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महिला दिवस : सत्य या छलावा

                                          
महिला दिवस सत्य या छलावा महिला,नारी,औरत,स्त्री, या वुमन जिसे सब आधी दुनिया कहते हैं , क्या वास्तव में वह आधी दुनिया है ? यह एक ऐसी आधी दुनिया है जो अपने अंदर पूरी दुनिया समेटे हुए है | स्त्री ही तो है जिससे जीवन का आरंभ होता है |

महिला-दिवस
लड़की-लड़का दोनों को जन्म देने वाली स्त्री ही तो है पर फिर भी वह अधूरी ही कहलाती है | जीवन के हर क्षेत्र मैं उसे किसी न किसी पुरुष की सहायता की, उसकी छत्र-छाया की आवश्यकता होती है | बचपन में  पिता का साया, युवावस्था में भाई का साया , फिर पति का साया और वृद्धावस्था में पुत्र का साया | ऐसा क्यों ? ये नियम , ये मानक किसने बनाए ,क्यों बनाए ? मुझे लगता है इसकी शुरुआत स्त्री-पुरुष दोनों को जीवन की समान जिम्मेदारी देने के लिए की गई होगी | जैसे-स्त्री घर परिवार को संभाले तो पुरुष पालन करे | पर यह नियम बदलते-बदलते इतना बदल गया कि इसका मूल आधार ही ध्वस्त हो गया | इतिहास उठाकर देखें तो  ज्ञात होगा कि स्त्रियों ने कदम-कदम पर स्वयं को सिद्ध किया है चाहे वह राजनीति हो या रणनीति , रसोई हो या खेल का मैदान , पढाई हो या लड़ाई आदि-आदि |

हमारा देश तो वैसे ही ‘यत्र नार्यस्तु पुजन्ते ,रमन्ते तत्र देवता’ वाली विचारधारा का रहा है और  विदेशों में भी महारानियों ने ही राज किया है | पर फिर भी नारियों की दशा दयनीय होती चली गई | इसके लिए कौन जिम्मेदार है ... यह पुरुष प्रधान समाज या स्वयं स्त्रियों की मानसिकता | सबके लिए सब करने की चाहत ही इसका मूल कारण है | “ मैं स्त्री हूँ तो हर त्याग मुझे ही करना है ,कभी बेटी के रूप में पिता के लिए कि आप जहाँ कहोगे वहीँ विवाह करूंगी , ससुराल जाकर सबकी सेवा करूंगी , कभी बहन के रूप में भाई के लिए जहाँ कहोगे उसी कॉलेज जाऊंगी , कहीं इधर-उधर नहीं घुमूंगी, कहीं पत्नी के रूप में पति के लिए आप जैसे रखोगे वैसे रहूंगी , आप का , आपके  घर-परिवार का पूरा ख्याल रखूंगी , कहीं माँ के रूप में संतान के लिए बस बच्चों का सब हो जाए मुझे किसी चीज की आवश्यकता नहीं....... |”  इन सब बातों की सूची बहुत लंबी है | इन सबसे बाहर आकर देखिए सोचिए और करिए | क्योंकि शोचनीय दशा के लिए कहीं न कहीं स्त्रियों की सोच भी उतनी ही जिम्मेदार है जितनी कि पुरुष की अधिकार जमाने की आदत | लड़की का पालन-पोषण ही यह कहकर किया जाता है कि ‘काम सीख लो, ससुराल जाकर क्या करोगी?’

मेरे विचार से ,हर स्त्री एक योद्धा है | क्योंकि हर समय वह किसी न किसी प्रकार का युद्ध कर रही होती है सुबह उठने से लेकर रात के सोने तक , कोई न कोई छोटी-बड़ी समस्या से वह जूझ रही होती है |  वह अष्टभुजी है जो एक साथ कई काम कुशलता पूर्वक कर सकती है | यह गुण पुरुषों में नहीं होता | इसीलिए बड़ी खूबसूरती से स्त्रियों की ताकत को, क्षमता को  मान-सम्मान , उत्तरदायित्व का जामा पहनाकर  कमजोरी बना दिया | स्त्रियाँ पुरुषों से कहीं अधिक सामर्थ्यवान हैं , उन्हें उनकी महत्ता बताने के लिए किसी विशेष महिला दिवस की आवश्यकता नहीं है |  क्योंकि स्त्रियों को इस मान-सम्मान के दिखावे की नहीं बल्कि उनकी महत्ता को स्वीकारने की आवश्यकता है | समाज का ऐसा कोई विधान नहीं जो बिना स्त्रियों के पूरा हो सकता है या जिसमें स्त्रियों की परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से आवश्यकता न हो | इसलिए मेरी नज़र में हर दिन महिला दिवस है, हर पल महिला-पल है | जिस भी दिन आप किसी महिला को मान देते हैं उसकी महत्ता को स्वीकार करते हैं वही दिन उसके लिए महिला-दिवस है |



लेखिका-
इलाश्री जायसवाल
नोएडा             

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