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दीया तले अंधेरा / विचार मंथन

मनोज सिंह 
एक प्रतिष्ठित मैनेजमेंट संस्थान द्वारा अपने चुने हुए छात्रों को भेजे गये दाखिला संबंधी पत्र को पढ़ने पर कई बार हंसी आई थी। पत्र में कई जगह भाषा के प्रवाह की त्रुटियों के कारण दिशा-निर्देशन स्पष्ट नहीं हो पा रहा था। मगर हास्यास्पद स्थिति यह थी कि इसी पत्र में एक ही कार्य के लिए जमा किये जाने वाली फीस की राशि दो स्थानों पर भिन्न-भिन्न थी। बेशक यह त्रुटियां जाने-अनजाने में ही हुई हों, मगर यह इस बात को प्रदर्शित करता है कि दूसरों को प्रबंधन सिखाने वाले स्वयं किस हद तक अव्यवस्थित हैं। इस बात का अंदेशा कॉलेज प्रबंधन को हो न हो लेकिन यह छात्र को पूरी तरह से भ्रमित करने के लिए काफी थी। इसकी संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि छात्रों द्वारा दो भिन्न राशि जमा की जाये। हद तो तब हो गयी जब संलग्न किये जाने वाले आवश्यक दस्तावेज की सूचियां भी व्यवस्थित नहीं मिलीं। एक ऐसा संस्थान जो देश को उच्च प्रबंधक तैयार करके देने का दम भरता है, उनसे ऐसी गलतियों की उम्मीद नहीं की जा सकती। मगर यह देखकर अधिक हैरानी हुई कि उपरोक्त तथ्यात्मक अनियमितता बताने पर यह उनके लिए उतनी महत्वपूर्ण बात नहीं थी और इसे गंभीरता से लेने की बजाय बड़े सामान्य रूप में लिया गया। 
इस तरह की छोटी-बड़ी त्रुटियों से लेकर प्रबंधकीय अव्यवस्था छोटे-मोटे संस्थानों में ही नहीं, बड़े-बड़े लोकप्रिय प्रतिष्ठानों में भी आम देखी जा सकती हैं। एक और बात जो देखने योग्य है कि ये संस्थाएं कंप्यूटर एवं सूचना-तंत्र की उपयोगिता के बड़े-बड़े दावे करती नहीं थकती। यही नहीं, इनको आकर्षक स्वरूप देकर, स्वयं से जोड़कर, इनका जमकर प्रदर्शन भी किया जाता है। लेकिन इन्हीं संस्थानों में कंप्यूटर टाइपिंग का कट-पेस्ट कई बार अर्थ का अनर्थ कर देता है। इनकी वेबसाइटों को देखें तो अधिकांश पूरी तरह से व्यवस्थित एवं समयानुसार नवीनतम जानकारियों से लैस नहीं मिलेंगी। ऐसी परिस्थिति में कंप्यूटर-इंटरनेट के माध्यम से ऑन-लाइन होने के दावे खोखले साबित हो जाते हैं। और उत्तम व आधुनिक कहलाने की सारी कवायद व्यर्थ हो जाती है। इस तरह के उदाहरण, सरकारी संस्थानों, यहां तक कि प्रमुख मंत्रालयों के वेबसाइटों पर भी आम देखे जा सकते हैं। जहां मंत्रियों के बदल जाने पर भी वेबसाइट्स से उनका स्थानांतरण नहीं होता। नये मंत्री इस तथ्य से अनजान होते होंगे, वरना नाम और प्रचार के लिए सदा तत्पर रहने वाले राजनेता इसे किस रूप में लेंगे, यह मनोविज्ञानी के लिए मनोरंजन से भरा विषय हो सकता है। लालफीताशाही, अकर्मण्यता, लेटलतीफी और न जाने ऐसे कितने ही विश्लेषणों से सुसज्जित सरकारी कार्यालय में ऐसा पाया जाने पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। मगर चुस्त-दुरुस्त, संवेदनशील, त्रुटि-रहित एवं स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का