0
Advertisement
रणजीत कुमार
पत्थर ही सही  मैं तेरी नज़र में
कठोर हूँ मैं, भावना मेरे पावन ही है
जो एक अन्धकार  छाया है अंतर्मन में कहीं
कुछ और नहीं क्षणिक एक ग्रहण ही है
देखना जल्द ही मिटेगी जो ये दूरी है
हर एक घटना कुछ नया सीखाती है
माना तुम्हारे नज़र में ये मजबूरी है
प्रेम सपनो से परे मूर्त रूप लेता जब
हर क्षण इक एहसास  नया देता तब
साथ चलना हो तो झिझक न कोई मन में हो
उड़ने के लिए  पंखों को तो फैलाना है
अगर सिकुड़ के ही जीने की ठानी तुमने है
पत्थर होना मेरा महज एक बहाना है ........ 
 

यह रचना रणजीत कुमार मिश्र द्वारा लिखी गयी है। आप एक शोध छात्र है। इनका कार्य, विज्ञान के क्षेत्र में है . साहित्य के क्षेत्र में इनकी अभिरुचि बचनपन से ही रही है . आपका उद्देश्य हिंदी व अंग्रेजी लेखनी के माध्यम से अपने भाव और अनुभवों को सामाजिक हित के लिए कलमबद्ध करना है।

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top