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मनोज सिंह
भारतीय राजनीतिज्ञों के बीच श्वेत वस्त्र का प्रचलन है। यह इतनी सख्ती से प्रयोग में लाया जाता है कि इसे स्कूल की यूनिफार्म की तरह अनिवार्य ड्रेस भी घोषित किया जा सकता है। इसे न पहनने पर दंड-स्वरूप राजनीति से निकाला भी जा सकता है। या यूं कह लें कि राजनीति में प्रवेश ही नहीं मिलेगा और अगर किसी तरह घुस भी गये तो पहचाना ही नहीं जायेगा। हां, क्षेत्र के अनुसार पहनावे में फर्क हो सकता है। दक्षिण भारत में सफेद धोती (लुंगी की तरह पहनी हुई)  के साथ कमीज तो उत्तर भारत में आमतौर पर सफेद कुर्ता-पायजामा। सफेद धोती (उत्तर भारतीय शैली) का प्रचलन जरूर नयी पीढ़ी में तेजी से लुप्त होता चला जा रहा है। ठीक उसी तरह से जैसे कि सफेद टोपी सिर से गायब हो रही है। इतने आधुनिकीकरण के बावजूद अपवाद स्वरूप भी श्वेत की जगह कोई दूसरे रंग का वस्त्र पहने हुए भारतीय राजनीतिज्ञों का मिलना आसान नहीं। जो एक-दो राजनीतिज्ञ इस परंपरा से हटकर चलने की कोशिश भी करते हैं तो या तो वो लंबी पारी नहीं खेल पाते या फिर महत्वपूर्ण नहीं हो सकते। शायद तभी हमारे कुछ शौकीन आधुनिक राजनीतिज्ञ जब विदेश जाकर जींस-टी-शर्ट या सूट पहनते हैं तब उन्हें पहचान पाना मुश्किल होता है और उनकी छपी हुई फोटो देखकर यकीन नहीं होता। अवाम के मस्तिष्क में विचर रही विचारधारा में श्वेत वस्त्र इतने गहरे तक अंकित है कि आम जनता भी इन फोटों पर दसियों बातें करने लगती है। श्वेत वस्त्र का टोटका इतना प्रभावी है कि कुर्ता-पायजामा और धोती में असहज महसूस करने वाले कुछ राजनेता सफेद पेंट-शर्ट से काम चलाते हैं। महिला राजनीतिज्ञ इस मामले में खुश-किस्मत है जिन्हें वस्त्र के रंग को लेकर किसी परंपरा का पालन नहीं करना पड़ता। हां, ठंड में पुरुष राजनीतिज्ञ भी मौसम का फायदा उठाकर रंग-बिरंगे सूट-बूट पहन लेते हैं। बहरहाल, यह एक इतना आवश्यक पैमाना है कि अच्छे-अच्छे अरबपति और करोड़ों खर्च करने वाले शौकीनों को भी भारतीय राजनीति में प्रवेश करते ही श्वेत वस्त्र धारण करना पड़ता है। इस सफेदी के पीछे क्या राज है? कौतूहलता का जागना स्वाभाविक है। कहीं यह किसी और रंग को छिपाने का प्रयोजन तो नहीं? कहीं ये कुछ विशेष दिखाने का प्रयास तो नहीं?