दम भरने वाले तथाकथित प्राइवेट संस्थानों में यह शोभा नहीं देता। और तो और जहां पर इनका नाम-यश और इनकी गौरव-गाथा उनकी गुणवत्ता, कर्मठता और त्वरित कार्य करने की शैली पर ही निर्मित की गयी हो, ऐसा मिलने पर असहनीय की हद तक अस्वीकार्य हो जाता है। मैनेजमेंट की संस्थाओं में इस तरह की त्रुटियां अधिक कष्टप्रद होती हैं। ये अविश्वसनीय बात लगती है मगर मिस मैनेजमेंट यहां का एक सच है। 
छोटी-छोटी गलतियां जिन पर अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया जाये तो यही आदत किसी समय बड़ा रूप भी ले सकती हैं। जिसके परिणाम के बारे में कल्पना करना आसान नहीं। मगर फिर भी हम गलतियां करने के आदी हैं और अपनी कमजोरी को छिपाने का बहाना ढूंढ़ ही लेते हैं। हम गलतियों से सबक नहीं लेते। यही कारण है जो एक राज्य से संबंधित चित्र दूसरे राज्यों के विज्ञापन में छाप दिये जाते हैं। संभावित सर्वाधिक खूंखार आतंकवादियों की सूची में से कुछ महत्वपूर्ण नाम गायब हो जाते हैं तो कुछ अनावश्यक नये नाम जुड़ जाते हैं। ये उदाहरण पढ़-सुनकर अटपटा लगता है। जब नौकरशाहों की पूरी फौज बैठी हो इसके बावजूद इस तरह की गलतियां हों तो आम आदमी का गुस्सा जायज है। बैंक के खातों में से किसी दूसरे के द्वारा पैसे निकालने की संभावना चाहे कम हो लेकिन ऐसा होने पर उसे हम मानव-मशीन के तालमेल या भूल घोषित कर बचने का प्रयास करते हैं। मगर उनसे पूछिये जिनकी खून-पसीने की कमाई मिनटों में गायब हो गयी थी और इसे वापस पाने के लिए उन्हें महीनों अतिरिक्त पसीना बहाना पड़ा था। कैसा लगता होगा? ऐसे और भी कई उदाहरण देखे और सुने जा सकते हैं लेकिन शिक्षक शिक्षण-प्रशिक्षण के दौरान स्वयं त्रुटियां करे तो छात्रों की मनःस्थिति को समझ पाना आसान नहीं। विज्ञान का अध्यापक अगर व्याकरण की गलती करता है तो उसे एक बार नजरअंदाज भी किया जा सकता है। लेकिन भाषा का आचार्य बोलने या लिखने में शब्दों का गलत इस्तेमाल करे तो यह न केवल अस्वीकार्य होगा बल्कि अटपटा भी लगता है। ऐसा गुरु क्या शिष्यों के बीच आदरणीय हो सकता है? ऐसी शिक्षण संस्थाएं इस रूप में अधिक घातक हैं जो कमजोर नींव वाले छात्रों की पौध उत्पन्न करने में सहायक सिद्ध हो रही हैं। हम यह क्यों भूल जाते हैं कि डॉक्टर की एक छोटी-सी चूक से मरीज की जान भी जा सकती है। शारीरिक रूप से घायल व्यक्ति अपंग हो सकता है। चूक तो आखिर चूक है, गलत इंजेक्शन लग जाने से, गलत दवाई खा लेने से शरीर पर स्थायी रूप से गलत असर भी पड़ सकता है। न्याय प्रक्रिया की एक छोटी-सी भूल से आदमी को बेवजह सजा हो सकती है तो महीनों की सजा सालों में भी बदल सकती है। यही क्यों, परिणाम उलटा भी तो हो सकता है! और अपराधी खुले में घूम सकते हैं। