हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए
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9 टिप्पणियाँ:
दुष्यंत कुमार जी को पुनः पढवाने के लिए धन्यवाद!
दुष्यंत कुमार जी की इस लाजवाब ग़ज़ल के लिए शुक्रिया ..........
... प्रयास जारी रखें, प्रसंशनीय प्रस्तुति !!!
is veer ras ke kavi ko sat sat naman
antarik samvednaon ko kavya ke roop me prastuti atyantant marmik hai
shiva kumar agrahari
yeh shabd nahin hain talwar hain.
ise padh kr ek josh bhar jata h wah! kya baat h jo hr dil ko jinda dil mehsush kra de
kabil-e-tarif hai.
kabil-e-tarif hai
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