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रणजीत कुमार
हर बीज़ के मर मिटने का सवब
अंकुर की गाथा होती है
एक अरण्य की उज्जवल भविष्य
उस तुच्छ बीज़ में सोती है
जब मौन शब्द पा जाता है
और भावों को मिलती है उड़ान
जब कोयले की कालिख परे
हो प्रकट हीरों की खान
जब अंदर की संगीत नाद
हर ले बाहर का कोलाहल
जब वर्तमान की बेदी पर
सूरज की रौशनी पड़े प्रबल
मैं उस सूरज की सत्ता का एक मात्र पुजारी हूँ
जो परिवर्तन का नींव रखे वैसा मैं क्रांतिकारी हूँ

यह कविता रणजीत कुमार मिश्र द्वारा लिखी गयी है। आप एक शोध छात्र है। इनका कार्य विज्ञान के क्षेत्र में है ,साहित्य के क्षेत्र में इनकी अभिरुचि बचनपन से ही रही है . आपका उद्देश्य हिंदी व अंग्रेजी लेखनी के माध्यम से अपने भाव और अनुभवों को सामाजिक हित के लिए कलमबद्ध करना है।

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