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घरौंदे


आओ बच्चों बताऊँ तुम्हे
क्या होते थे घरौंदे--?
स्मार्टफोन वाले बच्चों 
तुम क्या जानों 
कैसे बनते थे घरौंदे--?
जब हम बच्चे थे हर दीवाली बनाते थे
सुंदर, सजीले प्यारे घरौंदे।।
अजी यूँ ही नही  बन जाते घरौंदे
हम चुराते थे माँ के सख्त पहरे से कई चटख दोपहर
हम बिताते थे कई अधजगी सी रातें
खोये-खोये से दिन।।
हम चुराते तालाब औ बगीचों से चिकनी मुलायम मिट्टी।।
तब कहीं जाकर खड़ी होती थीं हमारे घरौंदे की चार दीवालें।।
छत पाटने को 
हम रसोईघर से चुराते थे
छोटी सीधी लकड़ियाँ ।।
हाय कितना मुश्किल था 
घरौंदे की सीढ़ी बनाना
बार-बार बिखर जातीं किसी गरीब के सपनोँ की तरह,,
हम भी कहाँ कम ज़िद्दी थे
फिर-फिर बनाते सीढ़ियाँ।।
हर दिन कई शातिर नजरें
रहतीं हमारे घरौंदों की फिराक में,,
तुम क्या जानो बच्चों कितना मुश्किल था 
अपने घरौंदे बिखरने से बचाना।।

सुनो बच्चों------
यूँ ही नही सज जाते थे घरौंदे,,
हम सपनों मेँ चुनते थे
घरौंदे
घरौंदे
घरौंदे के परदे और गुलदस्ते
चुराते थे माँ के सन्दूक से 
सुन्दर चमकीला दुपट्टा।।
दीदी के मेकअप बॉक्स से
मोती माला घुँघरु
लाली,पाउडर,काजल।।
बैठक के गुलदस्ते से कुछ फूल
लड्डू गोपाल की सबसे सुंदर पोशाक,,
हाय कितना मुश्किल था
बड़ो की शातिर दुनिया से
चन्द छोटी खुशियाँ चुराना
कुछ-कुछ आँखों से काजल चुराने जैसा।।
जब चोरी पकड़े जाने पर
हम धुने जाते
पुरानी रुई,खटमल वाली खाट की तरह,,
इंकलाब जिंदाबाद कह
सारी मार झेल जाते।।
तुम्हे क्या बताऊँ बच्चों
कितना पिटवाते थे घरौंदे।।

चोरी में सफल होने पर
हमारी दुनियां के हम बनते मुखिया
हमारी दुनियां में चलता बस हमारा कानून,,
सरल शब्दों में जीवन दर्शन
सिखाते थे घरौंदे,,
यूँ खेल-खेल में हमारे गुरु
बन जाते थे घरौंदे।।

इन घरौंदों में बसती थीं
हमारी खुशियाँ
घरौंदों में रहती थी हमारी गुड़िया रानी
घरौंदों में आती थी गुड्डे राजा की बारात,,
सारे बच्चे घराती; बराती बन
जम के उड़ाते दावत,
हाय! घरौंदों को सुना छोड़
चली जाती गुड़िया रानी की डोली
प्यारे बच्चों,विदाई के दिन
बड़ा रुलाते थे घरौंदे।।

गुड्डे राजा के साथ पगफेरों पर
सज कर आती हमारी गुड़िया रानी,,
घरौंदों में बजती थी ढ़ोलक
घरौंदों में आता था सावन
घरौंदों में रचती थी मेहंदी
घरौंदों में डलते थे झूले,,
घरौंदों में आते थे तीज,रक्षाबंधन
घरौंदों में दिखतीं दीवाली की रौनकें,
घरौंदों में खिलता था फ़ाग
जानते हो बच्चों एक दिन क्या हुआ--!
चोरी छिपे यहाँ आ धमकी
बड़ी दुनियां की निर्दयता
देखते ही देखते बदल गयीं
हम बच्चों की दुनियां।।
हमारी दुनियां के बच्चे होने लगे शातिर,,
बड़ी दुनियां की कुरीतियाँ बन गयी
गुड्डे-गुड़ियों की शादी की शर्तें।।

फिर क्या हुआ दीदी---?
फिर - - - - - - -
कुछ गुड़ियों के घरवाले नही पूरी कर सके 'शादी की शर्तें'
जो गुड़ियाँ नही ले जा पाई माँगा हुआ दहेज़
वो गुड़ियाँ कभी ना आईं लौटकर पगफेरों पर
जो गुड़ियाँ नही लाई दहेज
कटा दी उन्होंने गुड्डे वालों की नाक,,

जानना चाहोगे बच्चों फिर क्या होता था ??
फिर फोड़ दिए जाते थे घरौंदे
गुड्डे वाले बच्चे  फिर फोड़ देते थे हमारी गुड़ियों की आँखे।।
पीट-पीट कर 
कर देते थे अधमरा
या नोंच-खसोट कर आग के हवाले,,
भोली-भाली गुड़ियों की ज़िन्दगी की कीमत पर
वसूली जाती थी दहेज की रकम,,
टूटकर बिखर जाते थे उदाश गुड़ियों वाले सुनसान घरौंदे,,
बच्चों आप कहाँ समझ पाओगे
अपनी गुड़ियों को खोने के बाद
कितना रोते थे घरौंदे,,
मैंने देखा था उनको छुप-छुप सिसकते हुए,
सूने, बेरंग, उदाश घरौंदे
बेजान गुड़ियों वाले सुनसान घरौंदे। ।




मीनाक्षी वशिष्ठ
जन्म स्थान ->भरतपुर (राजस्थान )
वर्तमान निवासी टूंडला (फिरोजाबाद)
शिक्षा->बी.ए,एम.ए(अर्थशास्त्र) बी.एड
विधा-गद्य ,गीत ,प्रयोगवादी कविता आदि।

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