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं जहां परीक्षाफल में होनहार छात्र अचानक किसी विषय में सामान्य से भी कम अंक लेकर हैरान-परेशान होते देखे जा सकते हैं। कम अंक पाने वालों में सबकी इतनी हिम्मत कहां कि अपनी उत्तर-पुस्तिका को पुनः जांच के लिए भेज दें और फिर जांचने वाला अपनी गलती कभी मानेगा? नहीं, तभी तो कम ही मौकों पर नंबर बढ़ पाते हैं। हां, कइयों को अपनी संभावना से अधिक अंक प्राप्त होने पर कुछ पल के लिए आश्चर्य जरूर होता होगा। मगर नालायक छात्र अपनी अचानक मिली काबिलियत के झूठे प्रमाण को भी प्रदर्शित करने से बाज नहीं आता। और लोगों में भी यह शंका पैदा करवा देता है कि वह पढ़ने में वास्तव में अति उत्तम था। और उसे बेवजह जाने-अनजाने ही कमतर आंका जा रहा था। मुश्किल इस बात की है कि इसी त्रुटिपूर्ण परीक्षा प्रणाली से नौकरशाह, डॉक्टर और इंजीनियर आदि चुने जाते हैं, जिसके परिणाम कितने दूरगामी और भयानक हो सकते हैं? बस इसका हमें अंदाजा नहीं।
ये त्रुटियां कई तरह का खेल खिलवा सकती हैं। रेलवे स्टेशन पहुंचने पर आपका नाम आरक्षण की सूची से गायब भी हो सकता है। पूछने पर और कुछ नहीं तो पहले मानवीय-त्रुटि और अब कंप्यूटर में गड़बड़ी तो बहाना है ही, वरना आने-जाने की भागदौड़ में अमूमन कौन पूछताछ कर पाता है। किसी भी तरह ट्रेन में चढ़कर, सफर के खत्म होते ही हम घर की ओर तुरंत रवाना होकर सब भूल जाते हैं। मगर ड्राइवर या सिगनल-मैन की छोटी-सी भूल सैकड़ों की जान ले सकती है। एक जरा-सी त्रुटि मिसाइल प्रक्षेपण को खाक में मिला सकती है परिणामस्वरूप अरबों रुपया मिनटों में समुद्र में स्वाहा हो सकता है। एक शून्य संख्या के अंत में लग जाये तो अंकगणित बिगाड़ सकता है। जीवित और मृत्यु प्रमाणपत्र में नाम गलत छप जाने पर जिंदा आदमी मृत घोषित किया जा सकता है। मुश्किल क्या है, जीवन-बीमा से लाखों रुपये बिना मरे वसूले जा सकते हैं। सफल लोकतंत्र का दम भरने वाला यह देश आम आदमी की छोड़ो, शहर के प्रतिष्ठित व्यक्ति का नाम भी वोटर-लिस्ट से गायब करवा सकता है। मीडिया में किसी की इज्जत मिनटों में उतारी जा सकती है फिर चाहे वो बाद में आधारहीन व झूठी खबर ही क्यूं न साबित हो। ऐसा करने वाले एंकरों के अहम्‌ को रोज पर्दे पर पढ़ा जा सकता है। ये प्रश्न पूछने के दौरान अनावश्यक आक्रामक और सामने वाले को घेरने का पहले से मन बनाकर कार्यक्रम रखते हैं। ऊपर से तुर्रा कि बहस के दौरान गलत सिद्ध हो जाने पर भी चेहरे पर शिकन नहीं आती।
एक बात तो सत्य है, हिन्दुस्तान में हमने अंग्रेजों से कुछ और सीखा हो या नहीं, लेकिन ऐसा कुछ होने पर एक शब्द बहुत मजबूती और गहराई से सीख लिया है। जिसका उपयोग सड़क पर चल रहे अनपढ़ से लेकर शीर्ष पर बैठे लोग भी आजकल आम करते हैं, और वो है 'सॉरी'।
 
  
यह लेख मनोज सिंह द्वारा लिखा गया है.आप ,कवि ,कहानीकार ,उपन्यासकार एवं स्तंभकार के रूप में प्रसिद्ध है .आपकी 'चंद्रिकोत्त्सव ,बंधन ,कशमकश और 'व्यक्तित्व का प्रभावआदि पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है .
 

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