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मनोज सिंह

एक स्थापित एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की उपभोक्ता कंपनी के राज्यस्तरीय मुख्य अधिकारी से बातचीत के दौरान ये तथ्य अनायास ही उभरकर सामने आये थे। एक महंगे रोस्टोरेंट में कंपनी ने सालाना पार्टी का आयोजन किया था। उसमें सभी वरिष्ठ अधिकारियों को परिवार सहित आमंत्रित किया गया था। इसमें कुछ एक बात प्रमुखता से उभरी थी जिसने उपरोक्त अधिकारी को सोचने के लिए मजबूर किया था। पार्टी में आने वाली महिला अधिकारियों में अविवाहित या तलाकशुदा का प्रतिशत अधिक था। इनमें से एक-दो अपने मित्र तो कुछ एक अपने माता-पिता के साथ उपस्थित थीं। आश्चर्य तो इस बात पर अधिक हुआ था कि शादीशुदा महिलाएं भी तकरीबन अकेली ही आई थीं। बच्चों व पति के साथ उपस्थिति नगण्य थीं। बहरहाल, पार्टी के दौरान कुछेक महिला अधिकारियों ने मदिरा का इस हद तक सेवन कर लिया कि उन्हें घर तक सुरक्षित छोड़ने की नौबत आ गई थी। और तो और ठंड के मौसम में, देर रात तक चलने वाली पार्टी के लिए पहने हुए वस्त्रों से कहीं से भी लग नहीं रहा था कि खाना-पीना उत्तर भारत में हिमाचल के नजदीक खुले बगीचे में चल रहा है।
यह महज एक संयोग भी हो सकता है। हो सकता है उपरोक्त पार्टी का चित्रण कई स्वतंत्र महिलाओं को पसंद न आए। नारी विकास की कहानी के प्रवाह में बह रहे आज के समाज में इस तरह की बातें करना आत्मघाती भी हो सकती है। और तो और युगों से पुरुष के जुल्मों की शिकार रहीं, आज भी समाज के स्थापित मापदंडों से उत्पन्न मुश्किलों का सामना हिम्मत से कर रही महिलाओं को यह बात क्रोधित भी कर सकती है। जबकि उन्हें सहानुभूति नहीं बल्कि समर्थन की आवश्यकता है। नारी समर्थक संवेदनशील व जागरूक पुरुष भी नाराज व आक्रामक हो सकते हैं। मगर एक सामान्य एवं सजग नागरिक होने के नाते किसी भी असामान्य घटना पर अपनी आंखें बंद रखना बुद्धिमत्ता नहीं। और उससे बचना तो किसी भी समस्या का समाधान नहीं। जब हम संक्रमण काल में हों और नये मार्ग में निरंतर तेजी से आगे बढ़ रहे हों तो सतर्क रहना अधिक जरूरी हो जाता है। चूंकि रास्ता अनजान है, ऐसे में हर एक वस्तु-स्थिति के साथ-साथ घटना का अवलोकन एवं विश्लेषण भी आवश्यक हो जाता है। उलटे इस पर तो खुली बहस होनी चाहिए। इस पर चर्चा की जा सकती है। उभर रहे निष्कर्ष को पसंद-नापसंद किया जा सकता है, मगर हकीकत से आंखें चुराना किसी भी तरह से उचित न होगा। नारी की अवस्था और व्यथा पर खुलकर विश्लेषण करने, बोलने मात्र से किसी पुरुष को नारी विरोधी नहीं कहा जा सकता। और जहां तक समझ जाती है वहां तक उपरोक्त अधिकारी भी नारी-विरोधी नहीं जान पड़ता। उलटे संवेदनाएं ज्यादा दिखाई दे रही थीं। वरना उपरोक्त चर्चा में उसकी चिंता उभरकर नहीं आती। मजाक, उलाहना या शरारत का कोई अंश नहीं था। और यही कारण है जो उपरोक्त परिस्थिति पर रुककर चिंतन की आवश्यकता महसूस हुई।
इसमें कोई शक नहीं कि नारी ने आदिकाल से जुल्म सहे और आज भी सहती आ रही है। उस पर सामाजिक, राजनीतिक के साथ-साथ मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से ही अत्याचार नहीं किया गया, बल्कि धार्मिक तरीके से भी तोड़ा गया, विचारों को मरोड़ा गया। उसकी सोच के साथ भी खेला गया। उसे कुछ न सोचने तक के लिए मजबूर कर दिया गया। सच पूछा जाए तो पुरुष ने हर समय हर वक्त, हरसंभव नियंत्रण में रखते हुए उसे उपभोग का सामान बनाये रखने की सफल कोशिश की। एक ऐसी मोम की सुंदर-सजीली गुड़िया, जो सुन तो सकती है, बोल नहीं सकती। देख तो सकती है मगर समझना जिसके लिए आवश्यक नहीं। जो आदमी की प्यास को बुझाने के लिए हमेशा तैयार होनी चाहिए मगर उसे खुद प्यास नहीं लगनी चाहिए। उसके साथ धोखा किया जा सकता है मगर वो किसी के साथ धोखा नहीं कर सकती। विडंबना है कि इस युग में भी महिलाओं पर अमानवीय जुल्म होते हैं। इन सबका हरसंभव विरोध ही नहीं रोक लगाने की कोशिश भी की जानी चाहिए।
