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ज़िन्दगी का हर नाज़ उठा सके तो चल ।
नहीं तो हर फ़िक्र को धुएं में उडा के चल ॥
किसी को नहीं दिखायी देती शहर की गन्दगी,
आँख बन्द कर के चल सके तो चल ।
दुश्मन नहीं दोस्त ही आस्तीन के साँप हैं,
जो सम्भल के चल सके तो चल ।
ये रिश्ते, ये अपनापन आग का दरिया है,
बचा के अपने को जो निकल सके तो चल ।
कातिलों के शहर में जान नहीं बचती,
हथियार हाथ में लेकर जो चल सके तो चल ।
गिड़गिड़ाने से कुछ नहीं होता है यार,
चिल्ला कर बात अपनी कह सके तो चल । 







यह ग़ज़ल सतीशचन्द्र श्रीवास्तव जी , द्वारा लिखी गयी है . आप रेल प्रबंधक कार्यालय , इलाहाबाद में कार्यरत है . आपकी विभिन्न राष्ट्रीय पत्र -पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी है . सतीश चन्द्र जी , स्वंतंत्र रूप से लेखन कार्य में रत है.

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  1. satish ji ko abhi gazal ke sandarbh mein shiksha ki aavashyakta hai, rachna gazal ke basics par hi nahi utar rahi..

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  2. Satish ji ko kai baar padha hai aur yeh jaana ki gazal ho ya geet, gadhya padhya apne sandesh dene mein paripoorn hai
    गिड़गिड़ाने से कुछ नहीं होता है यार,
    चिल्ला कर बात अपनी कह सके तो चल ।

    Har sher ek nageene ki tarah khara uttar raha hai apne sandesh ki lalkaar ko bulkandion tak le jaane mein.

    उत्तर देंहटाएं

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