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खुरपी को बुखार

अंग्रेज इस देश में व्यापरी के भेष में आये थे . शुरू में व्यापार ही करते रहे ,लेकिन उनके इरादे केवल व्यापर करने के नहीं हैं .धीर - धीरे उनकी ईस्ट इण्डिया कंपनी ने रियातातों पर कब्ज़ा जमाना शुरू कर दिया . उनकी नियर उजागर होते ही अंग्रेजों को हिंदुस्तान से खादेरने के प्रयास भी शुरू हो गए .
एक बार शेख चिल्ली माता - पिता के आदेश से घास के लिए जंगल में गए . उस वक्त उनकी आयु बारह वर्ष थी .

दोपहर तक उन्होंने पर्याप्त घास खोद ली और गठ्हर बनाकर घर चले आये .घर वाले बहुत खुस हुए .पहली बात चिल्ली ने कोई काम किया था .अचानक चिल्ली को याद आया कि घास खोदने के लिए जिस खुरपे को वह ले गए थे ,वहतो वहीँ रह गया . वह तेजी से जंगल की ओर चल पड़ें .न्यू यार्क स्थित " हिंदी न्यास समिति" की ओर से आयोजित सातवाँ अधिवेशन 6 और 7 अक्टूबर, 2007 में हुआ जिसमें मैं भी शामिल रही. लोक इकाई की संपदा है लोक भाषा, लोक गीत, लोक गाथा, नाटक, कथन और प्रस्तुतीकरण, जिसका अनूठा संगम इस अधिवेशन के दौरान देखने को मिला, अविस्मरनीय है. श्री राम चौधरी, श्री कैलाश शर्मा से मिलने का अवसर मिला. उनकी पूरी टीम ने आश्चर्यजनक रूप से "विभिन्नता में एकता" का जो समन्वय प्रस्तुत किया, वह काबिले तारीफ़ रहा. देखने को मिली हमारे देश के तीज त्यौहार की झलकियाँ, विभिन्न प्राँतों की शादियों की रस्मों के साथ पेशगी, जलियनवाला बाग की अंधाधुंध गोलियों की बौछार, और देश के वीरों के स्वतंत्रता संग्राम की स्म्रतियाँ. समिति की ओर से प्रकाशित त्रेमाहिक पत्रिका "हिंदी जगत"- देश विदेश को जोड़ने का काम कर रही है. इस कार्य में जापान से श्री सुरेश ऋतुपर्ण जुड़े हुए हैं. कुछ और भी पत्रिकाए जो अमेरिका व कैनेडा से साहित्य का संचार कर रही है वे है हिंदी चेतना (कैनेडा - -श्यान त्रिपाठी), और वसुधा (कैनेडा- स्नेह ठाकुर), अब विभोम स्वर(सुधा ॐ ढींगरा) स्थापित हुई हैं.

वहां पहुँच चिल्ली ने चिलचिलाती धूप में पड़ा हुआ अपना खुरपा उठाया , उसका मूठ भी धूप में पड़े रहने के कारण गर्म हो चूका था .चिल्ली घबराकर बोले - 'अरे ! खुरपे को तो बुखार चढ़ गया है. ' मन - ही - मन चिल्ली चिंतित होकर डॉक्टर के पास पहुँचे और बोले - 'डॉक्टर साहब , हमारे खुरपे को बुखार हो गया है .कृपया कोई दवा दे दीजिये .'

डॉक्टर समझ गया कि चिल्ली शरारत कर रहा है .उसने वैसा ही उत्तर दिया - 'अरे हाँ ! इसे तो वाकई बुखार हो गया . जाओ जल्दी से इसे रस्सी में बांधकर कुएं में लटकाकर डुबकी लगवा दो . तब भी बुखार न उतरे तो मेरे पास ले आना .चिल्ली चले आये .रस्सी से खुरपा बाँधा और कुएँ में लटकाकर खूब गोते लगवाये .थोड़ी देर बाद खींचा .खुरपा ठंडा हो गया था .चिल्ली ने डॉक्टर को धन्यवाद दिया .

संयोग से एक दिन डॉक्टर की दूर की रिश्तेदार एक बुढ़िया को तेज़ बुखार हो गया . वह चिल्ली के पड़ोस में रहती थी .चिल्ली ने देखा कि तेज़ बुखार से तपती हुई उस सत्तर वर्ष की बुढ़िया को लोग डॉक्टर के पास ले जाना छह रहे थे .चिल्ली को खुरपे वाली बात याद आ गयी .

