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शिव जी जीवन के प्रेरणा स्रोत

                                            
शिव जी को स्वयंभू कहा जाता है अर्थात जो स्वयं से उत्पन्न हों | उन्हें संसार का विनाशक भी कहा जाता है | पर ये अंत ही नए जीवन का आरंभ है | अगर शिवजी विषपान न करते तो इस सृष्टि को बचाना असंभव था | इस सृष्टि
शिव जी
शिव जी
को स्थायित्व शिवशम्भू द्वारा ही प्रदान किया गया है | भगवान शिव ने हमें सही एवं सरल रूप से त्याग, समर्पण, समानता और वीतराग सिखाया | समुद्र मंथन के समय अगर शिवजी उस हलाहल को पीने के लिए प्रस्तुत न होते तो विनाश निश्चित था | पर अपना उत्तरदायित्व समझते हुए ,संपूर्ण जगत के कल्याण के लिए विषपान किया | विष की ऊष्मा को शांत करने के लिए उन्होंने चंद्रमा को उसके शीतल स्वरुप के कारण अपने मस्तक पर धारण किया | उनकी जटाओं से अविरल बहती गंगा जी की धारा ज्ञान की, अध्यात्म की  निरंतरता तथा नवीनता का बोध तो कराती ही है  वहीं एक बार फिर उनके उत्तरदायित्व को भी दर्शाती है | जैसा कि सर्वविदित है गंगाजी जब स्वर्ग से पृथ्वी की ओर चलीं तो उनका वेग इतना तीव्र था कि संपूर्ण प्राणी उसमें बह जाते तो शिवजी ने कर्तव्यपालन करते हुए उनको अपनी जटाओं में समा लिया |

शिव जी का स्वरूप प्रेरणादायी है | उनका शिरोमणि चंद्रमा हमेशा ईश्वर की असीम सत्ता की ओर इंगित करता है | तीसरा नेत्र अज्ञानता तथा बुराई का नाशक है | अगर ये खुल गया तो विनाश निश्चित है | सर्प हमारे अहं को दिखाता है | जिसको सही से नहीं रखा गया तो हमें डस लेगा वही इसे नियंत्रित कर हम अपना व्यक्तित्व प्रभावशाली बना सकते हैं | एक ओर  रुद्राक्ष जहाँ शुद्धता का परिचायक हैं वहीं त्रिशूल त्रि-शक्तियों का द्योतक है अर्थात शक्ति का ज्ञान , शक्ति की चाह तथा शक्ति का उचित प्रयोग | डमरू से निकलने वाली धुन वेदवाणी है | और सिंहछाल निर्भयता को दर्शाती है | शिवजी हमें प्रेम,दया और अहिंसा का पाठ भी पढ़ाते हैं | शिवजी ने अपने गणों में हर प्रकार की जीव को सम्मिलित किया है यहाँ तक कि भूत-प्रेतों को भी और उनको भी समान सम्मान तथा प्रेम दिया है | अपने शरीर पर भस्म लगाकर हर वस्तु की महत्ता बताई है बस समय पर निर्भर करता  है | आवश्यकता और उचित समय के अनुसार हम चीजों की महत्ता को स्वीकारते हैं | यह शरीर नश्वर है | पंचतत्व से बना यह शरीर एक दिन पंचतत्वों में ही विलीन हो जाएगा | शमशान को अपना निवास बनाकर उन्होंने यह भी बताया कि कोई भी जगह पवित्र या अपवित्र नहीं होती बस मन के भाव होते हैं | 

अंत में हम तो आज महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं , स्त्रियों को समान अधिकार व मान-सम्मान की बात करते हैं पर शिव जी ने आधुनिक समाज की नींव अनादिकाल से ही रखी हुई है | उन्होंने स्वयं को गौरी शंकर बोल कर समाज को यह बता दिया है कि हर युग में स्त्री पुरुष से पहले है और उचित मान-सम्मान की अधिकारिणी है | 


-इलाश्री जायसवाल      
  नोएडा

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