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एक था बचपन !!
बड़ा ही शरारती,बड़ा ही नटखट !!
वो इतना भोला था कि
हर इक बात पर हो जाता था हैरान
बन्दर के चिचियाने से,तितली के उड़ने से
मेंढक के उछलने से,चिड़िया के फुदकने से !!
वो बड़ो को बार-बार करता था डिस्टर्ब.....
काम तो कुछ करता ही नहीं था,और साथ ही
खेलता ही रहता था हर वक्त !!
कभी ये तोड़ा,कभी वो तोड़ा और कभी-कभी तो
हाथ-पैर भी तुडवा बैठता था खेल-खेल में बचपन
तो कभी कुछ जला-वुला भी लेता था अनजाने में बचपन
बचपन कभी किसी की कुछ सुनता भी तो नहीं था ना....!!
बस अपनी चलता था और तब.....
मम्मी की डांट खाता तो सहम-सहम जाता था बचपन
पापा मारते-पीटते तो सुबकने लगता था बचपन
मगर अगले कुछ सेकंडों में ही सब कुछ भूल-भुला कर
वापस खेलने लगता था बचपन !!
और मम्मी की गालों की पप्पी ले लेता
और पापा के गले में झूल जाता था बचपन...!!
सब कुछ तुरत ही भूल जाता था बचपन
मम्मी की डांट....पापा की मार.....
और बदले में वह उन्हें देता था
अपना प्यार....अपना दुलार.....!!

बचपन की बातें ख़त्म....
और बड़प्पन की शुरू.....!!
बड़ों के बारे में तो बस इतना ही कहना है कि
जिंदगी बचाई जा सकती थी
अगरचे बचा कर रख लिया जाता
अपना ही थोडा सा भी बचपन.......!!!

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