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ये क्या हो गया ?


आज जब मैं उससे मिलने गयी तो वह शांत,उदास सी बैठी हुयी थी।मुझे देखते ही मुझसे लिपट गयी और सिसकने लगी,ये क्या हो गया? 

बुटीक
बुटीक
मैं उसे शांत करने की कोशिश कर रही थी,मगर वह चुप होने को तैयार  ही नहीं थी,मैं अतीत के सागर में खोती जा रही थी।

याद है मुझे जब वह अपने पति और चार वर्षीय बेटे तथा चार-पाँच माह की बेटी को लेकर हमारी सोसायटी में रहने आयी थी। उसका नाम ललिता था,उसके पति का अपना निजी व्यवसाय था,बहुत खुश थी वह अपने छोटे से परिवार में। जब भी मुझसे मिलती हमेशा यही कहती कि आपका अच्छा है,नौकरी करो और मस्ती से रहो।मुझे लगा कि वह भी कुछ करना चाहती है।मैंने उसकी रुचियों के विषय में पूछा तब उसने बताया कि उसे सिलाई,कढ़ाई,बुनाई और चित्रकारी का शौक है,मैंने कहा कि इस शौक को ही अपना व्यवसाय क्यों नहीं बना लेती,वह बहुत उत्सुक हुयी , बोली पति से बात करती हूँ।कुछ दिनों के पश्चात वह फिर मिली,मैंने पूछा कि नये व्यवसाय के विषय में पूछा तो  उसने बताया कि उसके घर में कोई तैयार नहीं है,उसके पति ने यह कहकर मना कर दिया कि हमारे परिवार की औरतें काम नहीं करती।

समय बीतता गया,वह अपने परिवार में खुश रहने लगी और मैं अपनी नौकरी व घर में।एक दिन जैसे ही मैंअपने स्कूल से वापस आयी कि मेरा फोन बज उठा,आवाज आयी ललिता के घर पहुँचो जल्दी,मैं उल्टे पैर उसके घर पहुँची तो देखा कि सामने ज़मीन पर ललिता के पति का मृत शरीर चादर से ढका रखा था,सभी परिजन शोकाकुल थे,पूछने पर पता चला कि हृदयाघात के कारण आधे घंटे में ही सब खत्म हो गया।सभी अधीर थे , ललिता का बहुत बुरा हाल था,सभी उसे बच्चों का वास्ता देकर सम्हालने की कोशिश कर रहे थे,समय बीतता गया।

अब ललिता के समक्ष सबसे बड़ी समस्या थी कि परिवार का खर्चा कैसे चलेगा, बेटा बारहँवी में था,बेटी आठवीं में।कौन करेगा परिवार का पालन,इसी उधेड़बुन में ज़मा पूँजी धीरे-धीरे खत्म होती जा रही थी।आज मैंने फिर उसे वही सलाह दी कि अब भी तुम अपनी रुचियों  को अपना व्यवसाय बनाकर नये जीवन की शुरुआत कर सकती हो,आज उसे किसी ने नहीं रोका ,क्योंकि आज सब उसकी तथा उसके परिवार की ज़िम्मेदारी से बचना चाहते थे,खैर उसने अपनी ज़मा की हुई धनराशि से एक बुटीक खोला,और अब वह अपने जीवन के सूनेपन को बच्चों तथा काम में व्यस्त होकर मिटाने की कोशिश करती है,किन्तु आज वह मुझसे बोली काश यही काम यदि मैं पहले से ही कर रही होती तो शायद मुझे इतनी मुसीबतों का सामना नहीं करना पड़ता।

मैं भी भारी कदमों से अपने घर की तरफ यह सोचती हुई चलती जा रही थी कि वाह रे समाज परिस्थितियाँ बदलीं तो आदर्श भी बदल गये।
                             


 - रशिम श्रीधर 

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