हो गई है पीर पर्वत - दुष्यंत कुमार

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

9 टिप्पणियाँ:

सुलभ 'सतरंगी' ने कहा…

दुष्यंत कुमार जी को पुनः पढवाने के लिए धन्यवाद!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

दुष्यंत कुमार जी की इस लाजवाब ग़ज़ल के लिए शुक्रिया ..........

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

... प्रयास जारी रखें, प्रसंशनीय प्रस्तुति !!!

Annish ने कहा…

is veer ras ke kavi ko sat sat naman

बेनामी ने कहा…

antarik samvednaon ko kavya ke roop me prastuti atyantant marmik hai

shiva kumar agrahari

बेनामी ने कहा…

yeh shabd nahin hain talwar hain.

preeti sagar ने कहा…

ise padh kr ek josh bhar jata h wah! kya baat h jo hr dil ko jinda dil mehsush kra de

raja ने कहा…

kabil-e-tarif hai.

raja ने कहा…

kabil-e-tarif hai

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