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स्वामी दयानन्द सरस्वती का जीवन परिचय


स्वामी दयानन्द सरस्वती का जीवन परिचय महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती (जन्म- 12 फरवरी, 1824 - गुजरात, भारत; मृत्यु- 31 अक्टूबर, 1883 अजमेर, राजस्थान) आर्य समाज के प्रवर्तक और प्रखर सुधारवादी सन्यासी थे। जिस समय केशवचन्द्र सेन ब्रह्मसमाज के प्रचार में संलग्न थे लगभग उसी समय दण्डी स्वामी विरजानन्द की
स्वामी दयानन्द सरस्वती
स्वामी दयानन्द सरस्वती 
मथुरा स्थित कुटी से प्रचण्ड अग्निशिखा के समान तपोबल से प्रज्वलित, वेदविद्यानिधान एक सन्यासी निकला, जिसने पहले-पहल संस्कृतज्ञ विद्वात्संसार को वेदार्थ और शास्त्रार्थ के लिए ललकारा। यह सन्यासी स्वामी दयानन्द सरस्वती थे।

स्वामी दयानन्द सरस्वती का निधन एक वेश्या के कुचक्र से हुआ।जोधपुर की एक वेश्या ने, जिसे स्वामी जी की शिक्षाओं से प्रभावित होकर राजा ने त्याग दिया था, स्वामी जी के रसोइये को अपनी ओर मिला लिया और विष मिला दूध स्वामी जी को पिला दिया। इसी षड्यंत्र के कारण 30 अक्टूबर 1883 ई. को दीपापली के दिन स्वामी जी का भौतिक शरीर समाप्त हो गया। लेकिन उनकी शिक्षाएँ और संदेश उनका ‘आर्यसमाज’ आन्दोलन बीसवीं सदी के भारतीय इतिहास में एक ज्वलंत अध्याय है।

दयानंद सरस्वती ने 1863 से 1875 ई. तक सारे देश का भ्रमण करके अपने विचारों का प्रचार किया। उन्होंने वेदों के प्रचार का बीडा उठाया और इस काम को पूरा करने के लिए संभवत: 7 या 10 अप्रैल 1875 ई. को 'आर्य समाज' नामक संस्था की स्थापना की। शीघ्र ही इसकी शाखाएं देश-भर में फैल गई। देश के सांस्कृतिक और राष्ट्रीय नवजागरण में आर्य समाज की बहुत बड़ी देन रही है। हिन्दू समाज को इससे नई चेतना मिली और अनेक संस्कारगत कुरीतियों से छुटकारा मिला। स्वामी जी एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे। उन्होंने जातिवाद और बाल-विवाह का विरोध किया और नारी शिक्षा तथा विधवा विवाह को प्रोत्साहित किया। उनका कहना था कि किसी भी अहिन्दू को हिन्दू धर्म में लिया जा सकता है। इससे हिंदुओं का धर्म परिवर्तन रूक गया।

सबसे सुखद बात यह है कि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने मथुरा में स्वामी विरजानंद सरस्वती से शिक्षा पाई। स्वामी विरजानंद सरस्वती और हमारा मथुरा में घर आसपास है। मथुरा के वैदिक वातावरण ने स्वामीजी के अंदर समाजसुधार,प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के प्रचार प्रसार की भावना पैदा।स्वामी दयानन्द सरस्वती ने खड़ीबोली हिंदी गद्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। अपने व्याख्यानों से खड़ीबोली हिन्दी को जनप्रिय बनाया।

तीन सवाल और स्वामीजी के उत्तर-

१.प्रश्न -धर्म और अधर्म किसको कहते हैं ?

उत्तर -जो पक्षपातरहित न्याय, सत्य का ग्रहण, असत्य का परित्याग पाँचों परीक्षाओं के अनुकूलाचरण, ईश्वराज्ञा का पालन, परोपकार करना आदि धर्म है और जो इससे विपरीत वह अधर्मनकहाता है । क्योंकि जो सबके अविरुद्ध वह धर्म और जो परस्पर विरुद्धाचरण सो अधर्म क्योंकर न कहावे ? देखो ! किसी ने किसी से पूछा कि तेरा क्या मत है ? उसने उत्तर दिया कि जो मैं मानता हूं । उससे उसने पूछा कि जो मैं मानता हूं वह क्या है ? उसने कहा कि अधर्म । यही पक्षपात अधर्म का स्वरूप है । और जब तीसरे ने दोनों से पूछा कि सत्य बोलना धर्म अथवा असत्य ? तब दोनों ने उत्तर दिया कि सत्य बोलना धर्म और असत्य बोलना अधर्म है, इसी का नाम धर्म जानो।

२.प्रश्न -क्या जैसी चाहें वैसी शिक्षा करें ?