उन्होंने डॉक्टर का बताया हुआ नुक्सा उन्हें बताते हुए कहा - 'डॉक्टर जो कुछ बताएँगे ,मैं यही बताये देता हूँ , दादी जान को तेज़ बुखार है .यह गरम खुरपे की तरह तप रही हैं .इसका सबसे अच्छा इजाज यह है कि इसे किसी कुएं या तालाब में खूब अच्छी तरह से डुबकी लगवा दो .बुखार हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा . यह तरकीब मुझे डॉक्टर ने ही बताई थी .'Internet की प्रणाली द्वारा दुनिया के किसी राष्ट्र की सीमा रेखा नहीं रही, कंम्प्यूटर पर विभिन्न भाषाओं के font उपलब्द्ध होने के कारण वेब साईट सँस्करण अंग्रेज़ी या अन्य कई भाषाओं में पड़ा जा सकता है, जैसे "चिट्ठाजगत". इसीसे दुनिया को global village का रूप हासिल हुआ है. महात्मा गाँधी का विश्व ग्राम का सपना सभी भौगोलिक सीमाएं तोड़कर आधुनिक संचार प्रणालियों द्वारा साकार होता हुआ दिखाई दे रहा है.
 इन्सान मानव जाति का प्रतिनिधि है ओर भाषा माँ सम्मान होती है जो हर प्राँत से मात्रभाषा का सैलाब बनकर बहती है, और वह तब तक सुरक्षित है जब तक प्रचार-प्रसार के हर अंग का पालन होता रहेगा. Charity begins at home , के इस सत्य का अनुकरण करते हुए अगर भाषा की शुरूवात शिशु से होती है, उसके साथ आंगन में लोरी बनकर, या गायत्री मंत्र की गूंज बनकर गूंजती है तो सच मानिये, हमें किसी भाषा भय से परीचित होना पड़े, या उस भाषा के लुप्त होने को लेकर किसी शंका या समाधान के बारे में चिंतित होने की आवश्यक्ता नहीं. जब तक यही मात्र भाषा व संस्कृति की मिली जुली वसीयत विरासत के रूप में आने वाली पीढ़ियों को मिलती रहेगी, तय है कि हमारे साथ साथ हमारी भाषा भी जी पायेगी. संस्कृति तोड़ने की नहीं जोड़ने की प्रतिक्रिया है. प्रवासियों ने भारतीय भाषा और संस्कृति को जिस तरह विश्व भर में फैलाया है, वह प्रयास अद्वतीय है. इसीसे विदेश में हिंदी भाषा के प्रचार में इज़ाफा हुआ जा रहा है.

लोगों ने चिल्ली की बात मान ली . बुढिया को एक पीढ़े पर बिठाकर रस्सियों से बांधकर कुएं में लटका दिया . कई डुबकियाँ लगवाने के बाद जब बुढिया को निकाला गया तो वह ठंडी पड़ चुकी थी . उसके प्राण पखेरू उड़ चुके थे .लोग चिल्ली पर बिगड़ गए .बुढ़िया के घरवालों ने गुस्से से कहा - 'तुमने दादी को ख़त्म करा दिया .

चिल्ली बोले - 'मियाँ , मैंने तो बुखार की गारंटी ली थी ,अच्छी तरह देख लो बुखार उतर गया . डॉक्टर का नुक्सा गलत नहीं है . यह उन्ही की बताई हुई तरकीब है . जाकर पूछ लो . तरकीब गलत होती तो दादी का बुखार हरगिज़ नहीं उतरता .'लोग डॉक्टर के पास गए .

डॉक्टर से पूछा गया तो उन्होंने चिल्ली के खुरपे के बुखार वाली बात बताते हुए कहा की उन्होंने गर्म खुरपे को ठंडा करने के लिए उस शरारती लड़के को तरकीब बताई थी .किसी आदमी को पानी में डुबाने के लिए थोड़े बोला था .चिल्ली मियाँ को इस काण्ड के लिए घरवालों से बहुत डांट पड़ी .
कंपनी के हुक्मरानों की नींद हरब कर देने वाला दिलेर इतना निडर था की शेर की मांड में पहुंचकर उससे दो - दो हाथ करने की मानिंद कमपनी की बटालियन के खेमे में ही नहीं आ पहुँगा . वे निकले जो किसी शत्रु या अपराधी के लिए तो नहीं बोले जा सकते थे .



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