0
Advertisement

नीलकंठ


पंकज ने शिमला की टिकट देखी  और सुमन से पूछा ," हम कहीं जा रहे हैं क्या ? अभी कल ही तो बेटी विदा हुई
नीलकंठ
है और आज ही तुम्हारी ये तैयारी? पूछ तो लिया होता । "

सुमन चाय लेकर रसोई से बाहर आई और बहुत ही शांत स्वर में बोली," हम नहीं सिर्फ मैं जा रही हूं। रही बात बेटी की विदाई की तो, अपने सारे फ़र्ज़ मैंने पूरे कर दिए, एक बहू के , पत्नी के और मां के ।  विवाह करते हुए सोचा था कि एक जीवन साथी मिल रहा है जिसके साथ मैं जीवन की हर बड़ा - छोटा सुख - दुख साझा  करूंगी  पर आप हमेशा एक बेटे ही बने रहे और आपने कभी अपने घरवालों को न समझाया और न रोका । बस मुझ पर ही नियंत्रण करते रहे । मेरा हर शौक आपके घरवालों के नाम पर बलि चढ़ गया ।  

और मैं हर बार उस विष को धारण कर नीलकंठ बन गई । क्योंकि आप दिल के बुरे नहीं हो पर आपने कभी मेरे लिए कोई कदम नहीं बढ़ाया । मैं भी इसी दिन का इंतज़ार कर रही थी । अपनी गृहस्थी का हर फ़र्ज़ निभाया चाहे उसके लिए मुझे कितनी बार अपमान का विषपान क्यों न करना पड़ा हो। आपको छोड़ कर नहीं जा रही बस कुछ दिनों के लिए अपने हलाहल को शांत करने जा रही हूं। जब मन शांत हो जाएगा तो आ जाऊंगी पर कब.. नहीं पता..। आप भी थोड़े दिन अपने घरवालों के साथ रहिए जिनको आप मेरा समय काटकर समय देते रहे । अब आपका पूरा समय उनका है । अब मुझसे नीलकंठ बनकर और नहीं रहा जाएगा । "




- इला श्री जायसवाल
नोएडा

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top