नदी के द्वीप कविता

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नदी के द्वीप कविता Nadi ke dweep


हम नदी के द्वीप हैं।
हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्रोतस्विनी बह जाए।
वह हमें आकार देती है।
हमारे कोण, गलियाँ, अंतरीप, उभार, सैकत-कूल
सब गोलाइयाँ उसकी गढ़ी हैं।
माँ है वह! है, इसी से हम बने हैं।

व्याख्या - कवि  का कथन है कि हम नदी के द्वीप हैं ,जिस प्रकार द्वीप का निर्माण नदी द्वारा होता है ,उसी प्रकार जीवन सरिता से हमारा निर्माण होता है। हम यह नहीं कह सकते हैं कि नदी हमें छोड़कर चली जाए।    क्योंकि जो हम कुछ है हमारा कुछ अस्तित्व या आकार है ,वह सब नदी द्वारा प्रदत्त है। गलियाँ ,कोण ,अंतरीप ,उभार ,रेतीला तट ,गोलाई जो कुछ भी हममें परिलक्षित हो रहा है सब उसी के देन  है। इसी प्रकार नदी हमारी माता ,उसी ने हमें जन्म और यह आकाऱ दिया है।  

२. किंतु हम हैं द्वीप। हम धारा नहीं हैं।
स्थिर समर्पण है हमारा। हम सदा से द्वीप हैं स्रोतस्विनी के।
किंतु हम बहते नहीं हैं। क्योंकि बहना रेत होना है।
हम बहेंगे तो रहेंगे ही नहीं।
पैर उखड़ेंगे। प्लवन होगा। ढहेंगे। सहेंगे। बह जाएँगे।
और फिर हम चूर्ण होकर भी कभी क्या धार बन सकते?
रेत बनकर हम सलिल को तनिक गँदला ही करेंगे।
अनुपयोगी ही बनाएँगे।

व्याख्या - द्वीप अपना परिचय देता हुआ कहता है कि हम नदी के निर्मित द्वीप है। हम स्वयं धारा नहीं है। लहरों के समान उठना ,गिरना और प्रभावित होना हमें नहीं आता।  हमें अपनी शक्ति और सीमा का पूर्ण ज्ञान है। अपनी माँ नदी के प्रति मेरे मन में पूर्ण समर्पण भाव है।  इसके प्रति हमारी आत्ममीयता  अविचल और अटूट है। किसी भावना से वशीभूत होकर प्रवाहित होना हमने नहीं सीखा है क्योंकि प्रवाहित होने का अर्थ है अपने अस्तित्व को समाप्त करना।  बहने से पैर उखड़ेगा और प्लावन होगा। हम गिरेंगे और छोटे सहेंगे। एक बार भी प्रवाहित होने का अर्थ है की हम द्वीप से रेत  बन जाएंगे। एक बार टूटने का पुनः आकार पाना कठिन है। हमें धारा बनने का स्वप्न नहीं देखना चाहिए। रेत बनने का अर्थ है जल का गन्दा होना ,जल का गन्दा बनना उसे अनुपयोगी बनाना है। अतः अपने स्थिर रूप में रहना ही हमारे लिए उचित है। व्यक्ति समाज का ऋणी है अतः समाज के बीच समन्यव स्थापित करना उसका कर्तव्य है। उसे चाहिए की वह आने क्रिया कलाप से अपने समाज को कलंकित न करें।  

३. द्वीप हैं हम! यह नहीं है शाप। यह अपनी नियती है।
हम नदी के पुत्र हैं। बैठे नदी की क्रोड में।
वह बृहत भूखंड से हम को मिलाती है।
और वह भूखंड अपना पितर है।

व्याख्या - कवि  कहता है कि हम द्वीप है। द्वीप बनना हमारे लिए अभिशाप की बात नहीं है अपितु भाग्य की बात है। वास्तविकता यह है कि वह नदी का पुत्र है क्योंकि वह नदी से जन्म पाता  है और उसी की गोद  में निश्चिंत होकर रहता है। नदी के पार जो भूखंड है ,वह उसका पिता है। क्योंकि भूखंड के ही अंश नदी की धारा में पड़कर रेत का रूप धारण कर द्वीप के निर्माण के मूल कारण बनते है।  


