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इधर हम काफी बदलने लगे हैं -
विचारों के खेमे 
प्रगति 
नया दौर 
और वैश्वीकरण ...!
हमारी संस्कृति 
इतिहास 
समाज , नगर , गाँव ...
सब ग्लोबल होने लगा है ..
इसलिए हम बोलने लगे हैं 
ग्लोबल भाषा ...!
कभी बूढों को बोलते सुना है ?
पोपले मुंह 
फिस से फिसलते अक्षर 
थूक गटकते 
आधे-अधूरे शब्द ,
अर्थ और उनका विन्यास ...
 हमारी हिंदी भी बुढ़ा गयी है ..!
और जवान होती ग्लोबल भाषाएँ 
देखने लगी हैं 
इसे हेय दृष्टि से ...l 
कभी किसी समारोह में 
जब नयी-पुरानी पीढ़ी जुटती है 
तो नैतिक व्यवहारवश 
हम इसे पूजते हैं 
आशीर्वाद पाते हैं 
पैर छूकर 
हिंदी -दिवस मनाते हैं !
साल में एक बार वृद्धा पाती है 
घर में सम्मान ...!
बड़ी भोली है ..
परित्यक्ता नहीं जानती 
इसमें भी छिपा है तिरस्कार !
निपट ग्राम्या है ..
तुम्हारे ड्रोइंगरूम में सजे सामान ..
उनके कंगूरों से अनभिज्ञ ..
अपने छाजले लिए छानती है 
उजले धान -से संगीत भरे रव
बीनती है कुरीतियों के कंकड़ 
और सौंपती है 
पूरा रसोईघर ..
जहां तुम्हारे संस्कारों के पकते हैं 
नित नए भोजन ..!
तुम जानते हो 
ये अन्नपूर्णा तुम्हारी माँ है ..
पर तुम्हें 
इसके ग्राम्या होने की लज्जा है ..
है न !
तुम ढकोसलों से ऊपर 
ऐसे आकाश की ओर बढ़ चले हो 
जहां सीमाएं अनंत हैं ..
और माँ ?
उसकी सीमा ...
वह तो तुम तक ही सीमित है !
है न !
शायद तुम इसलिए सीमित धरती से चिढ़ते हो ..
उड़ने की आदत जो हो गयी है !
माइग्रेटरी चिड़िया ..!
शायद लौटोगे फिर इस देश !

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  1. सामायिक परिदृश्य में तीक्ष्ण व्यंग्य करती हुई रचना, सुन्दर भावों और प्रतिमानों का प्रयोग कविता को प्रभावी बना रहा है ...

    हार्दिक शुभकामनाये अपर्णा जी.

    उत्तर देंहटाएं
  2. पोपले मुंह
    फिस से फिसलते अक्षर
    थूक गटकते
    आधे-अधूरे शब्द ,
    अर्थ और उनका विन्यास ...
    हमारी हिंदी भी बुढ़ा गयी है ..!aap ke kaveta ka sab se marmek dard ... Badey vechar aap ne ukere hai ....Nirmal Paneri

    उत्तर देंहटाएं
  3. पोपले मुंह
    फिस से फिसलते अक्षर
    थूक गटकते
    आधे-अधूरे शब्द ,
    अर्थ और उनका विन्यास ...
    हमारी हिंदी भी बुढ़ा गयी है ..!aap ke kaveta ka sab se marmek dard ... Badey vechar aap ne ukere hai ....Nirmal Paneri

    उत्तर देंहटाएं
  4. तुम्हारे ड्रोइंगरूम में सजे सामान ..
    उनके कंगूरों से अनभिज्ञ ..
    अपने छाजले लिए छानती है
    उजले धान -से संगीत भरे रव
    बीनती है कुरीतियों के कंकड़
    और सौंपती है
    पूरा रसोईघर ..
    जहां तुम्हारे संस्कारों के पकते हैं
    नित नए भोजन ..!
    तुम जानते हो
    ये अन्नपूर्णा तुम्हारी माँ है ..
    पर तुम्हें
    इसके ग्राम्या होने की लज्जा है ..
    है न !
    तुम ढकोसलों से ऊपर
    ऐसे आकाश की ओर बढ़ चले हो
    जहां सीमाएं अनंत हैं ..
    और माँ ?
    उसकी सीमा ...
    वह तो तुम तक ही सीमित है !
    है न !

    पूरी कविता का ताना बाना इन पंक्तियों में उभर कर आया है ...हिंदी के प्रति दर्द और साथ ही इसके प्रति श्रृद्धा दोनों की दिखते हैं ...क्या सही संबोधन दिया है ,माईग्रेटी चिड़िया

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  5. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 22 - 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  6. निपट ग्राम्या है ..
    तुम्हारे ड्रोइंगरूम में सजे सामान ..
    उनके कंगूरों से अनभिज्ञ ..


    माइग्रेटरी चिड़िया ..!
    शायद लौटोगे फिर इस देश !

    कभी कभी मन करता है कहूँ.... no comments! shabd hain kahan!

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  7. aap sabhi ne kavita ko sraaha..
    hriday se dhanywad kabool karen . charcha manch par kavita ka rakhe jaana nishchit roop se hamare liye gaurav ki baat hai. Sangeeta ji is protsahan ke liye aabhar!

    उत्तर देंहटाएं
  8. कल गल्ती से तारीख गलत दे दी गयी ..कृपया क्षमा करें ...साप्ताहिक काव्य मंच पर आज आपकी रचना है


    http://charchamanch.blogspot.com/2010/09/17-284.html

    उत्तर देंहटाएं
  9. माइग्रेटरी चिड़िया ..!
    शायद लौटोगे फिर इस देश !

    लौटना ही होगा ....

    उत्तर देंहटाएं

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