0
Advertisement

होलिका दहन पूजन विधि होली पूजा विधि 


होलिका दहन पूजन विधि Holika Dahan Puja Vidhi in Hindi होलिका दहन पूजन विधि होली पूजा विधि - आनंद ,उल्लास और रंगों से भरभूर मस्ती का त्यौहार है होली .दीपावली और दशहरे के समान ही इस त्यौहार का भी बहुत धार्मिक महत्व एवं मनाने के पूरा शाश्त्रोक्त विधि विधान हैं .यद्यपि आज हम इसके धार्मिक महत्व और विधान को तो भूलते ही जा रहे हैं ,शिक्षा के प्रचार - प्रसार ने इसके जुड़ी रंगों की बहार और गायन वादन के कार्यक्रमों को भी काफी कम कर दिया है .फिर भी यह हमारा वह सामाजिक पर्व है जिसमें अमीर - गरीब ,स्त्री पुरुष ,बालक वृद्ध और जाती पाती की दीवारें टूट जाती हैं .पूर्णिमा की रात्री में होलिका दहन ही नहीं ,इसका पूजन और होली हेतु गोबर की गुलेरियां बनाना भी धार्मिक कृत्य हैं .महिलायें इस दिन व्रत भी रखती हैं और जहाँ होलिका दहन हेतु लकड़ियाँ का ढेर रखा जाता है ,वहां जाकर उस होलिका का पूजन भी करती हैं .परन्तु देव पूजन के विपरीत कोई ख़ास विधान नहीं होता इस पूजा में . 
होलिका दहन पूजन
होलिका दहन पूजन 

कब करें पूजन - 

यद्यपि महानगरों में तो यह संभव नहीं हो पाटा ,परन्तु कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में होली के पंद्रह बीस दिन पहले से ही गोबर के पतले पतले उपले और अंजुली के अकार के गुलेरियां बनाना प्रारंभ हो जाता है .इनके बीच में बनाते समय ही उंगली से एक छेद बना दिया जाता है .इनके सूख जाने पर इन्हें रस्सियों में पिरोकर मालाएँ बनायीं जाती है .होलिका दहन के दो तीन दिन पूर्व खुले मैदानों और अन्य निर्धारित स्थानों पर होली के लकड़ी कंडे आदि रखना प्रारंभ कर दिया जाता है .उनमें ही रख दी जाती है ये मालाएँ .अनेक क्षेत्रों में इन सामूहिक होलिकाओं के साथ साथ एक मकान में रहने वाले सभी परिवार मिलकर अतिरिक्त रूप से भी होलियाँ जलाते हैं .

होलिका पूजन विधि - 

होली की अग्नि में पौधों के रूप में उखाड़े गए चने ,जौ और गेंहू के दाने भूनकर परस्पर बांटने की भी परंपरा है .होलिका दहन तो रात्री में होता है ,परन्तु महिलाओं द्वारा इस सामूहिक होली की पूजा दिन में दोपहर से लेकर शाम तक की जाती है .महिलायें एक पात्र में जल और थाली में रोली ,चावल ,कच्चे सूत की पिंडी ,कलावा ,अबीर और नारियल आदि लेकर जाती हैं होलिका माई का पूजन करने .इन सामग्रियों से होली का पूजन किया जाता है और जल चढ़ाया जाता है .होलिका के चारों ओर परिक्रमा देते हुए सूत लपेटा जाता है .शाश्त्रों के अनुसार भद्रा नक्षत्र में होलिका दहन पूर्णतय वर्जित है .यही कारण है कि किसी वर्ष तो होलिका दहन सायं सात आठ बजे ही हो जाता है तो किसी वर्ष प्रातः तीन चार बजे .

होली का व्रत - 

शास्तों का कथन है कि होली के दिन महिलाओं द्वारा तो होलिका पूजन किया ही जाना चाहिए ,पुरुषों को भी हनुमान जी और भगवान् भैरव देव की विशिष्ट पूजा अवश्य करनी चाहिए .प्रत्येक स्त्री पुरुष को होली का व्रत करना चाहिए और होलिका दहन के समय आग की लपटों के दर्शन करने के बाद ही भोजन करना चाहिए .अग्निदेव की पूजा और नवीन अनाजों की अग्नि में आहुति का पर्व है होली ,परन्तु अब तो व्यावाहारिक रूप में चने के होले और जौ की बाली को होली की आग में भून लाते हैं .अनेक परिवारों में आज सास को पुड़ी और हलुवे का विशेष बायना भी दिया जाता है .होलिका दहन के दुसरे दिन यानी की चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को जली हुई होली की पूजा की जाती है .फाग खेली जाती है और दसिया का डोरा भी लिया जाता है .


एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top