नदी के द्वीप का केंद्रीय भाव / सारांश  nadi ke dweep hindi kavita summary

नदी के द्वीप अज्ञेय की अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक कविता है।  कवि ने इसमें प्रतीकों का सफल और सार्थक प्रयोग किया है।  इसमें नदी तथा द्वीप दो महत्वपूर्ण शब्द प्रतीकों के केंद्र बिंदु है। नदी समाज का द्वीप व्यक्ति का तथा विश्व विस्तृत मानव परिवार का प्रतिक माना गया है।  जिस प्रकार परिवार में माता - पिता तथा संतान की इकाइयाँ  स्वीकृत हैं उसी प्रकार विराट मानव समाज के सन्दर्भ में समाज ,व्यक्ति तथा विश्व की इकाई आवश्यक है।  इस प्रकार इस कविता के माध्यम से अज्ञेय जी द्वीप तथा विस्तृत विश्व धरती का पारिवारिक सम्बन्ध दर्शाते हुए व्यक्ति ,समाज तथा विश्वमानव के परस्पर संबंधों को उजागर किया है। कवी स्वयं को नदी की धरा में उत्पन्न एक द्वीप मानता है। इस द्वीप का  अस्तित्व नदी की धारा पर निर्भर है। कवि मानता है कि समय की धारा ही मनुष्य रूपी द्वीप को बनती और मिटती  है।  अतः द्वीप को अपनी शक्ति तथा सीमा का बोध होना चाहिए।  जैसे व्यक्ति का समाज के प्रति समर्पण का भाव होता है उसी प्रकार द्वीप का नदी के प्रति।  जिस प्रकार द्वीप नदी का ऋणी है उसी प्रकार व्यक्ति समाज का।  अतः समाज के साथ समन्यव स्थापित करना उसका कर्त्तव्य है। द्वीप नदी का पुत्र है।  अतः उसकी गोद  में वह निश्चिंत पड़ा रहना चाहता है।  नदी के पार का भूखंड उसका पिता है।  नदी रूपी माता उसका संस्कार करती है।  यही स्थिति  व्यक्ति और समाज की है।  नदी के प्रलयकारी स्थिति में वह द्वीप का आकर ग्रहण करता है। उसका अटूट विश्वास है कि प्रवाहित होने के उपरांत भी छनकर वह स्वच्छ रूप धारण करता रहेगा।  द्वीप का नदी के प्रति  निवेदन है कि वह निरंतर प्रवाहित रहकर उसका परिष्कारे करती रहे।  वह कहता है कि नदी को उसके मिटने की चिंता नहीं करनी चाहिए।  उसका विश्वास है कि उसका अस्तित्व शेष रहेगा तथा उसी बचे अश्तित्व से वह पुन्ह नए द्वीप माँ रूप धारण करेगा।  नदी उसे निरंतर नया रूप देकर सजाती रहे ,संवारती रहे।  


नदी के द्वीप कविता का उद्देश्य

नदी के द्वीप कविता में कवि का स्पष्ट उद्देश्य निहित है। यह सृष्टि  परिवर्तनशील है। विनाश ही सृजन को जन्म देता है। एक वस्तु नष्ट होकर दूसरी वास्तु के निर्माण की भावभूमि प्रदान करती है।  प्रकृति कभी नहीं  चाहती  है कि वह एक रूप में बनी रहे।एक रूपता में सौंदर्य तथा रूचि का भाव नहीं रह जाता। नयी संस्कृति ,नवीन संस्कार आदि के लिए पुरानतन का विनाश तथा नवीनता का आग्रह आवश्यक है।  प्राचीनकाल की सभ्यता तथा उस समय की जातियों के भग्न अवशेषों पर ही नयी संस्कृति तथा सभ्यता पनपेगी। अतः विनष्ट होने वाली वस्तुओं में चिंता का कारण नहीं बनना चाहिए। उनका अस्तित्व अजर मार है। नए निर्माण में उन्ही तत्वों का सस्कार होता है। अतः समय के साथ कदम मिलकार चलते रहें से जीवन नया अर्थ तथा रूप स्वीकार कर सार्थकता को प्राप्त करता है।  जो इस परिवर्तन के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करता है उसका विनाश निश्चित है।  अतः परिवर्तन को युग की आवश्यकता मान कर उसका स्वागत करना कहहिये।  नदी द्वीव को जन्म देती है उसनका नया संस्कार करती है। उसको मिटाने में न नदी का हित है न द्वीप का। इसी प्रकार व्यक्ति तथा समाज का अस्तित्व एक दूसरे पर निर्भर है ।  परिवर्तन से इसमें कोई गत्यवरोध नहीं आना चाहिए।  दोनों का अटूट सम्बन्ध है ,क्योंकि नदी द्वीप की माँ है. 


