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व्यथित हृदय


व्यथित ह्रदय तुझे कैसे समझाऊं
वेदना के तार से
संजना तिवारी
संजना तिवारी
मधुर राग फूटते नहीं
बदरंग कैनवासों पर स्पष्ट चित्र उभरते नहीं

चाहे जितने जतन कर लो मरुस्थल में पुष्प पनपते नहीं
बंजर धरती चीखती है फिर भी मेघ बरसते नहीं

ये विधि का सब लेखा है जिस पर किसी का जोर नहीं
खामोशी में कोलाहल है चीखों में शोर नहीं...

व्यथित ह्रदय तुझे कैसे समझाऊँ...
व्यथित ह्रदय तुझे कैसे समझाऊँ





संजना तिवारी ललितकला से स्नातकोत्तर हैं और अपना स्वयम का वयवसाय है. साथ ही साथ आईना फाउंडेशन संस्था की सचिव /संस्थापक है।कविताएं एवं कहानियाँ लिखने में रुचि रखती है।इनकी कविताएं विशेषकर रूमानी या स्त्री पीड़ा विषय पर होती हैं।

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