठाकर सलाम किया। तभी बैड़ की धुन पुनः बज उठी।
जवान ने आगे बढ़कर मिनी को फिर से गोदी पर उठा लिया और सड़क किनारे उतार दिया। मिनी ने देखा कि जवान की आँखें गीली हो उठीं थी। मिनी ने अपनी नन्ही-सी हथेली से उस जवान के आँसू पोंछे। पास खड़ी भीड़ के लोगों में से किसी ने मिनी की पीठ थपथपाई तो किसी ने उसे गोदी में उठाकर उसके गालों पर चुम्मी दी। मिनी खुषी से दौड़ती अपने घर तरफ जाने लगी। तभी फूल की दुकानवाले ने उसे बुलाया और कहा, ‘बिटिया रानी! तूने तो मेरे दिये फूल की बहुत शान बढ़ाई है। यह अपना दिया रुपया वापस ले।’
मिनी ने घर आकर नानी को सारी किस्सा बताई, तो नानी ने कहा, ‘मिनी बिटिया, जानती है तूने क्या किया? तूने वह गुलाब का फूल एक शहीद को भेंट किया है। मेरे दिये एक रुपये का तूने सम्मान किया है। मैं इस बात पर तुम्हें एक रुपया और देती हूँ।’
तब मिनी ने अपने नन्ही-सी हथेली खोलकर नानी को बताया, ‘नानी, वो फूलवाले ने भी मुझे बुलाकर मेरा रुपया वापस दिया और कहा कि मैंने उसके दिये फूल की शान बढ़ाई है, इसलिये वह रुपया वापस दे रहा है। मैंने वह रुपया ले लिया। ठीक किया ना, नानी।’
‘मेरी प्यारी बच्ची,’ नानी ने मिनी को गोदी में उठाकर कहा, ‘तू पैसे का अच्छा उपयोग करना जानती है, इसलिये ही फूलवाले ने तुझे वह रुपया वापस किया है।’

यह रचना भूपेन्द्र कुमार दवे जी की है . आप मघ्यप्रदेश विद्युत मंडल से संबद्ध रहे है . आपकी कुछ कविताएँ व कहानियां आकाशवाणी से भी प्रसारित हो चुकी है .  "बंद दरवाजे और अन्य कहानियाँ,"  "बूँद बूँद आँसू'  आदि आपकी प्रकाशित कृतियाँ है . 

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top