विकास प्रक्रिया में आधुनिक युग के आते-आते नारी-विरोधी संकुचित सोच पर कई पुरुषों ने भी कड़े शब्दों में आपत्ति की। यहां तक कि कई बार सख्त रवैया भी अख्तियार किया और नारी स्वतंत्रता के समर्थन में खुलकर सामने आये। समाज के प्रबुद्ध व प्रगतिशील वर्ग ने भी आगे बढ़कर सहायता की। वहीं नारी ने भी स्वयं के प्रयास, पहल एवं नये-नये प्रयोग किये और इस तरह अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व बनाया। नारी वर्ग ने हर रूप में प्रगति की और आत्मनिर्भर बनी। कई क्षेत्रों में वह पुरुष से आगे भी निकल गईं। मगर उसकी यात्रा अभी जारी है। लेकिन यहां सवाल दूसरा है कि नारी ने जो विकास किया है, जिस दिशा और मार्ग पर वह आगे बढ़ी है, वे उसके स्वयं के साथ-साथ समाज के लिए कितने हितकारी हैं? कितने लाभदायी हैं? कितने शुभ और फलदायी हैं? सवाल यह भी उठता है कि विकास का सकारात्मक पक्ष क्या है? और वह भी किस कीमत पर? यहां सामाजिक मंथन करने पर, किसी पुरुष को, पुरुष होने मात्र से उसका दुश्मन घोषित नहीं किया जा सकता। पुरुष उसका हमसफर, हमराही, हमराज, हमदम भी हो सकता है। एक पक्का शुभचिंतक।
कोई कह सकता है कि किसी महिला द्वारा स्वतंत्र रूप से मदिरा का सेवन करना और बिना परिभाषा के शारीरिक संबंध स्थापित करने में पुरुष समाज को क्या तकलीफ होती है? यह भी एक तरह से उसे नियंत्रण में करने का एक कुटिल तरीका कहा जा सकता है। यही काम पुरुष भी तो करते हैं, यह तर्क भी दिया जा सकता है। मगर किसी भी सामान्य, सरल व समझदार परिवार से पूछें कि उनके सपूत के द्वारा भी इस तरह का जीवन जीना क्या उन्हें पसंद आएगा? कोई भी जिम्मेदार मां-बाप अपने लाड़ले पुत्र को देर रात शराब के नशे में धुत होकर सड़कों और पार्टियों में झूमता हुआ देख खुश नहीं होते। तो फिर एक पुत्री का यह रूप किसे पसंद आ सकता है? आम माता-पिता अपने लड़के की अच्छी से अच्छी नौकरी लगने के बाद भी तब तक संतुष्ट व शांत होकर नहीं बैठ पाते जब तक वह शादी करके पूरी तरह से अपना परिवार नहीं बसा लेता। फिर एक लड़की एवं महिला के साथ इस तरह की अवस्था परिवार व समाज में किस प्रकार स्वीकार की जा सकती है? सच तो यह है कि कोई भी संवेदनशील अभिभावक अपने बच्चे की उच्छृंखलता को पसंद नहीं करता, उसकी गलत राह को स्वीकार नहीं करता। कहने को तो कुछ लोग यह भी कह सकते हैं कि इस तरह की महिलाओं की संख्या प्रतिशत में बहुत कम है। सत्य हो सकता है, मगर जिस तीव्र गति से यह संख्या बढ़ रही है वो चिंताजनक है। और इससे अधिक चिंता की बात है कि इसका महानगर से निकलकर छोटे-छोटे कस्बों में दिखाई देना।
इसमें कोई शक नहीं कि कई राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्ष एवं बड़ी-बड़ी कंपनियों की मुख्य अधिकारी के रूप में ही नहीं, प्रशासन, कला, विज्ञान व वाणिज्य के क्षेत्र में भी महिलाएं नये-नये कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। महिलाएं पुरुषों से प्रतिस्पर्धा करने में भी नहीं हिचकिचा रही हैं। उसका आत्मविश्वास पहले से अधिक बढ़ा है तो वहीं व्यक्तित्व में भी निखार आया है। वह आज यकीनन अपनी बहुमुखी प्रतिभा का प्रदर्शन करने में सफल रही है लेकिन इसके साथ ही फिल्म व विज्ञापन में उनकी वास्तविक स्थिति को देखकर दुःख होता है। आज भी वो यहां एक उपभोग की वस्तु के रूप में ही प्रस्तुत की