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सूरज को आना होगा 



सच को सच कहना होगा,
या मर मर कर जीना होगा।

आँसू के पीछे छुपा हुआ
सूरज को कल फिर से आना होगा
सहमा सिसका सा
पीड़ित सत्य ।
सँकरा पथरीला पगडण्डी सा
अकथ अधूरा सा
अभिव्यक्त।

मुंह खोलो जो भी मन में है बोलो,
जीवित हो तो जीवित दिखना होगा।

सिहर सिहर झरते हैं,
दर्द के परनाले।
शोषित दलित मूक ऐसे हैं ,
जैसे मुंह में हैं छाले।

रुंधे गले से गीत नहीं गाये जाते,
दर्द अगर है तो फिर चिल्लाना होगा।

पलकों पर आते आते,
नींद थकी सो जाती है।
क्यारी के फूलों के फुनगों पर,
पकी धूप खो जाती है।

भरी तमस से रात भली ये लम्बी है,
पर सूरज को कल फिर से आना होगा।



-नवगीत 
सुशील शर्मा 

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