यह परंपरा प्रचलन में सख्ती से कब से लागू हुई? शोध का विषय हो सकता है। सीधे-सीधे गांधीजी के दर्शन को इसके लिए प्रमुख कारक घोषित कर देना ठीक नहीं होगा। हां, खादी के लिए बहुत हद तक वे जिम्मेदार हो सकते हैं। वरना वे स्वयं तो आधे-अधुरे कपड़े से ही काम चलाया करते थे। इसे राजनीतिक नेतृत्व को सामाजिक रूप से अवाम के रंग-ढंग में ढलने की प्रक्रिया के रूप में लिया जाना चाहिए। कहीं ऐसा ही कोई मनोवैज्ञानिक पक्ष सफेद वस्त्र के साथ भी तो नहीं जुड़ा हुआ? हो सकता है। मगर यह मात्र सांकेतिक है या फिर वास्तविक, गहन अध्ययन का विषय है। यूं तो मूल रूप से कपड़ा सफेद ही बनता रहा है और पूर्व में अन्य रंगों में रंगाई इतनी आसान नहीं थी। अर्थात सफेद वस्त्र सस्ते होते थे। तो कहीं राजनीति में श्वेत वस्त्र सस्ते का द्योतक तो नहीं? प्रारंभिक काल में यह सच भी हो सकता है। रंगीन कपड़े तब महंगे हुआ करते थे और सामान्यजन सफेद कपड़ों से ही काम चलाया करते थे। आज भी लट्ठे में खरीदे गये सफेद कपड़े के दाम कम ही होते हैं। अर्थात उपरोक्त अनुमान गलत नहीं। कम से कम खर्चें में जीवन-निर्वाह की परंपरा का पालन, राजनीति में राष्ट्र एवं समाज को समर्पित कार्यकर्ताओं के लिए सैद्धांतिक रूप से आवश्यक-सा हो जाता है। लेकिन आधुनिक काल में सस्ते की इस भावना को राजनेताओं के साथ मूल रूप से जोड़ देना थोड़ा अटपटा लगता है। हां, राजनीतिज्ञों द्वारा सस्ते के प्रदर्शन की कोशिश का जारी रहना स्वाभाविक है। लेकिन मुश्किल इस बात की है कि यह सांकेतिक स्तर तक ही ठीक है, अन्यथा जनता सब जानती है। वैसे भी आज पहने जाने वाले सफेद वस्त्र इतने विशिष्ट और महंगे होते हैं कि यकीन करना मुश्किल हो जाए। एक और बात, आज के समय में बिना कैमरे के नेतागिरी तो चल नहीं सकती और फिर मीडिया की चमचमाती लाइटों के सामने कोई गंदा कपड़ा तो पहनेगा भी नहीं। वैसे भी डिटेरजेंट पाउडरों के विज्ञापन भारत के टीवी चैनलों पर सर्वाधिक दिखाये जाते हैं। ऐसे में किसी तरह के दाग या धब्बे सफेद कपड़ों पर कोई कैसे बर्दाश्त कर सकता है। अब चूंकि नेताजी को एक ही दिन में कई स्थानों पर जाना पड़ता है और सफेद रंग पर धूल भी जल्दी गंदा कर देती है तो फिर वस्त्रों के कई जोड़े बनवाकर रखने पड़ते होंगे। यकीनन बड़े और व्यस्त नेताओं के साथ इसका भी एक मैनेजमेंट साथ चलता होगा और अचूक व्यवस्था के लिए बड़ी-बड़ी संस्थाओं से पढ़े हुए मैनेजमेंट एक्सपर्ट की पूरी टीम हुआ करती होगी। इस पर विस्तृत जानकारी जरूर ली जानी चाहिए। यह एक रोचक सामग्री हाे सकती है। हमेशा चमचमाती सफेदी के साथ कड़क इस्तिरी वाले वस्त्र की उपलब्धता के लिए नेताजी की टीम क्या करती है? पता लगाया जाना चाहिए। बहरहाल, सिलाई करने वाले दर्जी की चांदी रहती होगी। अब क्या किया जाये, चांदी का रंग भी सफेद ही होता है।
