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हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

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  1. दुष्यंत कुमार जी को पुनः पढवाने के लिए धन्यवाद!

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  2. दुष्यंत कुमार जी की इस लाजवाब ग़ज़ल के लिए शुक्रिया ..........

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  3. ... प्रयास जारी रखें, प्रसंशनीय प्रस्तुति !!!

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  4. antarik samvednaon ko kavya ke roop me prastuti atyantant marmik hai

    shiva kumar agrahari

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  5. ise padh kr ek josh bhar jata h wah! kya baat h jo hr dil ko jinda dil mehsush kra de

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  6. lajawab kavi bemisaal kavita , great kavi dushyant jee ka koti koti naman

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  7. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  8. कठिन है राह-गुज़र थोड़ी देर साथ चलो।
    बहुत कड़ा है सफ़र थोड़ी देर साथ चलो।

    तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है
    ये जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो।

    नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं
    बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो।

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  9. kisi ko woh kavita yaad hai jisme lekhak ne cinema mien gaav ka chitran aur asliyat mien gaav ka chitran bataya hai.agar kisi yaad ho to plz us kavita ka naam aur author is id pe mail kare dhanyawad. pooshu_22@yahoo.co.in

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