उत्तर - नहीं, जो पुत्र, पुत्री और विद्यार्थियों को सुनावें कि सुन मेरे बेटे बेटियां और विद्यार्थी ! तेरा शीघ्र विवाह करेंगे, तू इसकी दाढ़ी मूंछ पकड़ ले, इसका जूड़ा पकड़ ले, ओढ़नी फेंक दे, धौल मार, गाली दे, इसका कपड़ा छीन ले, पगड़ी वा टोपी फेंक दे, खेल-कूद, हँस, रो, तुम्हारे विवाह में फूलवारी निकालेंगे इत्यादि कुशिक्षा करते हैं उनको माता, पिता और आचार्य न समझने चाहियें किन्तु सन्तान और शिष्यों के पक्के शत्रु और दुःखदायक हैं, क्योंकि जो बुरी चेष्टा देखकर लड़कों को न घुड़कते और न दण्ड देते हैं वे क्योंकर माता, पिता और आचार्य हो सकते हैं ? और जो अपने सामने यथातथा बकने, निर्लज्ज होने, व्यर्थ चेष्टा करने आदि बुरे कर्मों से हटाकर विद्या आदि शुभ गुणों के लिए उपदेश कर तन, मन, धन लगा के उत्तम विद्या व्यवहार का सेवन कराकर अपने सन्तानों को सदा श्रेष्ठ करते जाते हैं, वे माता, पिता और आचार्य कहाकर धन्यवाद के पात्र हैं । फिर वे अपने सन्तान और शिष्यों को ईश्वर की उपासना, धर्म, अधर्म, प्रमाण, प्रमेय, सत्य, मिथ्या, पाखण्ड, वेद, शास्त्र आदि के लक्षण और उनके स्वरूप का यथावत् बोध करा और सामर्थ्य के अनुकूल उनको वेदशास्त्रों के वचन भी कण्ठस्थ कराकर विद्या पढ़ने, आचार्य के अनुकूल रहने की रीति भी जना देवें कि जिससे विद्याप्राप्‍ति आदि प्रयोजन निर्विध्न सिद्ध हों, वे ही "माता पिता और आचार्य" कहाते हैं ।

३.प्रश्न -विद्या किस किस प्रकार और किस साधन से होती है ?

उत्तर - चतुर्भिः प्रकारैर्विद्योपयुक्ता भवति ।
आगमकालेन स्वाध्यायकालेन प्रवचनकालेन व्यवहारकालेनेति ॥ (महाभाष्य अ० १।१।१।आ० १।)
विद्या चार प्रकार से आती है - आगम, स्वाध्याय, प्रवचन और व्यवहारकाल ।
आगमकाल उसको कहते हैं कि जिससे मनुष्य पढ़ाने वाले से सावधान होकर ध्यान देके विद्यादि पदार्थ ग्रहण कर सके ।
स्वाध्यायकाल उसको कहते हैं कि जो पठन समय में आचार्य के मुख से शब्द, अर्थ और सम्बन्धों की बातें प्रकाशित हों उनको एकान्त में स्वस्थचित्त होकर पूर्वापर विचार के ठीक ठीक हृदय में दृढ़ कर सके ।
प्रवचनकाल उसको कहते हैं कि जिससे दूसरे को प्रीति से विद्याओं को पढ़ा सकना ।
व्यवहारकाल उसको कहते हैं कि जब अपने आत्मा में सत्यविद्या होती है तब यह करना, यह न करना है वह ठीक ठीक सिद्ध होके वैसा ही आचरण करना हो सके, ये चार प्रयोजन हैं । तथा अन्य भी चार कर्म विद्याप्राप्‍ति के लिए हैं - श्रवण, मनन, निदिध्यासन और साक्षात्कार ।
श्रवण उसको कहते हैं कि आत्मा मन के और मन श्रोत्र इन्द्रिय के साथ यथावत् युक्त करके अध्यापक के मुख से जो जो अर्थ और सम्बन्ध के प्रकाश करने हारे शब्द निकलें उनको श्रोत्र से मन और मन से आत्मा में एकत्र करते जाना ।
मनन उसको कहते हैं कि जो जो शब्द अर्थ और सम्बन्ध आत्मा में एकत्र हुए हैं उनका एकान्त में स्वस्थचित्त होकर विचार करना कि कौन शब्द किस शब्द, कौन अर्थ किस अर्थ और कौन सम्बन्ध किस सम्बन्ध के साथ सम्बन्ध अर्थात् मेल रखता और और इनके मेल में किस प्रयोजन की सिद्धि और उल्टे होने में क्या क्या हानि होती है ।
निदिध्यासन उसको कहते हैं कि जो जो शब्द अर्थ और सम्बन्ध सुने विचारे हैं वे ठीक ठीक हैं वा नहीं ? इस बात की विशेष परीक्षा करके दृढ़ निश्चय करना ।
साक्षात्कार उसको कहते हैं कि जिन अर्थों के शब्द और सम्बन्ध सुने विचारे और निश्चित किये हैं उनको यथावत् ज्ञान और क्रिया से प्रत्यक्ष करके व्यवहारों की सिद्धि से अपना और पराया उपकार करना आदि विद्या की प्राप्‍ति के साधन हैं ।

- जगदीश्वर चतुर्वेदी 


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