विश्व में इस तरह की परंपरा या विशिष्ट वस्त्र का प्रचलन और अलग पहचान क्या कहीं और भी है? सरसरी नजर में तो कहीं दिखाई नहीं देता। दूसरे देशों में ज्यादातर राजनेता स्थानीय पारंपरिक वस्त्र धारण करते हैं जिसमें पश्चिम का काला सूट भी शामिल है। सवाल उठता है कि तो सिर्फ हमारे भारतीय राजनीतिज्ञों ने इस प्रचलन को क्यों बरकरार रखा? इस पर विचार किया जाना चाहिए। यूं तो श्वेत रंग स्वच्छता एवं शांति का प्रतीक है। तो कहीं इन भावनाओं के प्रदर्शन की मानसिकता तो हम नहीं पाले बैठे हैं? श्वेत रंग के साथ त्याग शब्द भी जोड़ा जा सकता है। तो कहीं ये त्याग की मूर्ति बनने का प्रयास तो नहीं? हो सकता है। मगर फिर सवाल उठता है कि जो हम हैं उसे दिखाने की आवश्यकता क्यों? प्रदर्शित तो वो किया जाता है जो हम होते नहीं। उफ! ये शब्द भी अंदर की बात बड़ी आसानी से कह जाते हैं। इन्हें न तो शर्म आती है, न ही डर लगता है। वरना पढ़े-लिखे तो इस प्रयास में होते हैं कि ऐसी भावना जुबान पर न आये। बहरहाल, अब दुनिया में आये हैं तो समाज में दिखावा तो करना ही पड़ेगा। अब क्या किया जाए। बिना दिखावे के काम भी नहीं चलता। और दिखावा न किया जाये तो कोई पूछता भी नहीं है। ऐसे में एक सवाल मन-मस्तिष्क में उठता है कि आखिर दिखावा करके हम क्या दिखाना चाहते हैं? समाज को किस ओर ले जाना चाहते हैं? शायद इसका उत्तर सीधे-सीधे देना संभव नहीं। बहरहाल, आज के आधुनिक युग में पहचान बरकरार रखना ज्यादा मुश्किल है। शायद तभी आज राजनीतिज्ञों को श्वेत वस्त्र की अधिक आवश्यकता है। मन में एक और विचार कौंधता है, धर्म क्षेत्र में गेरुआ रंग पहनने वाले इस देश में श्वेत वस्त्र ही चुनना कहीं अपने आप को धर्मनिरपेक्ष घोषित करने का प्रयास तो नहीं? यूं तो श्वेत रंग के साथ और भी कई वर्ग समाज में मिल जाएंगे। विशेष रूप से पुलिस और सेना में। मगर वहां आपस में समानता का भाव और आमजन से अलग दिखने का प्रयास अधिक होता हैं। लेकिन यहां समानता की भावना दिखाई नहीं देती है। और फिर क्या जनता से अलग पहचान बनाकर यहां रहा जा सकता है? इन्हीं प्रश्नों के अंदर सब छिपा है फिर कहने को चाहे जो कहा जाये। 
उपरोक्त कारणों से यह राजनीतिज्ञों की योग्यता में शामिल हो गया है। प्रथम योग्यता। चूंकि इसके अतिरिक्त कोई और अनिवार्य योग्यता होना दिखाई भी नहीं देता। कोई भी व्यक्ति किसी भी उम्र, धर्म, जाति, वर्ग, पढ़ा-लिखा, अनपढ़, छोटे से छोटा, बड़े से बड़ा, सफेद वस्त्र धारण करते ही नेताजी कहलाने का हकदार हो जाता है। आम जीवन में भी श्वेत वस्त्र धारण करते ही यार-दोस्तों पारिवारिक सदस्यों के कमेंट्स आ जाते हैं कि क्या बात है नेताजी लग रहे हो। फिर चाहे कॉलेज में छात्र यूनियन का चुनाव हो या नगर निगम के वार्ड से लेकर लोकसभा के सदस्य का चुनाव। हर जगह श्वेत वस्त्र का कमाल देखा जा सकता है। इसको पहनते ही नेतागिरी के भाव अपने आप जाग जाते हैं। क्या यह सब सच नहीं? आज के युग में राजनीतिज्ञों ने अपने वस्त्रों को आधुनिक डिटेरजेंट की सफेदी से भी अधिक सफेद दिखाने की कोशिश की है। पता नहीं ये इसके पीछे क्या छुपाने की मंशा रखते हैं?
 
यह लेख मनोज सिंह द्वारा लिखा गया है.मनोजसिंह ,कवि ,कहानीकार ,उपन्यासकार एवं स्तंभकार के रूप में प्रसिद्ध है .आपकी'चंद्रिकोत्त्सव ,बंधन ,कशमकश और 'व्यक्तित्व का प्रभाव' आदि पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है.

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