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फैज़ अहमद फैज़
इस वक़्त तो यूँ लगता है अब कुछ भी नहीं है
महताब न सूरज न अँधेरा न सवेरा

 
आँखों के दरीचे में किसी हुस्न की झलकन
और दिल की पनाहों में किसी दर्द का डेरा


मुमकिन है कोई वहम हो मुमकिन है सुना हो
गलियों में किसी चाप का एक आख़िरी फेरा


शाख़ों में ख़यालों के घने पेड़ की शायद
अब आके करेगा न कोई ख़्वाब बसेरा


इक बैर न इक महर न इक रब्त न रिश्ता
तेरा कोई अपना न पराया कोई मेरा


माना कि ये सुन-सान घड़ी सख़्त बड़ी है
लेकिन मेरे दिल ये तो फ़क़त एक घड़ी है


हिम्मत करो जीने को अभी उम्र पड़ी है

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  1. Ajeeb baat hui..Abhi abhi

    http://www.youtube.com/watch?v=yRVEfc5zcoE
    yahi nazm sun rahi thi aur yeh mesaage.Zindagi aur Maut ke beech ka bayaan suljhe hue dhang se kiya gaya hai, jiska koi saani nahin hai

    उत्तर देंहटाएं

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