जाती है। उसका सौंदर्य, मांसलता, उसकी सेक्स अपील, नग्नता बेची जाती है। यहां कला से उसका कोई सरोकार नहीं होता। भारतीय फिल्म इंडस्ट्री को ही देख लें, कोई जमाना था, जब कई महिला कलाकार सशक्त अभिनेत्री के रूप में उपस्थित थीं और अकेले अपने कंधे पर फिल्म चलाया करती थीं। जबकि वो पुरुष प्रधान समाज था। आज स्थिति बदल चुकी है। अधिकांश नायिकाएं लाखों-करोड़ों में खेलती जरूर हैं लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि सिवाय शो-पीस के कुछ नहीं रह गईं। उन्हें कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं, अभिनय की जरूरत नहीं, असल में कुछ करने को फिल्म व विज्ञापन में होता ही नहीं। अधिकांश जगह तो उन्हें सिर्फ सौंदर्य को प्रदर्शित करना आना चाहिए। विज्ञापनों में उपभोक्ता सामग्री की जगह अपना देह-प्रदर्शन कर सकती हैं। इतने मात्र से वह नाम भी कमा सकती हैं और दाम भी। यह सफल महिलाएं जब युवाओं में एक रोल-मॉडल के रूप में स्थापित हो जाती हैं तो यह एक सोचने का विषय बन जाता है। इस नये समीकरण और विकास को क्या कहेंगे? बड़ी अजीबोगरीब स्थिति हो चुकी है। 
विकास अपने साथ मुश्किलें भी लाता है। हर सुख के साथ दुःख आता है। नयी सामाजिक व्यवस्था की भी अपनी मुश्किलें होंगी। यह कई रूप में कई दिशा से कई स्तर पर आएगी। नारी के सिर्फ आर्थिक स्तर पर स्वतंत्र हो जाने से ही काम नहीं चलेगा। निम्न आय वर्ग की महिलाएं तक मजदूरी में दिनभर खटकर चंद जरूरी रुपये कमा लेती हैं, कई बार पूरा परिवार अपने कंधे पर ढोती है, मगर सही मायनों में कभी स्वतंत्र नहीं हो पातीं। उसकी इस व्यक्तिगत दयनीय दशा एवं पारिवारिक दुर्दशा पर क्या कहें? असल में सामाजिक सोच को बदलना होगा। व्यावहारिक शिक्षा की अधिक आवश्यकता है। वरना हम देख ही रहे हैं कि नारी को अपने नये स्वरूप में और बड़ी मुश्किलों का सामना करना होगा। नयी व्यवस्था में नये जमाने के नये-नये सरोकार होंगे। यही नहीं, हमें संबंधों को नये रूप से नये ढंग से परिभाषित करना होगा। आधुनिक युग में विभिन्न कारणों से समाज की संरचना बदलेगी। उदाहरणार्थ पारंपरिक शादी लव-मैरिज से निकलकर लिव-इन-रिलेशनशिप तक पहुंच चुकी है। यह विकास की एक लंबी व अंतहीन प्रक्रिया हो सकती हैं। इसे आधुनिक जीवन की हकीकत कहा जा सकता है। ठीक है, मगर एक व्यक्ति के रूप में देखें तो यह हमें अकेलेपन की ओर धकेलती है। जैसे कि संयुक्त परिवार से एकल परिवार तक तो फिर भी ठीक था मगर वहां से निकलकर एक अकेला व्यक्ति, क्या यह उचित है? सामाजिक ही नहीं प्राकृतिक रूप से भी देखें तो हर एक को एक साथी व मानवीय संबंध की आवश्यकता होती है। क्या आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में हम इस मूलभूत आवश्यकता से दूर नहीं भाग रहे? माना कि हर रास्ते में, हर मोड़ पर, नयी-नयी तरह की मुश्किलें आती हैं और इसे स्वीकार भी किया जाना चाहिए। मगर यह देखना होगा कि यह हमें किस कीमत पर प्राप्त हो रही है? कहीं विकास के नाम पर हमारा नुकसान तो नहीं हो रहा? कहीं हमारे कदम गलत दिशा की ओर तो नहीं जा रहे? कहीं ऐसे मोड़ पर तो नहीं मुड़ गए जहां आगे सुनसान रास्ता हो, लूटपाट होती हो, कोई सराय न हो, कोई मंजिल न हो, कोई साथी न हो? ऐसे रास्ते में अकेले बढ़ने से क्या फायदा? इसे मूर्खता ही कहेंगे।
 

 


यह लेख मनोज सिंह द्वारा लिखा गया है.मनोजसिंह ,कवि ,कहानीकार ,उपन्यासकार एवं स्तंभकार के रूप में प्रसिद्ध है .आपकी'चंद्रिकोत्त्सव ,बंधन ,कशमकश और 'व्यक्तित्व का प्रभाव' आदि पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है.

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