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जयशंकर प्रसाद की कामायनी


जयशंकर प्रसाद की कामायनी Kamayani Book by Jaishankar Prasad - महाकवि जयशंकर प्रसाद जी द्वारा रचित कामायनी इस युग का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है .इसे हिंदी साहित्य जगत में तुलसीदास कृत रामचरितमानस के बाद हिंदी का दूसरा बेजोड़ महाकाव्य माना जाता है .प्रसाद जी की कला का सर्वोच्च शिखर कामायनी है .छायावादी युग का यह सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है .इसे छायावाद का उपनिषद कहा जाता है .इस महाकाव्य में मनु और श्रद्धा के माध्यम से मानव जीवन की सम्पूर्ण कहानी मनोवैज्ञानिक ढंग से कही गयी है .इस रचना में प्रलय के बाद श्रृष्टि रचना के क्रम में मनु और श्रद्धा पुरुष और नारी के पारस्परिक सहयोग की महत्वपूर्ण भूमिका को पौराणिक ,सांस्कृतिक तथा दार्शनिक धरातल पर प्रस्तुत किया गया है .प्रसाद जी द्वारा रचित रूपक कथात्मक महाकाव्यों की परंपरा में लिखा गया आधुनिक युग का सबसे श्रेष्ठ महाकाव्य है .महाकवि इस काव्य के माध्यम से भौतिकता और बौद्धिकता के भार से जकड़े हुए विश्वमानव को श्रद्धा से संयमित करके परमानन्द तक ले गया है जहाँ शांति और सुख है ,ईष्या और संघर्षों को जहाँ स्थान नहीं है . 

कामायनी महाकाव्य की कथा - 

कामायनी
कामायनी
कामायनी महाकाव्य में पुरुष मनु और श्रद्धा नारी के संयोग से मानवता को विकसित किया गया है .कथा का प्रारंभ भंयंकर जलप्लावन को लेकर होता है .प्रकृति अपनी शक्ति से सारे भूमंडल पर प्रलय का दृश्य उपस्थित करती है .पंचभूत का तांडव नृत्य आरम्भ हो जाता है .विकल वासना से युक्त सभी सांसारिक प्राणी मृत्यु की गोद में सो जाते हैं . मनु किसी प्रकार नाव का सहारा लेकर हिमगिरी के उत्तुंग शिखर पर पहुँच जाते हैं .अचानक भूली भटकी श्रद्धा नामक नारी उन्हें मिल जाती है .वहीँ से नए श्रृष्टि के मानव की उत्पत्ति होती है .श्रद्धा  अब मनु से अधिक अपने शिशु को प्यार करती है .मनु के लिए यह असहनीय हो जाता है .क्रोधित होकर वे श्रद्धा से विलग हो जाते हैं .इसके बाद एक दिन स्वपन में श्रद्धा देखती है की मनु कष्ट में हैं .उसका प्रेम उमड़ पड़ता है और मनु की खोज में चल देती है .पुनः श्रद्धा उन्हें हिमालय के आनंदखंड की ओर ले जाती है ,जहाँ पूर्ण शांति थी ,नीरवता थी .

प्रतीकात्मक काव्य - 

इस महाकाव्य में १५ सर्ग हैं .इस काव्य के नायक मनु और श्रद्धा नायिका है .इस काव्य की साड़ी घटनाएं प्रतीकात्मक हैं .इसी कारण कुछ लोग कामायनी को रूपक काव्य या मनोवैज्ञानिक काव्य मानते हैं .इस महाकाव्य में मनु मन के प्रतिक है ,श्रद्धा ह्रदय की ,इड़ा बुद्धि की ,श्रद्धा का पुत्र कुमार मानव का और असुर पुरोहित किरात और अकुली आसुरी वृत्तियों के रूप में रूपांतरित किये गए हैं . 

भाषा व कला पक्ष - 

प्रसाद ने इसमें रति और निर्वेद नामक दो भावों का सुन्दर व सफल प्रयोग किया है .प्रसाद जी ने अपने सम्पूर्ण भावों को प्रकृति द्वारा ही व्यक्त किया है .इनकी भाषा गहरे अर्थ और मधुर भावों से ओत - प्रोत है .प्रसाद जी ने इस महाकाव्य में आनंदवाद की स्थापना करके इसे एक दार्शनिक काव्य बना दिया है .इसमें प्रेम और यौवन के चित्रों के साथ साथ सामाजिक ,दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक स्थितियों का सुन्दर वर्णन किया गया है .यह भाव ,कला और कल्पना तीन  पक्षों में सर्वश्रेष्ठ काव्य सिद्ध हुआ है .कामायनी के भाषा में सुकुमारता और चित्रात्मकता का चरम विकास हुआ है .


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