नदी के द्वीप कविता  की प्रतीकात्मता 

नदी के द्वीप अज्ञेय जी की प्रतीकात्मक  कविता है।द्वीप तथा नदी को रूपक देकर कवि स्वयं को नदी का धारा में बन्हने वाला द्वीप बताता है। नदी निरंतर प्रवाहित है।  उसमें द्वीप का अस्तित्व बनता मिटता रहता है।  द्वीपों की रचना नदी की इच्छा का परिणाम है। कालरूपी नदी का प्रबल द्वारा अपने बीच हमेशा दीपों को जोड़ती ,तोड़ती ,स्थापित अथवा विस्थापित करती आयी है। कवि रूपी नदी को अपनी माँ मानता है।हम जो कुछ है ,हमारा जो कुछ अस्तित्व है ,यह सब नदी द्वारा प्रदत्त है। हमारा आकार - प्रकार  सब उसी नदी हमारी माता की देन है। 
द्वीप कहता है कि हम नदी के द्वारा निर्मित है। अतः हम स्वयं धारा नहीं है। हमें अपनी शक्ति और सीमा का पूर्ण ज्ञान है।  अपनी माँ नदी के प्रति मेरे मन में पूर्ण समर्पण भाव है। इसके प्रति हमारी आत्मीयता अविचल और अटूट है। किसी भावना के वशीभूत होकर प्रवाहित होना हमने नहीं सीखा है। प्रवाहित होने का अर्थ है कि हम द्वीप से रेत बन जाएगंगे।  द्वीप बनना हमारे लिए अभिशाप की बात नहीं ,अपितु भाग्य की बात है। वह नदी से जन्म पाता  है और उसी की गोद  निश्चित होकर रहता है। नदी के पारा का भूखंड उसका पिता है। भूखंड के अंश से नदी की धारा में पढ़कर रेत का रूप धारण कर द्वीप निर्माण के मूल कारण बनते हैं। द्वीप नदी रूपी माँ से कहता है कि वह निरंतर आगे बढ़ते चले। धरती से उत्तराधिकार के रूप में जो प्राप्त हुआ है ,वह आगे भी प्राप्त होता रहे तथा नदी माता उसका परिष्कार करती रहे ,उसे नवीन संस्कार देती रहे। नदी रूपी माँ का विध्वंसकारी रूप भी द्वीप को स्वीकार है। वह कहता है कि नदी की विध्वंशकारी स्थिति  में बहकर वह कण बन जाएगा ,उसका आकार समाप्त हो जाएगा परन्तु प्रवाहित होने के उपरांत छनकर पुनः स्वच्छ होगा और कालांतर में जम कर पुनः द्वीप का रूप ग्रहण करेगा।  
कवि द्वीप के माध्यम से कहता है कि उसका अस्तित्व कालप्रवाह का परिणाम है। कालधारा में ही वह नष्ट होता है या उसका निर्माण होता है। बनना और मिटना युग धर्म होने के कारण अनिवार्य है। अतः इस परिवर्तन को स्वीकार करना चाहिए। परिवर्तन से आत्म विकास का मार्ग प्रसस्त होता है। प्रतिकूल परिस्थितियों भी आकार  यदि विनाश करना चाहे तो हमें इस विनाश से भयभीत नहीं होना चाहिए। क्योंकि विनाश नए निर्माण के मार्ग प्रसस्त करता है।  इसी प्रकार समाज ने व्यक्ति को जन्म दिया है परन्तु व्यक्ति समाज से लिए अपना सम्पूर्ण अस्तित्व नहीं मिटाना चाहता है।  

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