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मीर तक़ी'मीर'
आए हैं मीर मुँह को बनाए जफ़ा से आज
शायद बिगड़ गयी है उस बेवफा से आज

जीने में इख्तियार नहीं वरना हमनशीं
हम चाहते हैं मौत तो अपने खुदा से आज

साक़ी टुक एक मौसम-ए-गुल की तरफ़ भी देख
टपका पड़े है रंग चमन में हवा से आज

था जी में उससे मिलिए तो क्या क्या न कहिये 'मीर'
पर कुछ कहा गया न ग़म-ए-दिल हया से आज

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  1. mir bando se kaam kab nikla hai,
    jo maangna hai khuda se maang.

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  2. jane kis baat ki saza mujhko saja dete h, meri hasti hui aankho ko rula dte h, ek muddat se v khabar nhi tery, kya is tarah bhi apne dost ko bhula dete h.............(ahmad ajij)

    उत्तर देंहटाएं

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