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शबनमी होंठ ने छुआ जैसे
कान में कुछ कहे हवा जैसे.

लेके आँचल उड़ी हवा जैसे
सैर को निकली हो सबा जैसे.

उससे कुछ इस तरह हुआ मिलना
मिलके कोई बिछड़ रहा जैसे.

इक तबीयत थी उनकी, इक मेरी
मैं हंसी उनपे बल पड़ा जैसे 

लोग कहकर मुकर भी जाते हैं
आंख सच का है आईना जैसे

वो किनारों के बीच की दूरी
है गवारा ये फ़ासला जैसे 

शहर में बम फटा था कल लेकिन
दिल अभी तक डरा हुआ जैसे.

देख कर आदमी की करतूतें
आती मुझको रही हया जैसे

टूट कर शाख़ से गिरा पत्ता
वो खिज़ां से ही डर गया जैसे.

जिस सहारे में पुख़्तगी ढूंढी
था वही रेत पर खड़ा जैसे





यह  ग़ज़ल देवी नागरानी जी द्वारा लिखी गयी है . आप न्यूजर्सी(यू.एस.ए) में शिक्षिका के रूप में कार्यरत है . आपकी 'चरागे दिल ,उड़ जा पंछी,दिल से दिल तक ,लौ दर्दे दिल की तथा गम में भीगी खुशी" आदि कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी है . देवी नागरानी , हिन्दी ,सिन्धी तथा अंग्रेजी में समान रूप से साहित्यिक रचना करती हैं .

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  1. वाह! क्या बात है! बहुत सुन्दर!

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  2. बहुत ही सुन्दर रचना।
    बाल दिवस की शुभकामनायें.
    आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (15/11/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत खूबसूरत ग़ज़ल.
    बार-बार पठनीय, लगता है जैसे गुनगुनाता ही रहूँ .........

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  4. अच्छी रचना
    मेरे बधाई स्वीकारें

    अवनीश सिंह चौहान
    http://poorvabhas.blogspot.com/

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  5. Aap sabhi ka tahe dil se aabhar is rachna ko padhkar is par do shabd abhivyakt karne ke liye.
    Devi Nnagrani

    उत्तर देंहटाएं

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